“होर्मुज संकट: भारत की ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई और अर्थव्यवस्था पर मंडराता खतरा”
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक तनाव का केंद्र बन गया है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को वाणिज्यिक जहाजों और तेल टैंकरों के लिए बंद किए जाने की घोषणा ने पूरी दुनिया में चिंता बढ़ा दी है। विश्व के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस व्यापार का मार्ग होने के कारण होर्मुज में किसी भी प्रकार का व्यवधान वैश्विक अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित करता है।
इस घटनाक्रम के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संकट लंबा खिंचता है तो तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकता है। इसका सबसे बड़ा असर उन देशों पर पड़ेगा जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं, जिनमें भारत प्रमुख है।
भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है और उसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। ऐसे में होर्मुज में व्यवधान का सीधा असर देश की ऊर्जा सुरक्षा, आयात बिल, रुपये की मजबूती और महंगाई पर पड़ सकता है। पेट्रोल-डीजल महंगे होने से परिवहन लागत बढ़ेगी, जिसका असर खाद्यान्न, सब्जियों, दवाइयों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर दिखाई देगा।

कृषि क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहेगा। डीजल आधारित सिंचाई और कृषि मशीनरी की लागत बढ़ने से किसानों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। वहीं एलएनजी आपूर्ति प्रभावित होने की स्थिति में सीएनजी, पीएनजी, उर्वरक उत्पादन और बिजली क्षेत्र पर भी दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, रूस सहित वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत और ऊर्जा आयात में विविधता की नीति जैसे सुरक्षा कवच मौजूद हैं, फिर भी लंबे समय तक संकट बने रहने की स्थिति में चुनौतियां गंभीर हो सकती हैं।
दरअसल, होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा प्रश्न है। इसलिए भारत के लिए यह समय ऊर्जा स्रोतों में विविधता, रणनीतिक भंडारण क्षमता बढ़ाने और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयासों को और तेज करने का है।
होर्मुज का भविष्य केवल तेल की कीमतों का नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन का भी निर्धारण करेगा। आने वाले दिनों में दुनिया की निगाहें पश्चिम एशिया पर टिकी रहेंगी।








