“गॉडजिला अलनीनो की आहट: कमजोर मानसून, जल संकट और महंगाई की तिहरी चुनौती”
ज्ञान चंद पाटनी

कहते हैं कि कोई भी समस्या अकेली नहीं आती, उसके साथ दूसरी समस्याएं भी आती हैं। गैस और तेल की बढ़ती कीमतों, बेलगाम महंगाई, रुपए में गिरावट के बीच खबर है कि इस बार अलनीनो के कारण भारत में मानसून कमजोर रह सकता है। मौसम वैज्ञानिकों ने 2026 के अलनीनो का नाम फिल्मों में दिखाई देने वाले काल्पनिक डायनासोर ‘गॉडजिला’ पर रखा है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह गॉडजिला अलनीनो 1997-98 और 2015-16 के अलनीनो से भी ज्यादा तीव्र हो सकता है जिन्होंने वैश्विक स्तर पर भारी तबाही मचाई थी। गॉडजिला अलनीनो वैश्विक तापमान को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकता है। साथ ही खाद्य सुरक्षा, पानी की कमी और ऊर्जा आपूर्ति जैसे मुद्दे और गंभीर हो सकते हैं। अलनीनो विश्व स्तर पर भीषण लू, बाढ़ और सूखे को जन्म देता है। भारत में अलनीनो के दौरान मानसून कमजोर हो जाता है। डब्ल्यूएमओ के अनुसार प्रशांत महासागर में तेजी से गर्म हो रहे समुद्री जल के कारण जून से अगस्त के बीच अलनीनो बनने की आशंका अस्सी प्रतिशत है। नवंबर तक इसके 90 प्रतिशत या उससे ज्यादा बने रहने की आशंका है। मौसम विभाग (आइएमडी) ने अपने दूसरे पूर्वानुमान में जून से सितंबर के दौरान देश में दीर्घकालिक औसत का सिर्फ 90 प्रतिशत बारिश होने का अनुमान जताया है। पहले अनुमान में इसे 92 प्रतिशत बताया गया था। अगर मानसून 90 प्रतिशत से नीचे जाता है तो उसे कमजोर मानसून माना जाता है।
वर्ष 1971 से 2020 के आंकड़ों के आधार पर मानसून की औसत वर्षा 87 सेंटीमीटर है। इस दीर्घकालिक औसत के आधार पर ही देश में मानसून के कम या ज्यादा होने का अनुमान लगाया जाता है। इस बार दस प्रतिशत कम बारिश होने की आशंका जताई जा रही है। मानसून के कोर जोन में भी सामान्य से कम बारिश का अनुमान है। इसमें देश के प्रमुख कृषि प्रधान राज्य जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, महाराष्ट्र के कुछ हिस्से, उत्तर प्रदेश और राजस्थान शामिल हैं। भारत की 60 फीसदी से ज्यादा खेती आज भी बारिश पर निर्भर करती है। जून महीने में इन इलाकों में सामान्य से कम बारिश का अनुमान है। यदि जुलाई-अगस्त में भी बारिश कमजोर रहती है तो इसका असर कृषि उत्पादन, जलाशयों के स्तर और खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दिखाई दे सकता है। खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होने से दाल, चावल और सब्जियों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

बारिश कम होने से बांध, तालाब और नदियों में पानी कम भरेगा। इससे सिंचाई के लिए पानी की कमी होगी। भूमिगत जल स्तर गिर सकता है जिससे कुएं और नलकूप सूख सकते हैं। लंबी अवधि में यह जल संकट को बढ़ाएगा। शहरों और गांवों दोनों में पानी की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है। औद्योगिक क्षेत्रों और कृषि क्षेत्रों में पानी की कमी से उत्पादन प्रभावित होगा।
हालात को देखते हुए केंद्र सरकार ने खरीफ सीजन के लिए तैयारी तेज कर दी है। कम बारिश होने की स्थिति में जिला स्तर पर इमरजेंसी और कंटीजेंसी प्लान तैयार किए जा रहे हैं। सरकार का दावा है कि पहले से तैयारी कर किसानों को नुकसान से बचाने पर फोकस किया जा रहा है। इसी रणनीति के तहत बीज, उर्वरक, फसल बीमा, कृषि ऋण, किसान आईडी और राज्यवार कृषि रोडमैप जैसे मुद्दों पर व्यापक रणनीति बनाई गई है। राष्ट्रीय स्तर पर 1.74 लाख क्विंटल बीज का बफर स्टाक तैयार करने का फैसला लिया गया है। जरूरत पड़ने पर प्रभावित जिलों में तुरंत बीज भेजे जाएंगे ताकि दोबारा बुवाई या वैकल्पिक फसल लगाने में किसानों को दिक्कत न हो। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सरकार अलनीनो की स्थिति पर नजर रख रही है। सरकार का दावा है कि अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, फिर भी कमजोर मानसून की स्थिति से किसानों को बचाने के लिए पहले से तैयारी की जा रही है। राज्यों को अलर्ट रहने और जिला स्तर तक तैयारी रखने को कहा गया है। सरकार क्षेत्र विशेष के हिसाब से खेती की योजना बना रही है।
राज्यों को मिट्टी, जलवायु और संसाधनों के अनुसार अलग कृषि रोडमैप तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। कृषि वैज्ञानिकों को अरहर, सोयाबीन और तिलहन जैसी फसलों की कम अवधि वाली और मौसम के अनुकूल नई किस्में विकसित करने के लिए कहा गया है, ताकि कमजोर मानसून की स्थिति में भी उत्पादन प्रभावित न हो। उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर भी सरकार ने भरोसा दिलाया है। संतुलित उर्वरक उपयोग पर भी जोर दिया जा रहा है। इसके लिए एक जून से 30 जून तक देशभर में ‘खेत बचाओ अभियान’ चलाया जा रहा है, जिसमें किसानों को मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड और संतुलित खाद उपयोग के बारे में जागरूक किया जाएगा। सरकार ने अपनी तैयारी का रोडमैप तो घोषित कर दिया है, लेकिन चुनौती इसके सही क्रियान्वयन की है। आमतौर पर सरकारी योजनाएं दिखावटी साबित होती हैं।
दीर्घकालिक उपाय भी जरूरी हैं। इसके लिए जल संरचना का निर्माण, वर्षा जल संचयन, भूमिगत जल पुनर्भरण और सिंचाई सुविधाओं का विस्तार शामिल है। वनों की कटाई रोकें, पौधरोपण पर ध्यान दें और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए। कृषि में जैविक खेती, मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड, और संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा दिया जाए। किसानों को नई तकनीकों के प्रति जागरूक करने के साथ उनको प्रशिक्षित भी किया जाए। सरकार को सिंचाई परियोजनाओं, जल संरक्षण और कृषि अनुसंधान पर निरंतर निवेश करना चाहिए। खाद्य भंडारण और वितरण प्रणाली को मजबूत करना बहुत आवश्यक है ताकि महंगाई नियंत्रित रहे।
सरकार की तैयारी के साथ-साथ जनता को भी सावधानी बरतनी चाहिए। पानी की बचत करें, बारिश के पानी को संचित करें और भूमिगत जल का दोहन कम करें। किसान’खेत बचाओ अभियान’ और अन्य जागरूकता कार्यक्रमों में हिस्सा लें। घर-घर में पानी की बचत के उपाय करें। गाड़ियों धोने में पाइप का इस्तेमाल नहीं करें। परिवार के सदस्यों और पड़ोसियों को पानी बचाने के लिए प्रेरित करें। कम पानी वाली फसलें उगानी चाहिए। ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर का उपयोग करें। समय पर बुवाई करें और मौसम पूर्वानुमान पर ध्यान दें।
अलनीनो की चुनौती बड़ी है लेकिन अगर सब मिलकर काम करें, तो हम इससे पैदा होने वाली समस्याओं से काफी हद तक निपट सकते हैं। पानी की बचत, तकनीक का उपयोग और जागरूकता से कमजोर मानसून के बावजूद खरीफ फसल पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव से बच सकते हैं। साथ ही जल संसाधनों को काफी हद तक सुरक्षित रख सकते हैं। समस्या और उससे निपटने के उपाय पता होने के बावजूद समय रहते ठोस कदम नहीं उठाने का मतलब गंभीर संकट को आमंत्रित करना होगा। हम संकट को न्यूनतम करते हैं या इसे भयावह बनाते हैं, यह हमारे विवेक पर निर्भर करेगा।








