बेरोजगारी, महंगाई और पेपर लीक के खिलाफ डिजिटल विद्रोह की दस्तक
मीम से आंदोलन तक: “कॉकरोच जनता पार्टी” ने क्यों बढ़ाई सत्ता की बेचैनी
राजेश श्रीवास्तव

अपने देश में इन दिनों सोशल मीडिया पर एक अजीब-सी हलचल देखने को मिल रही है। वैसे तो देश की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी डिजिटल दुनिया और चुनावी राजनीति दोनों में खुद को सबसे मजबूत मानती है, लेकिन उसे एक “कांकरोच” से कड़ी टक्कर मिल रही है। टक्कर ऐसी कि बार-बार ब्लॉक करना पड़ रहा है। इंस्टाग्राम पर “कांकरोच जनता पार्टी” (सीजेपी) नाम के एक व्यंगात्मक अकाउंट ने देखते ही देखते करोड़ों फॉलोअर्स जुटा लिए और यह संख्या भाजपा के आधिकारिक हैंडल से भी आगे निकल गई। हालत यह है कि एक्स पर उसका अकाउंट बंद हो गया, संचालकों को धमकियां मिलने लगीं और सोशल मीडिया पर इसे पाकिस्तान व नेपाल प्रायोजित बताने की मुहिम शुरू हो गई। हद तो तब हो गई जब सोनम वांगचुक ने भी समर्थन देते हुए कहा— “मैं भी कांकरोच हूं।”
पहली नजर में यह सिर्फ जेन-जी का कोई डिजिटल मजाक लगता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह करोड़ों शिक्षित बेरोजगार युवाओं के भीतर सुलग रहे असंतोष, हताशा और व्यवस्था के प्रति गुस्से का अहिंसक विस्फोट है। इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब सूर्यकांत की एक टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर आक्रोश फैल गया। बेरोजगार युवाओं और कार्यकर्ताओं की तुलना “कांकरोच” और “परजीवी” से किए जाने की खबर वायरल हुई और उसी आक्रोश को मंच मिला “कांकरोच जनता पार्टी” के रूप में।
हालांकि बाद में सीजेआई ने सफाई दी कि उनका इरादा फर्जी डिग्रीधारकों की आलोचना करना था, लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चुका था। अभिजीत दीपके ने इस अपमान को हथियार बनाया और युवाओं को उसका कारतूस। उन्होंने “कांकरोच जनता पार्टी” की नींव रखी। दरअसल, कांकरोच ऐसा जीव है जिसे सबसे तुच्छ समझा जाता है, जिसे हर कोई कुचलना चाहता है, लेकिन वह हर विपरीत परिस्थिति में भी जिंदा बच जाता है। युवाओं ने इसी प्रतीक को सम्मान की तरह अपना लिया। उनका नारा बन गया— “उन्होंने हमें कुचलने की कोशिश की, लेकिन हम फिर लौट आए।”
भारत भले दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने का दावा करता हो, लेकिन “रोजगारविहीन विकास” की कड़वी सच्चाई भी सामने है। हर साल लाखों छात्र डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन पर्याप्त नौकरियां नहीं हैं। यही वजह है कि बेरोजगारी अब सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक बेचैनी का कारण बन चुकी है।
इस आंदोलन को और हवा दी नीट पेपर लीक जैसे मामलों ने। जब युवाओं को लगा कि पारंपरिक राजनीतिक दल और मुख्यधारा का मीडिया उनकी पीड़ा को गंभीरता से नहीं उठा रहा, तो उन्होंने अपना डिजिटल मंच खड़ा कर लिया। “कांकरोच जनता पार्टी” उसी असंतोष का प्रतीक बन गई। इस मंच ने बेरोजगारी, परीक्षा प्रणाली, शिक्षा व्यवस्था, मीडिया की स्वतंत्रता और राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को व्यंग्य और मीम संस्कृति के जरिए उठाया। यहां तक कि युवाओं ने कांकरोच की ड्रेस पहनकर दिल्ली में सफाई अभियान और विरोध प्रदर्शन भी शुरू कर दिए। यानी यह आंदोलन सिर्फ स्क्रीन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सड़क तक पहुंच गया।
इसकी ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा और ऑनलाइन नियमों का हवाला देकर इसके एक्स अकाउंट को भारत में ब्लॉक करा दिया। भाजपा नेता इसे विपक्ष की साजिश और अराजकता फैलाने की कोशिश बताते हैं। उनका दावा है कि इसके फॉलोअर्स “बॉट्स” और विदेशी हैं। वहीं शशि थरूर जैसे नेता इसे युवाओं के वास्तविक दर्द की अभिव्यक्ति मानते हैं। उनका कहना है कि चाहे इसके पीछे कोई भी हो, लेकिन यह तय है कि देश का युवा बेरोजगारी और महंगाई से परेशान है और इस असंतोष को सुनना ही होगा।
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने दावा किया कि सरकार ने उनकी वेबसाइट बंद करा दी, जिस पर लाखों लोगों ने रजिस्ट्रेशन किया था। उन्होंने यह भी कहा कि उनके निजी अकाउंट हैक किए गए और उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलीं। दूसरी ओर, सोनम वांगचुक ने “कॉकरोच मूवमेंट” का समर्थन करते हुए कहा— “मैं न बेरोजगार हूं, न आलसी, इसलिए पार्टी का सदस्य नहीं बन सकता, लेकिन मैं खुद को ऑनरेरी कॉकरोच मानता हूं।”
कुल मिलाकर यह पूरा घटनाक्रम एक बड़े सामाजिक संकेत की तरह है। यह बताता है कि बड़ी संख्या में लोग मौजूदा व्यवस्था से संतुष्ट नहीं हैं। बेरोजगारी, महंगाई और अवसरों की कमी ने युवाओं के भीतर गहरी नाराजगी पैदा कर दी है। सोशल मीडिया पर उभर रहे ऐसे अभियान उसी बेचैनी की अभिव्यक्ति हैं। सरकार यदि इसे सिर्फ मजाक, मीम या ट्रोल संस्कृति मानकर नजरअंदाज करेगी, तो शायद वह उस असली गुस्से को समझने से चूक जाएगी जो धीरे-धीरे डिजिटल दुनिया से निकलकर जमीन पर उतर रहा है।








