व्यंग्य : हाँ, मैं सरकारी बाबू के रूप में कॉकरोच हूँ

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फाइलों की सीलन, नियमों की भूलभुलैया और ‘कल आइए’ संस्कृति के बीच जीवित एक सरकारी आत्मकथा

डॉ. शैलेश शुक्ला 

हाँ, मैं सरकारी बाबू के रूप में कॉकरोच हूँ। वही प्रजाति, जो इस महान गणराज्य की धूल भरी अलमारियों, फाइलों की सीलन, टूटे पंखों, चाय के दागों, पान की पीकों, सरकारी मुहरों और “अभी साहब मीटिंग में हैं” जैसी अमर पंक्तियों के बीच दशकों से जीवित है।

यदि भारत एक विशाल लोकतांत्रिक जंगल है, तो मैं उसका सबसे टिकाऊ जीव हूँ। सरकारें बदलीं, मंत्री बदले, योजनाएँ बदलीं, नारे बदले, विभागों के नाम बदले, यहाँ तक कि मेज पर रखी गांधीजी की तस्वीर भी नई छपकर आ गई, लेकिन मैं नहीं बदला। मैं वही रहा — कुर्सी पर तिरछा बैठा, चश्मा नाक पर टिकाए, फाइलें उलटता-पलटता, जनता को “कल आइए” कहता हुआ एक अनुभवी सरकारी बाबू।

कभी मैं भी आदर्शवादी इंसान था। प्रतियोगी परीक्षा पास की थी। घर में मिठाइयाँ बंटी थीं। मोहल्ले में सम्मान बढ़ गया था। लोगों ने कहा था — “अब बेटा देश की सेवा करेगा।” मुझे भी लगा था कि व्यवस्था बदल दूँगा, भ्रष्टाचार मिटाऊँगा, जनता की परेशानियाँ कम कर दूँगा।

लेकिन नौकरी के पहले ही दिन एक वरिष्ठ बाबू ने ज्ञान दिया —
“काम इतना करो कि नौकरी चलती रहे, और इतना कम भी मत करो कि अधिकारी नाराज़ हो जाए।”

उसी दिन मेरे भीतर का आदर्शवादी युवक धीरे-धीरे मरने लगा और एक सरकारी कॉकरोच जन्म लेने लगा। क्योंकि सरकारी दफ्तर आदर्शवाद का श्मशान और व्यवहारिकता की प्रयोगशाला होता है।

कॉकरोच की सबसे बड़ी विशेषता होती है — हर परिस्थिति में जीवित रहना। बिजली चली जाए, कीटनाशक छिड़क दो, घर बदल दो — वह फिर भी बच जाता है। सरकारी बाबू भी कुछ ऐसे ही होते हैं। सरकार बदल जाए, नई नीति आ जाए, विभाग का पुनर्गठन हो जाए, जाँच बैठ जाए, तबादला हो जाए — बाबू फिर भी जीवित रहता है।

हम लोकतंत्र के वे जीव हैं, जिन पर किसी सुधार का स्थायी प्रभाव नहीं पड़ता। सुधार हमारे ऊपर से ऐसे निकल जाते हैं जैसे बरसात का पानी पुरानी सरकारी इमारत की दीवार से।

मुझे सबसे अधिक आनंद “फाइल” में आता है। भारतीय प्रशासन में फाइल केवल कागज़ नहीं होती, वह जीवित प्राणी होती है। उसका जन्म होता है, वह टेबल-टेबल यात्रा करती है, टिप्पणियाँ झेलती है, नोटशीटों में संघर्ष करती है और अंततः या तो स्वीकृत होकर स्वर्ग चली जाती है या आपत्ति लगकर पुनर्जन्म ले लेती है।

एक साधारण नागरिक सोचता है कि उसने आवेदन दिया है। उसे क्या पता कि उसने एक ऐसी आत्मा को जन्म दिया है, जो कई महीनों तक सरकारी गलियारों में भटकती रहेगी। और मैं? मैं उस आत्मा का पुरोहित हूँ।

मैं लिखता हूँ — “विचारार्थ प्रस्तुत।”
ऊपर से आता है — “पुनर्विचार करें।”
फिर नीचे लिखा जाता है — “नियमों के आलोक में परीक्षण आवश्यक।”
फिर ऊपर से टिप्पणी आती है — “स्पष्ट नहीं।”
और अंततः नीचे आदेश उतरता है — “स्पष्ट किया जाए।”

इस प्रकार एक फाइल भारतीय लोकतंत्र की तीर्थयात्रा पूरी करती है।

कॉकरोच अँधेरे में पनपता है, सरकारी बाबू अस्पष्टता में। जितने जटिल नियम होंगे, उतनी अधिक हमारी शक्ति होगी। यदि प्रक्रियाएँ सरल हो जाएँ, तो जनता सीधे काम करवा लेगी। फिर हमारा महत्व कहाँ रहेगा?

इसलिए व्यवस्था को इतना उलझा दो कि आदमी जन्म प्रमाणपत्र बनवाते-बनवाते दर्शनशास्त्री हो जाए। यही कारण है कि भारतीय दफ्तर में सबसे शक्तिशाली व्यक्ति मंत्री नहीं, वह बाबू होता है जिसे पता होता है कि कौन-सी फाइल कहाँ अटकी है। मंत्री आते-जाते रहते हैं, बाबू स्थायी सत्य है।

मुझे जनता से बहुत प्रेम है। रोज सुबह वह फाइल लेकर आती है — चेहरे पर आशा, हाथ में आवेदन और आँखों में विनम्रता। मैं तुरंत समझ जाता हूँ कि यह नया नागरिक है या अनुभवी।

नया नागरिक पूछता है — “सर, काम कितने दिन में हो जाएगा?”
अनुभवी नागरिक धीरे से कहता है — “कुछ सेवा-पानी लगेगा क्या?”

यही भारतीय प्रशासनिक संस्कृति का सबसे बड़ा व्यंग्य है। भ्रष्टाचार अब अपराध कम और प्रक्रिया का अनौपचारिक हिस्सा अधिक लगता है। रिश्वत को भी इतनी सभ्य भाषा दे दी गई है कि वह सामाजिक शिष्टाचार जैसी प्रतीत होती है — “चाय-पानी”, “व्यवस्था”, “सहयोग”, “कुछ देख लीजिए”…।

धीरे-धीरे मैंने समझ लिया कि सरकारी दफ्तर काम करने की जगह कम, काम को नियंत्रित करने की जगह अधिक है। बाहर दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष और डिजिटल क्रांति की बात कर रही होती है और भीतर हम अब भी पूछ रहे होते हैं — “तीन प्रतियों में आवेदन कहाँ है?”

जनता सोचती है कि कंप्यूटर आने से व्यवस्था बदल जाएगी। उसे क्या पता कि सरकारी बाबू कंप्यूटर को भी फाइल संस्कृति सिखा देता है। पहले फाइल अलमारी में खोती थी, अब “सिस्टम एरर” में खो जाती है। माध्यम बदलता है, मानसिकता नहीं।

निरीक्षण का दृश्य सबसे मनोरंजक होता है। जिस कार्यालय में साल भर धूल जमी रहती है, निरीक्षण से एक दिन पहले वह दुल्हन बन जाता है। टूटे पंखे साफ हो जाते हैं, उपस्थिति पंजिका पूरी भर जाती है, कर्मचारी समय से बैठ जाते हैं। ऐसा लगता है मानो पूरे विभाग में अचानक राष्ट्रभक्ति का विस्फोट हो गया हो।

निरीक्षण अधिकारी आता है, चाय पीता है, दो फाइलें पलटता है और गंभीर स्वर में कहता है —
“कार्यप्रणाली में सुधार की आवश्यकता है।”

फिर चला जाता है। अगले दिन कार्यालय फिर अपने मूल भारतीय स्वरूप में लौट आता है।

कॉकरोच को मारना कठिन होता है, सरकारी बाबू को उससे भी कठिन। शिकायत होगी, जाँच बैठेगी, बयान होंगे, फाइल बनेगी और अंत में टिप्पणी लिखी जाएगी —
“प्रथम दृष्टया आरोप सिद्ध नहीं होते।”

और मैं फिर उसी कुर्सी पर बैठा मिलूँगा। क्योंकि भारतीय प्रशासन में दंड से अधिक शक्तिशाली चीज़ प्रक्रिया होती है। यहाँ आदमी गलती से नहीं, प्रक्रिया से थकता है।

भारतीय शासन व्यवस्था बैठकों पर चलती है। समस्या चाहे कितनी भी गंभीर हो, पहले बैठक होगी, फिर उपसमिति बनेगी, फिर सुझाव आएँगे, फिर अगली बैठक होगी।

यदि समस्या फिर भी बची रह जाए तो “उच्चस्तरीय बैठक” बुलाई जाएगी। इस देश में कई समस्याएँ इसलिए जीवित हैं क्योंकि वे बैठकों में सुरक्षित रखी गई हैं।

और हम बाबू उन बैठकों के आधिकारिक लेखक हैं। हम कार्यवृत्त लिखते हैं —
“विस्तृत चर्चा उपरांत निर्णय लिया गया कि विषय पर पुनर्विचार आवश्यक है।”

वाह प्रशासन! तुमने निर्णय न लेने की कला को भी दस्तावेज़ी गरिमा दे दी।

धीरे-धीरे मैं भी बदल गया। पहले जनता की परेशानी देखकर दुख होता था, अब मैं पहले दस्तावेज़ देखता हूँ। पहले लगता था कि नियम जनता की सुविधा के लिए होते हैं, अब समझ गया हूँ कि जनता को नियमों के माध्यम से नियंत्रित भी किया जाता है।

एक तरफ सरकार कहती है — “डिजिटल भारत।”
दूसरी तरफ नागरिक से दस जगह हस्ताक्षर माँगे जाते हैं।

एक तरफ नारा है — “भ्रष्टाचार मुक्त शासन।”
दूसरी तरफ बिना पहचान के फाइल आगे नहीं बढ़ती।

एक तरफ जनता को “जनार्दन” कहा जाता है, दूसरी तरफ वही जनता घंटों लाइन में खड़ी रहती है, जबकि प्रभावशाली व्यक्ति सीधे भीतर चला जाता है।

यही भारतीय प्रशासन का सबसे बड़ा व्यंग्य है — यहाँ समानता का बोर्ड सबसे ऊँचा लगा होता है और असमानता सबसे व्यवस्थित ढंग से लागू होती है।

नेताओं से भी मेरा गहरा रिश्ता है। वे मंच से कहते हैं — “भ्रष्टाचार खत्म करेंगे।” फिर धीरे से अपने आदमी की फाइल भेज देते हैं — “ज़रा देख लीजिए।” अधिकारी आदेश देता है, बाबू मुस्कुराता है और व्यवस्था चलती रहती है।

मैं मानता हूँ कि सभी सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट नहीं होते। हजारों लोग ईमानदारी से काम करते हैं। कई अधिकारी और कर्मचारी कठिन परिस्थितियों में व्यवस्था संभालते हैं। लेकिन सच यह भी है कि पूरी प्रणाली ने ऐसी संस्कृति बना दी है, जहाँ काम करना असाधारण माना जाता है और टालना सामान्य। यहाँ दक्षता चौंकाती है और देरी परंपरा कहलाती है।

आज मैं पूरी ईमानदारी से स्वीकार करता हूँ — हाँ, मैं सरकारी बाबू के रूप में कॉकरोच हूँ। मैं फाइलों की सीलन, नोटशीटों की धूल, कार्यालयी चाय की गंध, नियमों की भूलभुलैया और जनता की विवशता के बीच जीवित रहने वाला जीव हूँ।

मैं हर सरकार के अनुसार अपना व्यवहार बदल लेता हूँ। हर नई योजना को पुराने तरीके से लागू कर लेता हूँ। हर सुधार को प्रक्रिया में बदल देता हूँ। और सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि जनता मुझे गाली भी देती है और अपने काम के लिए मेरे सामने विनम्र भी बनी रहती है।

शाम को जब कार्यालय खाली होने लगता है, पुराना पंखा चरमराता रहता है, मेज पर धूल जमी फाइलें पड़ी रहती हैं, चाय के कप में मक्खी डूब चुकी होती है और मैं अंतिम टिप्पणी लिख रहा होता हूँ —
“अगली कार्यवाही हेतु प्रस्तुत।”

तब कभी-कभी सचमुच लगता है कि मैं इंसान नहीं रहा।

मैं भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की दरारों में जीवित रहने वाला एक अनुभवी, धैर्यवान और लगभग अमर सरकारी कॉकरोच बन चुका हूँ।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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