धधकती धूणी, तपते संत और बड़ा सवाल: क्या विकास का यही मॉडल है?

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आस्था, पर्यावरण और औद्योगिक विकास के टकराव पर गंभीर चिंतन

– बाबूलाल नागा

राजस्थान की तपती धरती पर इन दिनों एक ऐसी आग जल रही है, जो केवल धूणी की आग नहीं है। यह आग आस्था, पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत को बचाने की पीड़ा की आग है। दादू दयाल की निर्वाण स्थली भैराणा धाम आज संघर्ष का प्रतीक बन चुकी है। राजस्थान के दूदू क्षेत्र के बिचून स्थित यह 500 वर्ष पुरानी तपोभूमि केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति, साधना और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रही है। आज यहां 40 डिग्री से अधिक तापमान के बीच साधु-संत अग्नितप कर रहे हैं, आमरण अनशन पर बैठे हैं और जीवित समाधि लेने तक की चेतावनी दे चुके हैं।

सवाल केवल इतना नहीं है कि एक धार्मिक स्थल के पास औद्योगिक क्षेत्र विकसित किया जा रहा है। असली प्रश्न यह है कि क्या विकास के नाम पर सदियों पुरानी आध्यात्मिक धरोहर, जंगल, जल स्रोत और जैव विविधता को कुचल देना स्वीकार्य है?

भैराणा धाम कोई सामान्य स्थान नहीं। दादू पंथियों के लिए इसका महत्व वैसा ही है जैसा सनातन परंपरा में हरिद्वार का माना जाता है। अरावली की गोद में स्थित यह क्षेत्र वर्षों से साधना, समाधि, हरियाली और प्राकृतिक शांति का केंद्र रहा है। यहां संतों की समाधियां हैं, प्राकृतिक नालों में अस्थि विसर्जन की परंपरा है और दादू दयाल की तपस्या से जुड़ी आस्था आज भी हजारों लोगों को यहां खींच लाती है। लेकिन अब यही भूमि औद्योगिक विकास की योजनाओं के बीच घिरती दिखाई दे रही है।

राजस्थान स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट एंड इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन द्वारा यहां औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने की योजना ने पूरे इलाके में तनाव पैदा कर दिया है। संघर्ष समिति और स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि 800 बीघा से अधिक भूमि आवंटित की गई है और हजारों पेड़ों की कटाई कर क्षेत्र को समतल किया जा रहा है। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह केवल पेड़ों की कटाई का मामला नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र को नष्ट करने का विषय है।

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि क्या सरकार और विकास एजेंसियां पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर सचमुच गंभीर हैं? अरावली पर्वतमाला केवल पहाड़ियों की श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ है। राजस्थान हिल्स पॉलिसी 2024 जैसी व्यवस्थाएं पहाड़ियों के आसपास निर्माण गतिविधियों और प्राकृतिक नालों से छेड़छाड़ रोकने की बात करती हैं। पहाड़ियों के आसपास नो-कंस्ट्रक्शन जोन का उद्देश्य भी यही था कि प्राकृतिक संतुलन बना रहे। ऐसे में यदि भैराणा धाम क्षेत्र में बड़े स्तर पर समतलीकरण, पेड़ कटाई और निर्माण की प्रक्रिया चल रही है, तो यह स्वाभाविक है कि लोग सवाल उठाएं—क्या नियमों का पालन हुआ?

संघर्ष समिति का आरोप और भी गंभीर है। उनका कहना है कि पर्यावरणीय मंजूरी के दौरान क्षेत्र को “झाड़ियों वाला” बताया गया, जबकि मौके पर हजारों पेड़ मौजूद थे। स्थानीय लोगों का दावा है कि 30 से 40 हजार तक पेड़ काटे गए, कई पेड़ों को मिट्टी में दबा दिया गया और वन्य जीवों के आश्रय नष्ट हो गए। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय तथ्यों को छिपाने जैसा गंभीर मामला भी हो सकता है। सवाल उठता है कि क्या विकास परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय रिपोर्टें केवल औपचारिक दस्तावेज बनकर रह गई हैं?

आज देश में विकास के नाम पर बड़ी-बड़ी परियोजनाओं की होड़ लगी हुई है। उद्योग चाहिए, रोजगार चाहिए, निवेश चाहिए—इससे किसी को इनकार नहीं। लेकिन क्या विकास का अर्थ केवल कंक्रीट, फैक्ट्री और जमीन का व्यावसायिक उपयोग रह गया है? क्या जंगल, पहाड़, जल स्रोत और सांस्कृतिक धरोहरें विकास की कीमत पर समाप्त कर देने योग्य वस्तुएं हैं? यदि हर प्राकृतिक और आध्यात्मिक स्थल को औद्योगिक विस्तार के लिए खाली कराया जाएगा, तो आने वाली पीढ़ियों के हिस्से में क्या बचेगा?

भैराणा धाम का संघर्ष इसी सवाल को केंद्र में लाता है। यहां बैठे संत केवल धार्मिक अधिकार की बात नहीं कर रहे, बल्कि वे प्रकृति और संतुलित विकास की भी बात कर रहे हैं। धूणी के सामने तप कर रहे संतों की तस्वीरें केवल आस्था नहीं दिखातीं, वे व्यवस्था से एक मौन प्रश्न भी पूछती हैं—क्या किसी परियोजना की योजना बनाते समय वहां की सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को समझना जरूरी नहीं?

विडंबना यह है कि एक ओर सरकारें पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और हरित विकास की बातें करती हैं, वहीं दूसरी ओर हजारों पेड़ों की कटाई और पहाड़ी क्षेत्रों में भारी निर्माण के आरोप सामने आते हैं। राजस्थान जैसे पहले से जल संकट और मरुस्थलीकरण झेल रहे राज्य में यदि अरावली क्षेत्र के जंगल और प्राकृतिक जल स्रोत खत्म होंगे, तो उसका प्रभाव केवल एक इलाके तक सीमित नहीं रहेगा।

भैराणा धाम का मामला यह भी दिखाता है कि विकास की नीतियों में स्थानीय समुदायों और धार्मिक-सांस्कृतिक भावनाओं की भागीदारी कितनी आवश्यक है। यदि किसी परियोजना के कारण हजारों लोगों की आस्था आहत होती है, पर्यावरण पर खतरा पैदा होता है और सामाजिक तनाव बढ़ता है, तो क्या उस परियोजना की समीक्षा नहीं होनी चाहिए? क्या सरकार और प्रशासन का दायित्व केवल भूमि आवंटन तक सीमित है, या समाज और प्रकृति के बीच संतुलन बनाना भी उनकी जिम्मेदारी है?

आज भैराणा धाम की पहाड़ियों में उठती आवाज केवल दादू पंथियों की आवाज नहीं है। यह उस पूरे समाज की चिंता है जो विकास और संरक्षण के बीच संतुलन चाहता है। क्योंकि किसी भी सभ्यता की पहचान केवल उसके उद्योगों और निवेश से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपनी संस्कृति, प्रकृति और विरासत को कितना बचा पाती है।

यदि भैराणा धाम जैसी तपोभूमियों की पुकार भी अनसुनी कर दी गई, तो आने वाली पीढ़ियां शायद केवल इतिहास की किताबों में पढ़ेंगी कि कभी यहां हरियाली थी, पक्षियों का कलरव था, साधना थी और प्रकृति के बीच बसती आध्यात्मिक शांति थी। तब हमारे पास विकास की चमक तो होगी, लेकिन खो चुकी विरासत का पछतावा भी साथ होगा।

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Author: Bharat Sarathi

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