संस्थाओं की गरिमा और जवाबदेही के बीच संतुलन ही लोकतंत्र की असली कसौटी
कमलेश पांडेय

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 53वें मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत द्वारा “सिस्टम पर हमले की प्रवृत्ति” पर की गई तल्ख टिप्पणी केवल एक न्यायिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि हमारे समय की गहरी लोकतांत्रिक बेचैनी का संकेत है। यह टिप्पणी उस दौर में आई है, जब देश में संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, मीडिया और प्रशासनिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर लगातार बहस और अविश्वास का माहौल बनता जा रहा है।
दरअसल, लोकतंत्र केवल संविधान की किताबों या चुनावी प्रक्रियाओं से नहीं चलता, बल्कि जनता के संस्थाओं पर भरोसे से संचालित होता है। जब नागरिक यह महसूस करने लगते हैं कि व्यवस्था उनके लिए समान अवसर सुनिश्चित नहीं कर पा रही, तब असंतोष स्वाभाविक रूप से जन्म लेता है। यही असंतोष कई बार व्यवस्था-विरोधी भाषा, सोशल मीडिया ट्रोलिंग और संस्थाओं पर व्यापक अविश्वास के रूप में सामने आता है।
हालांकि, यह भी उतना ही सच है कि किसी संस्था की आलोचना को “सिस्टम पर हमला” कहकर खारिज कर देना लोकतांत्रिक भावना के अनुकूल नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र में सवाल पूछना, असहमति व्यक्त करना और जवाबदेही मांगना नागरिक अधिकारों का मूल हिस्सा है। स्वयं न्यायपालिका ने अनेक ऐतिहासिक फैसलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति को लोकतंत्र की आत्मा बताया है।

समस्या तब पैदा होती है, जब आलोचना तथ्यों और संवैधानिक बहस की जगह व्यक्तिगत हमलों, दुष्प्रचार और संस्थाओं को पूरी तरह अवैध ठहराने तक पहुंच जाती है। इससे जनता का भरोसा कमजोर होता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थिरता प्रभावित होती है। इसलिए यह आवश्यक है कि संस्थाओं की आलोचना हो, लेकिन संवैधानिक मर्यादा और तथ्यात्मक आधार के साथ।
आज भारत का बेरोजगार और प्रतियोगी युवा वर्ग इस बहस के केंद्र में दिखाई देता है। भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, राजनीतिक संरक्षण और वर्षों तक लंबित भर्तियों ने युवाओं के भीतर व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास पैदा किया है। युवा यह महसूस करने लगे हैं कि मेहनत और योग्यता से अधिक “संपर्क” और “प्रभाव” महत्वपूर्ण हो गए हैं। यही कारण है कि उनके भीतर व्यवस्था के प्रति असंतोष तेजी से बढ़ रहा है।

यह स्थिति केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक चेतावनी भी है। यदि युवाओं को लगे कि व्यवस्था निष्पक्ष नहीं है, तो लोकतंत्र के प्रति उनका विश्वास कमजोर हो सकता है। इसलिए सरकारों की जिम्मेदारी केवल रोजगार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अवसर पारदर्शी, निष्पक्ष और योग्यता आधारित हों।
इसके साथ ही यह समझना भी जरूरी है कि सामाजिक न्याय, आरक्षण और प्रतिनिधित्व जैसी व्यवस्थाएं ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करने के उद्देश्य से बनाई गई थीं। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब इनका उपयोग वास्तविक सुधार के बजाय राजनीतिक लाभ और वोट बैंक की राजनीति का माध्यम बनने लगे। तब योग्य युवाओं के भीतर यह भावना पैदा होती है कि व्यवस्था समान अवसर नहीं दे रही।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संस्थाएं और युवा आबादी होती हैं। यदि दोनों के बीच विश्वास का संकट गहरा जाए, तो स्थिति खतरनाक हो सकती है। इसलिए आज सबसे अधिक जरूरत इस बात की है कि संस्थाएं अपनी पारदर्शिता, निष्पक्षता और आत्मसुधार की क्षमता को मजबूत करें, जबकि नागरिक और राजनीतिक समूह आलोचना को जिम्मेदारी और संवैधानिक मर्यादा के साथ रखें।
असल में लोकतंत्र का संतुलन इसी में है कि संस्थाओं का सम्मान भी बना रहे और उनकी जवाबदेही भी सुनिश्चित होती रहे। क्योंकि बिना जवाबदेही के संस्थाएं निरंकुश हो सकती हैं और बिना संस्थागत सम्मान के लोकतंत्र अराजकता की ओर बढ़ सकता है। आने वाले समय में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह “योग्यता आधारित अवसर” और “सामाजिक न्याय” — दोनों के बीच संतुलन कैसे स्थापित करता है।








