त्रिपुरा से अरुणाचल, मणिपुर, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम तक बदलती राजनीतिक रणनीतियों का व्यापक विश्लेषण
– एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

भारतीय राजनीति का वर्तमान दौर केवल वैचारिक संघर्ष या संगठनात्मक निष्ठा तक सीमित नहीं रह गया है। अब राजनीति चुनावी गणित, सामाजिक समीकरण, क्षेत्रीय प्रभाव, मीडिया प्रबंधन और सत्ता रणनीति का अत्यंत जटिल मॉडल बन चुकी है। पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में जो सबसे बड़ा परिवर्तन देखने को मिला है, वह है — दलबदल को “रणनीतिक निवेश” के रूप में इस्तेमाल करना।
आज राजनीतिक दलों, विशेषकर भाजपा, ने यह समझ लिया है कि केवल वैचारिक विस्तार से उन राज्यों में राजनीतिक विजय संभव नहीं है जहां दशकों से क्षेत्रीय दलों का प्रभुत्व रहा है। ऐसे में उन प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़ना, जिनके पास जनाधार, जातीय समीकरणों पर पकड़ और मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क हो, एक नई राजनीतिक रणनीति के रूप में उभरा है।
वैचारिक राजनीति से चुनावी राजनीति की ओर संक्रमण

एक समय था जब किसी दल में वर्षों तक संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता ही नेतृत्व के शीर्ष तक पहुंचते थे। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। आज “विनिंग एबिलिटी” यानी चुनाव जिताने की क्षमता, वैचारिक निष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है। राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता सत्ता प्राप्त करना और उसे बनाए रखना बन चुकी है।
यही कारण है कि दूसरे दलों से आए नेताओं को केवल पार्टी सदस्य नहीं बनाया जा रहा, बल्कि उन्हें मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री जैसे सर्वोच्च पद भी दिए जा रहे हैं। यह संकेत है कि राजनीति अब “स्थायी विचारधारा” से अधिक “स्थायी सत्ता रणनीति” पर आधारित होती जा रही है।
पश्चिम बंगाल : शुभेंदु अधिकारी मॉडल
पश्चिम बंगाल लंबे समय तक भाजपा के लिए सबसे कठिन राजनीतिक राज्यों में गिना जाता था। यहां तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी का मजबूत जनाधार था। भाजपा ने केवल वैचारिक संघर्ष पर निर्भर रहने के बजाय तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और महत्वाकांक्षा को पहचानने की रणनीति अपनाई।
शुभेंदु अधिकारी, जो कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में शामिल थे, भाजपा के लिए बंगाल में सबसे आक्रामक राजनीतिक चेहरा बनकर उभरे। भाजपा ने उन्हें न केवल स्वीकार किया बल्कि शीर्ष नेतृत्व में स्थान देकर यह स्पष्ट संदेश दिया कि चुनावी प्रभाव और क्षेत्रीय पकड़ अब सर्वोच्च राजनीतिक पूंजी है।
हालांकि इसी के साथ भाजपा पर राजनीतिक नैतिकता को लेकर गंभीर प्रश्न भी उठे। नारदा स्टिंग मामले में जिन नेताओं पर भाजपा कभी भ्रष्टाचार के आरोप लगाती थी, उन्हीं नेताओं को पार्टी में शामिल करने के बाद विपक्ष ने भाजपा पर “वॉशिंग मशीन राजनीति” का आरोप लगाया।
असम : हिमंत बिस्वा सरमा और पूर्वोत्तर रणनीति
असम में हिमंत बिस्वा सरमा का उदय भारतीय राजनीति के सबसे बड़े रणनीतिक परिवर्तनों में गिना जाता है। कभी कांग्रेस के प्रमुख रणनीतिकार रहे हिमंत सरमा भाजपा में शामिल हुए और देखते ही देखते पूर्वोत्तर राजनीति का केंद्रीय चेहरा बन गए।
भाजपा ने उन्हें केवल राजनीतिक आश्रय नहीं दिया बल्कि असम का मुख्यमंत्री बनाकर यह दिखाया कि क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाले नेताओं को राष्ट्रीय रणनीति के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है। आज पूर्वोत्तर भारत में भाजपा के विस्तार का सबसे बड़ा श्रेय हिमंत बिस्वा सरमा को दिया जाता है।
यह भाजपा की उस राजनीतिक समझ का परिणाम है जिसमें स्थानीय प्रभावशाली चेहरों को पार्टी के राष्ट्रीय ढांचे में समाहित कर क्षेत्रीय राजनीति का पुनर्गठन किया गया।
बिहार, त्रिपुरा, मणिपुर और अरुणाचल का प्रयोग
बिहार में सम्राट चौधरी का उभार इसी रणनीति का नया उदाहरण माना जा रहा है। पहले विभिन्न दलों से जुड़े रहे सम्राट चौधरी भाजपा में आने के बाद तेजी से शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचे। यह स्पष्ट संकेत है कि भाजपा अब “पुराने बनाम नए” की बहस से आगे निकल चुकी है।
त्रिपुरा में माणिक साहा, मणिपुर में एन. बीरेन सिंह और अरुणाचल प्रदेश में पेमा खांडू की राजनीतिक यात्राएं भी यही दर्शाती हैं कि भाजपा ने क्षेत्रीय नेतृत्व के पुनर्निर्माण की कला में महारत हासिल कर ली है।
विशेषकर अरुणाचल प्रदेश का घटनाक्रम भारतीय राजनीति के सबसे रोचक अध्यायों में शामिल है, जहां कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे पेमा खांडू ने पूरी सरकार के साथ राजनीतिक दल बदला और अंततः भाजपा में विलय कर लिया। यह केवल दलबदल नहीं बल्कि संपूर्ण सत्ता संरचना के पुनर्गठन का उदाहरण था।
डबल इंजन सरकार और क्षेत्रीय चेहरे
भाजपा लगातार “डबल इंजन सरकार” का विचार प्रस्तुत करती रही है — यानी केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार होने से विकास कार्यों में तेजी आती है। लेकिन इस मॉडल को सफल बनाने के लिए राज्यों में प्रभावशाली स्थानीय चेहरों की आवश्यकता थी।
यही कारण है कि पार्टी ने उन नेताओं को आगे बढ़ाया जिनकी अपने क्षेत्र में मजबूत व्यक्तिगत पकड़ थी। इससे भाजपा को दोहरा लाभ मिला —
- विपक्ष कमजोर हुआ,
- और पार्टी को स्थानीय स्तर पर सामाजिक स्वीकार्यता मिली।
विपक्ष के आरोप और राजनीतिक नैतिकता की बहस

इस रणनीति की सबसे बड़ी आलोचना राजनीतिक नैतिकता को लेकर होती रही है। विपक्ष का आरोप है कि भाजपा भ्रष्टाचार के मुद्दे को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करती है और जैसे ही कोई नेता भाजपा में शामिल होता है, उसके खिलाफ आरोप गौण हो जाते हैं।
हालांकि यह भी सत्य है कि दलबदल की राजनीति केवल भाजपा तक सीमित नहीं रही। कांग्रेस और कई क्षेत्रीय दल भी समय-समय पर यही रणनीति अपनाते रहे हैं। अंतर केवल इतना है कि भाजपा ने इसे अत्यंत संगठित और आक्रामक रूप दिया है।
दक्षिण भारत : अगला राजनीतिक रणक्षेत्र
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यही रणनीति दक्षिण भारत में और तेज दिखाई दे सकती है। तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे राज्यों में भाजपा अभी पूर्ण राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित नहीं कर पाई है।
ऐसे में संभावना है कि पार्टी प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं को अपने साथ जोड़ने की रणनीति को और अधिक आक्रामक रूप से अपनाएगी। तेलंगाना में पहले ही कांग्रेस और बीआरएस के कई नेता भाजपा में शामिल हो चुके हैं।
क्या विचारधारा अप्रासंगिक हो रही है?
भारतीय लोकतंत्र के सामने आज कई गंभीर प्रश्न खड़े हैं —
- क्या राजनीति में विचारधारा की भूमिका कम हो रही है?
- क्या संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं का महत्व घट रहा है?
- क्या राजनीति अब केवल सत्ता प्रबंधन का माध्यम बनती जा रही है?
इन प्रश्नों पर आने वाले वर्षों में गंभीर बहस होना तय है।
दलबदल की राजनीति कार्यकर्ताओं के मनोबल को भी प्रभावित करती है। वर्षों तक संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं को तब निराशा होती है जब बाहर से आए नेताओं को सीधे शीर्ष पद दे दिए जाते हैं। लेकिन चुनावी राजनीति में परिणाम सर्वोपरि हो चुके हैं।
रणनीति पूरी तरह नकारात्मक भी नहीं
यह कहना भी गलत होगा कि यह पूरी रणनीति केवल अवसरवाद है। कई बार दूसरे दलों से आए नेता अपने प्रशासनिक अनुभव, क्षेत्रीय समझ और राजनीतिक कौशल के कारण बेहतर शासन भी दे सकते हैं। हिमंत बिस्वा सरमा इसका उदाहरण माने जाते हैं।
दरअसल आज की राजनीति पेशेवर, परिणाम-केंद्रित और अत्यधिक रणनीतिक हो चुकी है। राजनीतिक दल केवल विचारधारा के आधार पर चुनाव नहीं जीत सकते। उन्हें सामाजिक गठजोड़, क्षेत्रीय नेतृत्व, मीडिया प्रबंधन और चुनावी गणित — सभी को साथ लेकर चलना पड़ता है।
भारतीय राजनीति का नया अध्याय
शुभेंदु अधिकारी से हिमंत बिस्वा सरमा तक की राजनीतिक यात्राएं केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की कहानियां नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय राजनीति के बदलते चरित्र का प्रतीक हैं। यह वह दौर है जहां दलों की सीमाएं पहले जैसी कठोर नहीं रहीं।
नेता अब विचारधारा से अधिक राजनीतिक संभावनाओं के आधार पर निर्णय ले रहे हैं और राजनीतिक दल भी चुनावी लाभ देने वाले चेहरों को अपनाने में कोई संकोच नहीं कर रहे।
आने वाले वर्षों में यह रणनीति भारतीय राजनीति को और अधिक बदल सकती है। विशेषकर दक्षिण भारत और उन राज्यों में जहां भाजपा अभी विस्तार के चरण में है, वहां दलबदल और क्षेत्रीय नेतृत्व पुनर्गठन की राजनीति और तेज हो सकती है।
निष्कर्ष
यदि समग्र परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो भारतीय राजनीति का यह नया अध्याय स्पष्ट करता है कि लोकतंत्र में केवल विचारधारा ही निर्णायक नहीं होती। रणनीति, समय, सामाजिक समीकरण और सत्ता प्रबंधन भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।
राजनीति में स्थायी मित्र या दुश्मन नहीं होते — स्थायी केवल सत्ता की आवश्यकता और चुनावी गणित होता है। और यही बदलती राजनीति आज भारत के लोकतांत्रिक परिदृश्य को नए स्वरूप में गढ़ रही है।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र









