व्यंग्य …….. आरक्षण: उम्मीदों का बाज़ार या सियासत का औज़ार?

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जब नौकरियाँ कम हों, तो सपनों की बिक्री क्यों तेज़ हो जाती है?

डॉ. शैलेश शुक्ला

देश में कुछ विषय ऐसे हैं, जिन पर बहस शुरू होते ही तर्क पीछे छूट जाते हैं और भावनाएँ आगे निकल आती हैं। आरक्षण भी ऐसा ही एक विषय है—गंभीर, संवेदनशील, और दुर्भाग्य से, अक्सर सतही ढंग से परोसा जाने वाला। कभी यह राजनीति की थाली में सजता है, तो कभी समाज की चाय की दुकान पर उबलता है।

सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि करोड़ों लोगों को एक ऐसे सपने में उलझाए रखा जाता है, जिसकी जमीन बहुत छोटी है और आसमान बहुत बड़ा दिखाया जाता है।

जरा सोचिए—देश की आबादी करोड़ों में, बेरोजगारों की संख्या भी करोड़ों में, और सरकारी नौकरियाँ? वे तो उतनी ही कम हैं, जितनी मई-जून की दोपहर में सड़कों पर छाँव। ऐसे में, जब कुल अवसर ही सीमित हों, तो उनमें से कुछ प्रतिशत आरक्षित कर देने से कितनी ज़िंदगियाँ बदलेंगी? यह सवाल जितना सीधा है, उसका जवाब उतना ही असहज—और इसलिए अक्सर टाल दिया जाता है।

आरक्षण का मूल उद्देश्य सामाजिक न्याय था—ऐसे वर्गों को आगे लाना, जो ऐतिहासिक रूप से वंचित रहे। यह विचार अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब इसे एक स्थायी राजनीतिक औज़ार बना दिया जाता है।

आज हर चुनाव से पहले आरक्षण की नई-नई घोषणाएँ होती हैं। कभी किसी नई जाति को जोड़ने की मांग, तो कभी प्रतिशत बढ़ाने की बात। ऐसा लगता है मानो आरक्षण कोई जादुई चाबी हो, जो हर ताले में फिट बैठती है—जबकि हकीकत यह है कि कई बार ताला ही अलग होता है।

असल खेल है—“उम्मीदों का प्रबंधन”।

युवाओं को यह विश्वास दिलाया जाता है कि आरक्षण मिलते ही नौकरी सुनिश्चित हो जाएगी। लेकिन कोई यह नहीं बताता कि पद कितने हैं। मान लीजिए किसी विभाग में 100 पद हैं—उनमें अलग-अलग वर्गों के लिए आरक्षण तय है। लेकिन जब हर वर्ग में लाखों उम्मीदवार हों, तो प्रतियोगिता की तीव्रता का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।

यह गणित इसलिए नहीं समझाया जाता, क्योंकि इससे “सपना” थोड़ा फीका पड़ सकता है—और जब सपना फीका पड़ता है, तो राजनीति का रंग भी हल्का हो जाता है।

धीरे-धीरे यह एक “आशा उद्योग” में बदल गया है—जहाँ सपने बेचे जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे मेले में गुब्बारे। रंगीन, आकर्षक, लेकिन हवा से भरे हुए। लोग उन्हें खरीदते हैं, खुश होते हैं, और कुछ देर बाद वे फूट जाते हैं—फिर एक नया गुब्बारा ले लिया जाता है।

इस बहस का एक और रोचक पहलू है—हर वर्ग अपने-आप को “पीड़ित” साबित करने में जुटा है। जो पहले से लाभ ले रहे हैं, वे उसे बनाए रखने के लिए संघर्षरत हैं। जो बाहर हैं, वे उसमें शामिल होने के लिए आंदोलनरत हैं। मानो अब प्रतिस्पर्धा केवल नौकरियों के लिए नहीं, बल्कि “पीड़ित होने” के अधिकार के लिए भी हो रही है।

इसी शोर में असली सवाल दब जाता है—क्या आरक्षण का लाभ वास्तव में उन तक पहुँच रहा है, जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है? या यह कुछ सीमित परिवारों के बीच ही सिमट कर रह गया है?

और सबसे बड़ा प्रश्न—नौकरियाँ कहाँ हैं?

जब अवसर ही पर्याप्त नहीं हैं, तो आरक्षण का विस्तार भी सीमित असर ही डालेगा। लेकिन इस मूल मुद्दे पर चर्चा कम होती है, क्योंकि यह कठिन सवाल है—और कठिन सवालों से बचना ही आसान राजनीति है।

सरकारें नई नौकरियाँ पैदा करने के बजाय, अक्सर पुराने ढाँचे में ही फेरबदल करती रहती हैं। कभी भर्तियाँ वर्षों तक लटकी रहती हैं, कभी पद खाली रह जाते हैं। ऐसे में आरक्षण का मुद्दा एक “ध्यान भटकाने वाला उपकरण” बन जाता है—जहाँ लोग आपस में उलझते रहते हैं, और असली समस्या छूट जाती है।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे ज्यादा उलझा हुआ है—युवा। वह मेहनत करता है, तैयारी करता है, लेकिन यह तय नहीं कर पाता कि वह किस भरोसे आगे बढ़े—आरक्षण के या अपनी योग्यता के। और जब परिणाम उम्मीद के अनुरूप नहीं आता, तो निराशा उसे घेर लेती है।

विडंबना यह है कि जो व्यवस्था “समानता” के लिए बनाई गई थी, वही कई बार “असमानता की नई बहस” को जन्म दे देती है। समाज में एक अदृश्य खाई बनती जाती है—जहाँ लोग एक-दूसरे को संदेह की नजर से देखने लगते हैं।

तो समाधान क्या है?

शायद सबसे पहले इस मिथक को तोड़ना होगा कि आरक्षण ही हर समस्या का अंतिम समाधान है। यह एक साधन हो सकता है, लेकिन लक्ष्य नहीं। असली लक्ष्य होना चाहिए—बेहतर शिक्षा, अधिक रोजगार, और एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ हर व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिले।

जब तक बहस केवल आरक्षण के इर्द-गिर्द घूमती रहेगी, तब तक यह “उम्मीदों का बाज़ार” चलता रहेगा। लोग आते रहेंगे, सपने खरीदते रहेंगे, और फिर निराश होकर लौटते रहेंगे।

अंततः, इस पूरी बहस का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है—यहाँ सच्चाई कम और कहानी ज्यादा है। और जब कहानी हावी हो जाती है, तो सच्चाई अक्सर पीछे छूट जाती है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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