डॉ घनश्याम बादल……… स्वतंत्र पत्रकार एवं राजनीतिक समीक्षक

बंगाल, असम, पुडुचेरी, तमिलनाडु एवं केरल पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं। मतदान की धूल अभी बैठी भी नहीं है और टीवी स्टूडियो की रोशनी तेज हो गई है, ग्राफिक्स चमकने लगे हैं और तथाकथित “एग्जिट पोल” देश के सामने भविष्यवाणी का परोसा हुआ थाल लेकर हाज़िर हैं।
दावा यह कि जनता ने क्या फैसला किया है, वे बता देंगे, वह भी आधिकारिक मतगणना से पहले लेकिन हर चुनाव के बाद वही पुराना सवाल सिर उठाता है कि ये एग्जिट पोल वास्तव में सार्थक हैं, या फिर यह महज़ एक व्यवस्थित भ्रम है, जो लोकतंत्र के धैर्य और गंभीरता के साथ खिलवाड़ करता है?
एग्जिट पोल की मूल अवधारणा सरल है- मतदान केंद्र से बाहर निकलते हुए मतदाताओं से पूछना कि उन्होंने किसे वोट दिया। इस “सैंपल” के आधार पर पूरे राज्य या देश का अनुमान तैयार किया जाता है। सुनने में यह वैज्ञानिक लगता है पर ज़मीन पर इसकी विश्वसनीयता अक्सर संदिग्ध साबित होती है। हालिया पांच राज्यों के चुनावों में भी अलग-अलग एजेंसियों के एग्जिट पोल एक-दूसरे से इतने भिन्न हैं कि आम दर्शक के लिए यह तय करना मुश्किल है कि किसे सच माना जाए और किसे कल्पना।
सवाल उठता है कि जब एक ही चुनाव के लिए अलग-अलग एग्जिट पोल अलग तस्वीर पेश करते हैं तो इनकी उपयोगिता क्या है? और उनकी ज़रूरत भी क्या है?
अगर एक एजेंसी किसी दल को स्पष्ट बहुमत देती है और दूसरी उसे सत्ता से बाहर दिखाती है तो यह केवल “डेटा का अंतर” नहीं बल्कि पद्धति की खामी, नमूने की सीमाएं और कभी-कभी पूर्वाग्रहों का संकेत है। सच तो यह है कि एग्जिट पोल का विज्ञान अक्सर अपने ही दावों के बोझ तले दब जाता है।
एग्जिट पोल की सबसे बड़ी कमजोरी उसका सैंपल है। भारत जैसा विविधताओं से भरा देश, जहां भाषा, जाति, धर्म, क्षेत्रीयता और स्थानीय मुद्दे मतदान के व्यवहार को प्रभावित करते हैं, वहां कुछ हज़ार लोगों से पूछकर करोड़ों मतदाताओं का रुझान तय कर देना बौद्धिक अतिसरलीकरण है। ऊपर से, हर मतदाता सच बोल ही दे, यह मान लेना भी एक तरह की भोली उम्मीद है। कई लोग झिझकते हैं, कुछ जानबूझकर गलत बताते हैं, और कुछ तो बातचीत से ही बचते हैं। ऐसे में जो डेटा मिलता है, वह आधा-अधूरा और कई बार भ्रामक होता है।
अब आती है “नैरेटिव” की राजनीति। एग्जिट पोल केवल आंकड़े नहीं होते, वे माहौल बनाते हैं। अगर किसी दल को भारी बहुमत दिखा दिया जाए तो वह जीत की छवि गढ़ता है; अगर किसी को हारता हुआ बताया जाए, तो उसके समर्थकों में निराशा फैलती है। यह मनोवैज्ञानिक खेल है, जिसका असर बाजार से लेकर राजनीतिक रणनीति तक पर पड़ता है। शेयर बाजार की हलचल, गठबंधन की बातचीत, यहां तक कि कार्यकर्ताओं का मनोबल,सब कुछ इन अनुमानों से प्रभावित होता है। यानी, एग्जिट पोल केवल “सूचना” नहीं देते, वे एक खास किस्म का और खास वर्ग या दल के लिए कूट रचित “प्रभाव” भी पैदा करते हैं।
यहीं पर एग्जिट पोल की नैतिकता पर सवाल खड़े होते हैं। क्या लोकतंत्र में जनादेश आने से पहले ही उसकी दिशा तय करने का यह प्रयास उचित है? क्या यह मतदाताओं के फैसले के प्रति अधीरता नहीं है? चुनाव एक गंभीर प्रक्रिया है, जिसमें जनता अपनी संप्रभुता का प्रयोग करती है। उस फैसले को आधिकारिक रूप से सामने आने देने के बजाय, अगर हम अनुमान के आधार पर ही निष्कर्ष गढ़ने लगें, तो यह प्रक्रिया की गरिमा को कम करता है।
अब सवाल यह भी है कि एग्जिट पोल होते क्यों हैं? मीडिया के लिए यह टीआरपी का बड़ा साधन है। चुनाव जैसे बड़े इवेंट के बाद दर्शकों की उत्सुकता चरम पर होती है, और एग्जिट पोल उस उत्सुकता को तुरंत संतुष्ट करने का दावा करते हैं। राजनीतिक दलों के लिए भी यह एक तरह का “टेस्ट रन” होता है—वे अपने कार्यकर्ताओं को संदेश देने, संभावित रणनीतियों पर विचार करने और सार्वजनिक धारणा को प्रभावित करने के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं। यानी, एग्जिट पोल एक उद्योग बन चुके हैं,जहां आंकड़े भी बिकते हैं और उम्मीदें भी।
लेकिन क्या इस उद्योग की कोई जवाबदेही है? जब एग्जिट पोल गलत साबित होते हैं, और ऐसा बार-बार होता है तो क्या कोई ठोस आत्ममंथन होता है? क्या उनकी कोई ज़िम्मेदारी तय की जाती है ? शायद ही कभी बल्कि कहिए कभी नहीं।
अगले चुनाव में वही यह कुछ और नई एजेंसियां फिर नए दावे लेकर आ जाती हैं, यह बताता है कि एग्जिट पोल की विफलता भी उनके अस्तित्व के लिए बाधा नहीं है, क्योंकि उनका असली उद्देश्य सटीकता नहीं, बल्कि खास उद्देश्य वाली उपस्थिति है।
यह कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा कि एग्जिट पोल का कोई मूल्य ही नहीं है। अगर इन्हें बहुत सावधानी, पारदर्शिता और सीमाओं के स्पष्ट उल्लेख के साथ पेश किया जाए, तो ये एक संकेत दे सकते हैं, मगर परिणाम तो कदाचित नहीं। समस्या तब पैदा होती है जब इन्हें अंतिम सत्य की तरह परोसा जाता है, जब एंकर और विश्लेषक इन्हें निर्णायक मानकर बहस छेड़ देते हैं, और जब दर्शक इन्हें जनादेश का विकल्प समझने लगते हैं।
इसलिए ज़रूरत है एक संतुलित दृष्टिकोण की। एग्जिट पोल को पूरी तरह प्रतिबंधित करना भी व्यावहारिक नहीं है लेकिन इन्हें नियंत्रित और जवाबदेह तो बनाना ज़रूरी है। उनकी पद्धति, सैंपल साइज, त्रुटि की संभावना, इन सबको स्पष्ट रूप से सामने लाया जाना चाहिए। साथ ही, मीडिया को भी यह समझना होगा कि सनसनी और सूचना के बीच एक महीन रेखा होती है जिसे पार करना आसान है, लेकिन उसके परिणाम लोकतंत्र के लिए अच्छे नहीं होते।
अंततः, लोकतंत्र का सबसे बड़ा सच यही है कि जनता का फैसला वही है जो मतगणना के बाद सामने आता है, न उससे पहले, न उसके इर्द-गिर्द। एग्जिट पोल इस सच के आसपास मंडराते अनुमान भर हैं। उन्हें सच का विकल्प बनाना, या उनके आधार पर निष्कर्ष गढ़ना, एक तरह से उस जनादेश का अपमान है, जिसे हम सबसे ऊपर मानते हैं।
एग्जिट पोल की बहस को एक वाक्य में समेटें तो बात साफ है, जहां सटीकता संदिग्ध हो, वहां दावे बेमानी हो जाते हैं; और जहां दावे बेमानी हों, वहां उनका शोर गैर-ज़रूरी हो जाता है। बहुत ही स्पष्ट कहा जाए तो यें एग्जिट पोल और उनके पीछे के आका अपने हाथों में लेना चाहते हैं मतदाताओं एवं राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं का मनोवैज्ञानिक नियंत्रण। अनावश्यक रूप से प्रभावित करते हैं आर्थिक सामाजिक एवं राजनीतिक माहौल को । दो टूक शब्दों में – झूठे बेमानी और गैरज़रूरी हैं एग्जिट पोल । इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, एजेंसियों व सोशल मीडिया मंचों ने ने बना लिया है उद्योग।








