भगवान नृसिंह जयंती : भगवान नृसिंह : श्रीहरि के दिव्य अवतार, भक्तों के पालनहार

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प्रदीप कुमार वर्मा

संसार में जब भी अधर्म और आसुरी शक्तियों का प्रकोप बढ़ता है और भक्त संकट में होता है, तब भगवान स्वयं किसी न किसी रूप में अवतार लेते हैं। सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु ने भी इस हेतु अपनी “लीलाओं” में कई अवतार लिए हैं। नृसिंह जयंती एक ऐसी महान कथा की याद दिलाती है जब भगवान विष्णु ने आधा मानव और आधा सिंह का रूप धारण कर अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए हिरण्यकश्यप जैसे राक्षस का वध किया था। इस दिन को भगवान विष्णु के चौथे अवतार नृसिंह के प्रकट होने अर्थात उनकी जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के अटूट संबंध की विजय का प्रतीक भी है। प्रत्येक वर्ष वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को भगवान श्रीनृसिंह जयंती मनाई जाती है। इस मौके पर सभी भक्त नृसिंह जी का स्मरण कर व्रत उपवास एवं पूजन अर्चन करते हैं।

भक्त और भगवान के बीच अटूट संबंध का प्रतीक नृसिंह जयंती की कथा के बारे में पौराणिक ग्रंथों में वर्णन है कि प्राचीन काल में कश्यप नामक ऋषि हुए। उनकी पत्नी का नाम दिति था। उनके दो पुत्र हुए, जिनमें से एक का नाम ‘हरिण्याक्ष’ तथा दूसरे का नाम हिरण्यकश्यप था। हिरण्याक्ष को भगवान विष्णु ने पृथ्वी की रक्षा हेतु वराह रूप धरकर मार दिया था। तब अपने भाई कि मृत्यु से दुखी और क्रोधित हिरण्यकश्यप ने स्वयं को भगवान विष्णु के प्रकोप से बचाने एवं अपने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए अजेय होने का संकल्प किया। तब हिरण्यकश्यप ने कठिन तपस्या द्वारा ब्रह्मा को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि “न वह किसी मनुष्य द्वारा मारा जा सकेगा न पशु द्वारा। न दिन में मारा जा सकेगा न रात में। न घर के अंदर न बाहर। न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र के प्रहार” से उसका संहार नहीं किया जा सकेगा। यह वरदान प्राप्त करके उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया तथा अहंकार में चूर हिरण्यकश्यप प्रजा पर अत्याचार करने लगा।

इसी दौरान हिरण्यकश्यप की पत्नी कयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम ‘प्रह्लाद’ रखा गया। एक राक्षस कुल में जन्म लेने के बाद भी प्रह्लाद में राक्षसों जैसे कोई भी दुर्गुण मौजूद नहीं थे। प्रह्लाद भगवान नारायण का भक्त था। उसकी प्रजा भी अब भगवान विष्णु की पूजा करने लगी थी। तब हिरण्यकश्यप ने भगवान-भक्ति से प्रह्लाद का मन हटाने और उसमें अपने जैसे दुर्गुण भरने के लिए बहुत प्रयास किए, किंतु प्रह्लाद अपने भक्ति मार्ग से विचलित न हुए। सभी प्रयासों में असफल होने पर क्षुब्ध हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को अपनी बहन होलिका की गोद में बैठाकर जिन्दा ही जलाने का प्रयास भी किया। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे नहीं जला सकती परंतु जब प्रह्लाद को होलिका की गोद में बिठा कर अग्नि में डाला गया तो उसमें होलिका तो जलकर राख हो गई, किंतु प्रह्लाद का बाल भी बाँका नहीं हुआ। इस घटना को देखकर हिरण्यकश्यप क्रोध से भर गया।

एक दिन हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से पूछा कि “तेरा भगवान कहाँ है?” इस पर प्रह्लाद ने विनम्र भाव से कहा कि “प्रभु तो सर्वत्र हैं, हर जगह व्याप्त हैं।” क्रोधित हिरण्यकश्यप ने कहा कि “क्या तेरा भगवान इस स्तम्भ में भी है?” जब प्रह्लाद ने हाँ में उत्तर दिया,तो यह सुनकर क्रोध में हिरण्यकश्यप ने खंभे पर प्रहार कर दिया। तब अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षार्थ एवं हिरण्यकश्यप के संहार हेतु खंभे को चीरकर श्रीनृसिंह भगवान प्रकट हो गए। अत्यंत क्रोध और उग्र स्वरूप में भगवान नृसिंह ने हिरण्यकश्यप को पकड़कर अपनी जाँघों पर रखकर उसकी छाती को नखों से फाड़ डाला और उसका वध कर दिया। देवताओं ने श्रीहरि के इस उग्र रूप को शांत करने के लिए नारद जी को भेजा। नारद जी ने भक्त प्रह्लाद से अनुरोध किया। भगवान नृसिंह ने प्रह्लाद को अपनी गोद में बिठाकर दुलार किया और उनका उग्र रूप शांत हो गया।

भगवान विष्णु के इस चतुर्थ अवतार में भक्ति की पीड़ा को जान और समझ कर भगवान को उसकी रक्षा के लिए स्वयं अवतार हेतु विवश कर दिया। पौराणिक ग्रंथों में ऐसा यह एकमात्र दृष्टांत है जिसमें भगवान श्रीहरि ने कुछ क्षण के लिए ही अपने एकमात्र भक्त के कल्याण के लिए अवतार लिया और इसके बाद बिना और कोई लीला किए अपने मूल स्वरूप में वापस आ गए।

भगवान नृसिंह ने प्रह्लाद की भक्ति से भी प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि आज के दिन जो भी मेरा व्रत करेगा, वह समस्त सुखों का भागी होगा एवं पापों से मुक्त होकर परमधाम को प्राप्त होगा। पूर्वी राजस्थान धौलपुर जिले में स्थित रियासतकालीन नृसिंह मंदिर के मुख्य पुजारी डॉ. रविंद्र नाथ श्रोत्रिय बताते हैं कि नृसिंह जयंती के दिन भगवान नृसिंह जी का व्रत-उपवास एवं पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए।

इसके बाद भगवान नृसिंह की विधि विधान के साथ पूजा-अर्चना करनी चाहिए। भगवान नृसिंह तथा लक्ष्मीजी की मूर्ति स्थापित कर वेद मंत्रों से इनकी प्राण-प्रतिष्ठा कर षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए। भगवान नृसिंह की पूजा के लिए फल, पुष्प, पंचमेवा,कुमकुम, केसर, नारियल, अक्षत व पीताम्बर रखना चाहिए। इसके साथ ही गंगाजल, काले तिल, पंच गव्य व हवन सामग्री का पूजन में उपयोग करें। भगवान नृसिंह को प्रसन्न करने के लिए उनके नृसिंह गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए। डॉ. श्रोत्रिय बताते हैं कि इस व्रत को करने वाला व्यक्ति लौकिक दुःखों से मुक्त हो जाता है। भगवान नृसिंह अपने भक्त की रक्षा करते हैं व उसकी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। मानव जीवन में भगवान नृसिंह की पूजा का अत्यंत गहरा आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व है। वे भगवान विष्णु के चौथे अवतार हैं, जो आधे मनुष्य और आधे सिंह के रूप में प्रकट हुए थे।

नृसिंह पूजा मुख्य रूप से बुराई पर अच्छाई, भय से मुक्ति, और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए की जाती है। पौराणिक विमर्श में भगवान नृसिंह के अलग-अलग दस स्वरूप हैं, जिनका अलग-अलग महत्व बताया गया है। सबसे पहला स्वरूप उग्र नृसिंह है जो भगवान नृसिंह का सबसे उग्र और भयंकर रूप है। उन्होंने हिरण्यकश्यप के वध के समय धारण किया था। उनका यह स्वरूप क्रोध, शक्ति और अन्याय के विनाश का प्रतीक माना जाता है। उनके इस स्वरूप को पूजने पर अधर्म का नाश और शत्रु का संहार होता है। भगवान नृसिंह का दूसरा रूप लक्ष्मी नृसिंह रूप शांत और सौम्य रूप है। इसमें उनकी गोद में मां लक्ष्मी विराजमान रहती हैं। भगवान नृसिंह का यह स्वरूप सुख, समृद्धि और शांति देने वाला माना गया है। वहीं,योग नृसिंह स्वरूप में भगवान नृसिंह ध्यानमग्न रूप में पद्मासन में बैठे हुए हैं।

उनका यह स्वरूप आत्मसंयम, ध्यान और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है। वीर नृसिंह का स्वरूप वीरता और पराक्रम वाला है। इसमें वह युद्ध मुद्रा में दिखाई देते हैं। उनका यह स्वरूप साहस और शक्ति प्रदान करने वाला माना गया है। ज्वाला या ज्वाल नृसिंह स्वरूप अग्नि के समान प्रचंड, अत्यधिक उग्र और तेजस्वी है। उनके इस स्वरूप को नकारात्मक शक्तियों के विनाशक के रूप में पूजा जाता है। यह तांत्रिक बाधाओं को भी दूर करते हैं। बाल नृसिंह स्वरूप में भगवान नृसिंह एक बाल रूप में हैं। उनके इस स्वरूप को सरलता और पवित्रता का प्रतीक माना गया है। प्रह्लाद वरद नृसिंह स्वरूप भक्तों को वरदान देने वाला रूप माना गया है। इसमें वह प्रह्लाद को आशीर्वाद देते हुए दिखाई देते हैं जबकि मलोला या मलोल नृसिंह स्वरूप शांत लेकिन शक्तिशाली है। उनका यह स्वरूप वैवाहिक सुख और प्रेम बढ़ाने वाले, शान्ति देने वाला माना गया है।

मलोल नरसिंह रूप तांत्रिक बाधाओं को भी नष्ट करते हैं। करण नृसिंह स्वरूप वृक्ष के नीचे विराजमान है। उनका यह स्वरूप साधना और प्रकृति से जुड़ा हुआ है और संतुलन और स्थिरता का प्रतीक है। भर्गव या पंचमुखी नृसिंह भगवान का स्वरूप पाँच मुखों वाला है, जो अत्यंत शक्तिशाली और रक्षक माना गया है। भगवान नृसिंह धर्म, न्याय और सुरक्षा के प्रतीक माने जाते हैं और भक्तों की रक्षा, भय निवारण, तंत्र-मंत्र बाधा से मुक्ति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए पूजनीय हैं। नृसिंह भगवान को अत्यंत उग्र रूप में जाना जाता है, लेकिन वे भक्तों के लिए परम रक्षक हैं। उनकी पूजा से मन का अज्ञात भय, मृत्यु का डर और नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती हैं। यदि कोई शत्रुओं या कानूनी मुकदमों से परेशान है, तो नृसिंह पूजा अत्यंत प्रभावी मानी जाती है। पौराणिक मान्यता यह भी है कि भगवान नृसिंह की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन के सभी बड़े संकट, दुर्घटनाएं और विपत्तियां दूर हो जाती हैं।

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Author: Bharat Sarathi

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