अम्बुज कुमार

स्त्री विमर्श और स्वतंत्रता का मतलब ही होता है देह से आजादी।। नब्बे के दशकों में यही थीम पर अखबारों, हिंदी पत्रिकाओं, कॉफी हाउस में चर्चा होती थी। स्त्रियों का मानना था कि यह देह मेरी है, इसलिए किसी अन्य का इस पर नियंत्रण नहीं होना चाहिए। इसमें उसकी मर्जी ही प्रधान रहेगी। पुरुषों से आजादी का मतलब यह नहीं था कि उसको पुरुष की जरूरत नहीं रहेगी। जरूरत रहेगी लेकिन मर्जी उसकी होगी। जरूरी नहीं है कि शादी जैसे पुराने बंधनों में बंधने से उसको अन्य से मिलने में रोक रहेगी। आज के दौर में विवाहेत्तर सम्बन्ध, होस्टल कांड,पार्क में जोड़ों का उन्मुक्त प्रणय क्रीड़ा,नेताओं से संबंध, होटलों में छापे के बाद की सच्चाई उजागर होने के बाद स्पष्ट हो गया है कि उस दौर का विमर्श अपना असर दिखा रहा है। अब घरों से बाहर निकलने वालों पर जबरन प्रतिबंध नहीं लगा सकते। स्कूलों,थाना, सरकारी कार्यालयों, सिनेमा, राजनीति,गैर सरकारी संगठनों,बाबाओं के दरबारों की हकीक़त उजागर होने की घटनाओं ने इस तथ्य को मजबूती प्रदान की है।
अभी पप्पू यादव अपने बयानों के लिए सुर्खियों में हैं। उनका विरोध करने की जगह पुरुष समाज को मंथन करने की जरूरत है। यदि आर्थिक स्वतंत्रता स्वीकार कर रहे हैं तो दैहिक स्वतंत्रता को भी सामान्य तरीके से लेना पड़ेगा। हालांकि महिला संगठन राजनीति से प्रेरित होकर विरोध कर रहे हैं। उनके विरोध में तर्क की जगह भावना है जबकि स्त्री विमर्श के संदर्भ में भावना का कोई अर्थ नहीं है। हम विदेशों के रास्ते पर हैं जहां स्त्रियों के स्वच्छंद जीवन पर कोई नियंत्रण नहीं है। अपने लाभ के लिए उन्हें किसी के पास जाने से परहेज नहीं होता है। शादी जैसी स्थाई संस्था वहां नहीं है। जब तक मन रहा, ठीक अन्यथा दोनों अलग रास्ते पकड़ लिए। कोई इज्जत की बात नहीं होती है। पप्पू यादव ने इसी सच्चाई को प्रकट किया है ।
वे एक सीनियर लीडर हैं और हर स्थिति से अवगत होंगे। मुगलों और अंग्रेजों के समय अभिभावक मर्जी से या जबरन बेटियां देते थे और अब स्वेच्छा से वे जा रही हैं। बढ़ती आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए भी ऐसा किया जा रहा है।। हाईवे , बाथ रूम, पुलिस स्टेशन के बहुत से वायरल वीडियो पप्पू यादव की बात की पुष्टि करते हैं।। हालांकि इसमें प्रतिशत जैसी बात का कोई डेटा नहीं है, लेकिन तथ्यात्मक रूप से गलत नहीं कहा जा सकता।







