व्यंग्य : सुशासन — पैसे की पूजा, पैसे के पुजारी

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रामस्वरूप रावतसरे

हरिया आज सुबह चाय के साथ अख़बार पढ़ रहा था। खबरें वही पुरानी—भ्रष्टाचार, घोटाले, जांच, निलंबन और फिर चुप्पी। उसने अख़बार मोड़ा और खुद से ही बुदबुदाया—“सरकारी तंत्र को आखिर हो क्या गया है? ये भूख इतनी कैसे बढ़ गई कि पगार भी कम पड़ने लगी?”

तभी तनसुख आकर धम्म से उसके पास बैठ गया। हरिया ने चश्मा ठीक करते हुए कहा—“अरे तनसुख! कई दिनों से दिखाई नहीं दिए, कहां गुम थे?”

तनसुख ने सीना चौड़ा करते हुए जवाब दिया—“सुशासन के दो साल पूरे होने पर उपलब्धियों का प्रचार करने गया था। गांव-गांव घूमकर लोगों को बताया कि कितना विकास हुआ है।”

हरिया मुस्कराया—“अच्छा! तो बताओ, जनता को क्या नया बताया? अस्पताल, स्कूल, बिजली, पानी, सड़क—इनमें कौन-सा चमत्कार दिखा?”

तनसुख ने रटा-रटाया जवाब दिया—“अरे बहुत कुछ किया है सरकार ने। घोषणा पत्र के 70 प्रतिशत वादे पूरे हो चुके हैं।”

हरिया ने तुरंत पलटवार किया—“कागज़ों में या जमीन पर? क्योंकि आम आदमी तो आज भी वही लाइन में खड़ा है, वही फाइल दबाकर घूम रहा है। फर्क बस इतना है कि पहले कांग्रेस के नारे सुनता था, अब भाजपा के। मुद्दे वही, नारे नए।”

तनसुख थोड़ा असहज हुआ—“देखो, थोड़ा-बहुत तो हर शासन में चलता है।”

हरिया ने गहरी सांस ली—“थोड़ा-बहुत? यहां तो पूरा सिस्टम ही ‘चालू’ है। बिना पैसे फाइल आगे नहीं बढ़ती—तहसील हो, थाना हो या नगर निगम। और ये मत कहना कि ऊपर वालों को पता नहीं होता। सब जानते हैं, बस बोलता कोई नहीं।”

थोड़ी देर रुककर हरिया फिर बोला—“अजीब खेल है। पहले भ्रष्टाचारी जनता को लूटता है, फिर पकड़ा जाए तो उसे साबित करने में सरकार जनता का ही पैसा और खर्च करती है। और अंत में? न पैसा वापस आता है, न सजा तय होती है।”

तनसुख ने हंसते हुए कहा—“तुम तो रामराज्य की बातें करते हो, ऐसा कहीं होता है क्या?”

हरिया ने तीखे स्वर में जवाब दिया—“रामराज्य नहीं, कम से कम ईमानदार राज तो होना चाहिए! आज हालत ये है कि पैदल चलकर आने वाला सरपंच पांच साल बाद बोलेरो में जाता है। ये विकास है या ‘व्यक्तिगत उन्नति योजना’?”

वह आगे झुककर बोला—“यहां धर्म का मतलब भी बदल गया है। अब ‘धर्म’ नहीं, ‘अर्थ’ ही धर्म बन गया है। जितना बड़ा जूता, उतनी ज्यादा पॉलिश। जितना ज्यादा पैसा, उतनी जल्दी काम।”

तनसुख चुप हो गया।

हरिया ने आख़िरी घूंट लेते हुए कहा—
“आज का सुशासन यही है—
पैसे की पूजा और पैसे के पुजारी।
सेवा और ईमानदारी? वो सिर्फ कुर्सी मिलने तक की बातें हैं।

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Author: Bharat Sarathi

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