महिला आरक्षण संशोधन विधेयक 2026: विवाद के मूल प्रश्न

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डॉ. ब्रजेश कुमार मिश्र

भारतीय लोकतन्त्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के निमित्त वर्ष 2023 में ‘महिला आरक्षण अधिनियम 2023’एक ऐतिहासिक पहल के रूप में सामने आया जिसके अन्तर्गत अनुच्छेद 330A, 332A और 334A जोड़ा गया। यह प्रावधान स्पष्ट करता है कि लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली की विधानसभा में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण तुरन्त लागू नहीं होगा बल्कि अधिनियम के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़ों के प्रकाशित होने के पश्चात ही प्रभावी होगा। इसके लागू होने के बाद यह व्यवस्था अधिकतम पन्द्रह वर्षों तक ही प्रभावी रहेगी। साथ ही यह भी निर्धारित किया गया है कि आरक्षित सीटों का चक्रानुक्रम प्रत्येक परिसीमन के बाद बदला जाएगा ताकि आरक्षण स्थायी न होकर गतिशील और सन्तुलित बना रहे। चूंकि यह विधेयक अब तक मूर्त रूप नही ले सका था क्योंकि बिना परिसीमन के यह असम्भव था और इसके लिए जनगणना की भी आवश्यकता थी और इस पूरी प्रक्रिया में देरी न हो और 2029 के आम चुनाव के पूर्व यह विधेयक व्यवहार में आ जाए, इसी कारण  131 वां संविधान संशोधन विधेयक 2026 प्रस्तुत किया गया। यह संविधान संशोधन विधेयक था और इसके पारित होने के लिए अनुच्छेद 368 के अनुसार दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी।17अप्रैल 2026 को लोकसभा में इसके पक्ष में 298 और विरोध में 230 मत पड़े जबकि लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या 540 के लिहाज से इसे पारित करने के लिए लगभग 362 मतों की आवश्यकता थी।इस प्रकार यह विधेयक पारित नहीं हो पाया। विगत 12 वर्षों में पहला अवसर था जब कोई विधेयक संसद में पारित न हुआ हो।  इसने यह स्पष्ट कर दिया कि संवैधानिक संशोधन केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति से नहीं, बल्कि व्यापक सहमति से ही सम्भव होते हैं। इस पूरे संसदीय घटनाक्रम के बाद पक्ष और विपक्ष के मध्य आरोप- प्रत्यारोप का दौर जारी है। मौलिक प्रश्न यह है कि यह विधेयक क्या गैर संवैधानिक था ? क्या यह संघीय ढांचे को नुकसान पहुँचा रहा था ? क्या इससे वाकई दक्षिण के राज्यों को नुकसान होता ? इन सारे प्रश्नों की पड़ताल के लिए 131 वें संविधान संशोधन विधेयक 2026के प्रारूप और लोकसभा नियम संख्या 66 को जानना होगा।

131 वां संविधान संशोधन विधेयक 2026 का प्रारूप मूलतः भारत में लोकसभा की संरचना, राज्यों के बीच सीटों के पुनर्वितरण और परिसीमन की पूरी प्रक्रिया को पुनर्गठित करने से सम्बन्धित था। इसके अन्तर्गत यह प्रस्ताव किया गया था कि लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या को बढ़ाकर 850 तक किया जा सकता है, जिसमें अधिकांश सीटें राज्यों के लिए तथा कुछ केन्द्रशासित प्रदेशों के लिए निर्धारित हों। विधेयक में यह भी प्रावधान था कि राज्यों के बीच सीटों का आवंटन जनसंख्या के आधार पर किया जाएगा और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में यथासंभव समान जनसंख्या सुनिश्चित की जाएगी, जिससे “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” के सिद्धान्त को प्रभावी बनाया जा सके। इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 1976’द्वारा लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना के स्तर पर ही स्थिर कर दिया गया था, ताकि जनसंख्या नियन्त्रण को प्रोत्साहित किया जा सके, और बाद में 84वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 2001के माध्यम से इस स्थिरता की अवधि को 2026 तक बढ़ा दिया गया। 131वें संशोधन विधेयक में इसी स्थिरता को समाप्त कर पुनः वास्तविक जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण का मार्ग प्रशस्त करने का प्रयास किया गया था लेकिन इसमें बाधा उत्पन्न कर रहा था लोकसभा नियम 66। नियम 66 के अनुसार, यदि कोई विधेयक किसी अन्य विधेयक पर निर्भर है तो उसे तब तक पारित नहीं किया जा सकता जब तक मूल विधेयक पहले पास न हो जाए। इसका मतलब यह हुआ कि सरकार को पहले संविधान संशोधन, फिर परिसीमन बिल और फिर अन्य सम्बन्धित विधेयकों को अलग-अलग चरणों में पारित कराना पड़ता जिससे पूरी प्रक्रिया लम्बी और जटिल हो जाती लेकिन लोकसभा की प्रक्रिया में यह भी प्रावधान है कि सदन अपने ही नियमों को निलम्बित कर सकता है, बशर्ते इसके लिए सदन की सहमति ली जाए। यानी यह “ग़ैर-कानूनी” नहीं, बल्कि नियमों के भीतर ही एक वैध अपवाद है। अतः यह कहा जा सकता है कि सरकार नियमों  की अनदेखी कर रही थी जैसा विपक्ष का आरोप है।

इस विधेयक का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह था कि परिसीमन की प्रक्रिया और उसके समय निर्धारण पर संसद को अधिक अधिकार प्रदान किए जाएँ। पहले यह व्यवस्था थी कि प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अपेक्षाकृत स्वचालित प्रक्रिया के रूप में किया जाता था, किन्तु इस प्रस्ताव में यह प्रावधान किया गया कि संसद विधि द्वारा यह निर्धारित करेगी कि किस जनगणना के आधार पर और कब परिसीमन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, यह संशोधन महिला आरक्षण से सम्बन्धित प्रावधानों के क्रियान्वयन को भी प्रभावित करता था क्योंकि इसमें ऐसी शर्तों को लचीला बनाने की बात की गई थी जिनके तहत आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ा गया था। इस प्रकार, यह विधेयक केवल सीटों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं था, बल्कि प्रतिनिधित्व के ढांचे, परिसीमन की प्रक्रिया और भविष्य की राजनीतिक संरचना को व्यापक रूप से पुनर्परिभाषित करने का एक व्यापक प्रयास था।

इस विधेयक का सबसे विवादास्पद पहलू परिसीमन को महिला आरक्षण से जोड़ना था। सरकार का तर्क था कि जनगणना के बाद सीटों का पुनर्वितरण करके ही आरक्षण को न्यायसंगत और सन्तुलित रूप से लागू किया जा सकता है, जबकि विपक्ष का मत था कि इससे आरक्षण लागू होने में अनावश्यक विलम्ब होगा और यह राजनीतिक सन्तुलन को प्रभावित कर सकता है। इस प्रकार, महिला सशक्तिकरण का प्रश्न केवल सामाजिक न्याय तक सीमित न रहकर एक व्यापक राजनीतिक और संघीय बहस का विषय बन गया।

दक्षिण भारत के राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु, ने इस मुद्दे पर गम्भीर आपत्ति जताई। उनकी मुख्य चिन्ता यह है कि परिसीमन के बाद उत्तर भारत जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी जिससे राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव कम हो सकता है। यह आशंका केवल सैद्धांतिक नहीं है, बल्कि संभावित आंकड़ों से भी स्पष्ट होती है। यदि लोकसभा की सीटों में लगभग 50% की वृद्धि कर उन्हें 850 के आसपास कर दिया जाता है, तो क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का सन्तुलन काफी बदल सकता है। उदाहरण के लिए, वर्तमान में उत्तर प्रदेश की 80 और तमिलनाडु की 39 सीटें हैं, जिनके बीच 41 सीटों का अन्तर है। यदि सीटों में 50% वृद्धि की जाए, तो उत्तर प्रदेश की सीटें लगभग 120 और तमिलनाडु की लगभग 57 हो जायेंगी। इस स्थिति में दोनों के बीच का अन्तर बढ़कर लगभग 63 सीटों तक पहुँच जाएगा। यह बढ़ा हुआ अन्तर केवल संख्या का मामला नहीं है, बल्कि इससे संसद में राजनीतिक प्रभाव और निर्णय-निर्माण की शक्ति पर भी गहरा असर पड़ सकता है।अतः दक्षिण का विरोध स्वाभाविक है।

अब अन्त में भारत के संघीय ढांचे के सिद्धान्तपर उठ रहे प्रश्न की पड़ताल करते हैं।131वें संविधान संशोधन विधेयक, 2026 को सीधे तौर पर भारतीय संघीय ढाँचे के विरुद्ध नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह संविधान के दायरे में प्रस्तावित एक वैध संशोधन था। संसद को संविधान संशोधन का अधिकार प्राप्त है और महिला आरक्षण से जुड़े प्रावधान भी विधिक रूप से उचित थे किन्तु, यह विधेयक संघीय संतुलन को चुनौती देता हुआ अवश्य प्रतीत हुआ। इसका कारण यह था कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ते हुए जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता दी गई। इससे उत्तर प्रदेश जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की सीटें बढ़ने की सम्भावना थी जबकि तमिलनाडु जैसे जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों का प्रभाव घट सकता था।

इस प्रकार, यह विधेयक कानूनी रूप से वैध होते हुए भी राजनीतिक और क्षेत्रीय असन्तुलन की आशंकाओं को जन्म देता था। इसलिए इसे संविधान के विरुद्ध नहीं, बल्कि भारतीय संघीय ढाँचे के व्यावहारिक सन्तुलन के लिए एक चुनौती के रूप में देखा गया। सरकार को इस विषय पर प्रत्येक राज्य और राजनीतिक दल को विश्वास में लेकर आगे बढ़ना चाहिए, यह देश हित में होगा।

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Author: Bharat Sarathi

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