गेट पास और बायोमैट्रिक मिलान व्यवस्था पर सवाल; साझा खेती करने वाले छोटे किसानों के सामने बढ़ी मुश्किलें
चंडीगढ़/रेवाडी, 27 मार्च 2026 – स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने हरियाणा की भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार सुनियोजित तरीके से ऐसे नियम लागू कर रही है, जिनके कारण किसान अपनी सरसों और गेहूं की फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर मंडियों में बेच ही नहीं पाएंगे।
विद्रोही ने कहा कि मंडियों में फसल लेकर जाने के लिए बनाए जा रहे गेट पास नियम इतने जटिल हैं कि किसान मंडियों तक पहुंचने से पहले ही हतोत्साहित हो रहे हैं। उनका आरोप है कि जब किसानों को मंडी में प्रवेश ही नहीं मिलेगा, तो उन्हें MSP का लाभ कैसे मिलेगा।
उन्होंने सरकार के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक तरफ सरकार 24 फसलों की MSP पर खरीद का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर ऐसे प्रावधान किए जा रहे हैं जो किसानों के लिए बाधा बन रहे हैं।
विद्रोही ने विशेष रूप से गेट पास के लिए अनिवार्य बायोमैट्रिक मिलान प्रणाली को अव्यवहारिक बताते हुए कहा कि हरियाणा, खासकर अहीरवाल क्षेत्र में, अधिकांश किसान छोटे जोत वाले हैं और साझा खेती करते हैं। कई बार एक ही परिवार की जमीन अलग-अलग सदस्यों के नाम पर होती है, लेकिन खेती सामूहिक रूप से की जाती है।
उन्होंने कहा कि नए नियमों के तहत जिन-जिन लोगों के नाम जमीन दर्ज है, उन सभी का मंडी में बायोमैट्रिक सत्यापन जरूरी होगा, जो व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है। कई परिवारों के सदस्य नौकरी या अन्य कारणों से बाहर रहते हैं—कोई सेना में, कोई पुलिस में या किसी अन्य शहर में कार्यरत होता है।
ऐसी स्थिति में जब फसल बेचने का नंबर आता है, तो सभी जमीन मालिकों का एक साथ मंडी में उपस्थित होना मुश्किल हो जाता है। विद्रोही के अनुसार, यदि कोई सदस्य उपस्थित नहीं हो पाता, तो किसान अपनी फसल MSP पर बेचने से वंचित रह जाएगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि यह पूरी प्रक्रिया किसानों को MSP से वंचित करने का एक “सुनियोजित प्रयास” है और इसे किसानों के साथ धोखाधड़ी करार दिया।
यह मामला सिर्फ नियमों का नहीं, बल्कि नीति और व्यवहार के बीच की खाई का है। यदि MSP पर खरीद सरकार की प्राथमिकता है, तो प्रक्रियाएं किसान-अनुकूल होनी चाहिए। बायोमैट्रिक जैसी व्यवस्थाएं पारदर्शिता तो बढ़ा सकती हैं, लेकिन यदि वे जमीनी हकीकत से मेल नहीं खातीं, तो उनका परिणाम उल्टा भी हो सकता है। सरकार को चाहिए कि वह छोटे और साझा खेती करने वाले किसानों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए नियमों में लचीलापन लाए, अन्यथा MSP का लाभ केवल कागजों तक सीमित रह सकता है।








