ट्रांसजेंडर महिला खिलाड़ियों पर IOC ने लगाया बैन, अब महिलाओं के साथ ओलम्पिक नहीं खेल सकती – ब्रह्मचारी कुलदीप शतरंज

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बायोलॉजिकल फीमेल ही हिस्सा ले सकेगी, IOC ने 2028 लॉस एंजिल्स खेलों से बैन लगाया –

दिल्ली, 27 मार्च 2026 – पेरिस इंटरनेशनल ओलम्पिक से शतरंज एशिया महाद्वीप के महासचिव ब्रह्मचारी कुलदीप शतरंज ने बताया कि इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी (IOC) ने एक बड़ा फैसला लेते हुए ट्रांसजेंडर महिला खिलाड़ियों को महिला वर्ग की प्रतियोगिताओं में भाग लेने से प्रतिबंधित कर दिया है। अब ओलंपिक और आईओसी इवेंट्स में केवल बायोलॉजिकल महिलाएं ही हिस्सा ले सकेंगी। 2028 के लॉस एंजिल्स ओलिंपिक से ट्रांसजेंडर महिलाएं को अब महिला कैटेगरी के इवेंट्स में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

ट्रांसजेंडर महिलाओं को महिला वर्ग में खेलने की अनुमति नहीं, केवल बायोलॉजिकल महिलाएं ही ओलंपिक में भाग लेंगी, पात्रता एसआरवाई जीन स्क्रीनिंग टेस्ट से होगी तय।

इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी (IOC) ने एक बड़ा फैसला लिया है। गुरुवार को जारी की गई नई एलिजिबिलिटी (पात्रता) नीति के तहत ट्रांसजेंडर महिला खिलाड़ियों को महिला वर्ग की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं होगी। अब ओलंपिक या किसी भी आईओसी इवेंट में महिला वर्ग की सभी घटनाओं (व्यक्तिगत और टीम स्पोर्ट्स दोनों) में केवल बायोलॉजिकल महिलाओं को ही भाग लेने का अधिकार होगा।

एलिजिबिलिटी कैसे तय होगी –

पेरिस इंटरनेशनल ओलम्पिक से शतरंज एशिया महाद्वीप के महासचिव ब्रह्मचारी कुलदीप शतरंज ने बताया कि नई नीति के अनुसार महिला वर्ग में भाग लेने के लिए खिलाड़ियों की पात्रता एक बार होने वाले एसआरवाई जीन स्क्रीनिंग टेस्ट से तय की जाएगी। यह टेस्ट डीएनए का एक हिस्सा जांचता है जो आमतौर पर पुरुष विकास से जुड़ा होता है। यह टेस्ट जीवन में सिर्फ एक बार करना होगा, जो खिलाड़ियों के लिए आसान और कम परेशानी वाला है। आईओसी का कहना है कि यह वर्तमान में उपलब्ध सबसे सटीक और कम हस्तक्षेप वाला तरीका है।

नई नीति के मुताबिक अब सिर्फ बायोलॉजिकल फीमेल्स यानी वे महिलाएं जो जन्म से ही महिला हैं, उन्हें ही वुमन कैटेगरी में खेलने की अनुमति होगी। इसके लिए एक बार जीन टेस्ट (SRY जीन स्क्रीनिंग) कराना जरूरी होगा, जिससे लिंग की पुष्टि की जाएगी। यह टेस्ट थूक, गाल के स्वैब या ब्लड सैंपल से किया जा सकता है।

वहीं, जो एथलीट जन्म के समय महिला थे, लेकिन अब खुद को ट्रांसजेंडर पुरुष (Trans Men) मानते हैं, वे महिला स्पर्धाओं में खेलना जारी रख सकते हैं।

अब तक नियम क्या था अब तक IOC ट्रांसजेंडर महिलाओं को टेस्टोस्टेरोन लेवल कम होने की शर्त पर खेलने की अनुमति देता था या फैसला व्यक्तिगत खेल संघों पर छोड़ दिया जाता था।

नया नियम केवल प्रोफेशनल खेलों पर लागू –

IOC अब सभी खेलों के लिए एक एकसमान नीति चाहता है, ताकि खेल संगठन अलग-अलग नियम न बनाएं। कई खेल संगठनों ने पहले ही ट्रांसजेंडर एथलीट्स पर पाबंदी लगा रखी है। यह बदलाव खेलों में निष्पक्षता यानी फेयर कॉम्पिटिशन सुनिश्चित करने के लिए किया गया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पिछले साल फरवरी में एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर पास किया था। इसमें लॉस एंजिल्स ओलिंपिक में ट्रांसजेंडर महिलाओं को वीजा न देने की बात कही गई थी।

यह नियम केवल प्रोफेशनल खेलों पर लागू होगा, जमीनी स्तर (ग्रासरूट) के खेलों पर इसका असर नहीं पड़ेगा।

जीत-हार में बहुत कम अंतर होता है IOC की प्रेसिडेंट कर्स्टी कोवेंट्री ने इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि ओलिंपिक जैसे बड़े मंच पर जीत और हार के बीच बहुत मामूली अंतर होता है। उन्होंने कहा, ‘ओलिंपिक खेलों में बेहद छोटा फासला भी जीत और हार तय कर सकता है। ऐसे में बायोलॉजिकल पुरुषों का महिला कैटेगरी में मुकाबला करना सही नहीं होगा।’

‘जन्म से पुरुष होने पर मिलता है फिजिकल एडवांटेज’ –

IOC ने अपनी इस नीति के पीछे वैज्ञानिक रिसर्च का भी हवाला दिया है। रिसर्च के अनुसार, जन्म से पुरुष होने के कारण एथलीट को स्ट्रेंथ (ताकत), एंड्योरेंस (सहनशक्ति) और पावर आधारित खेलों में शारीरिक रूप से बढ़त यानी एडवांटेज मिलता है। हार्मोनल बदलावों के बावजूद यह शारीरिक अंतर पूरी तरह खत्म नहीं होता।

पेरिस ओलिंपिक में दो महिला बॉक्सरों के खेलने पर उठे थे सवाल –

पेरिस ओलिंपिक 2024 के दौरान दो महिला बॉक्सरों की भागीदारी को लेकर विवाद सामने आया था। 66 किलोग्राम वर्ग में अल्जीरिया की इमान खलीफ और 57 किलोग्राम वर्ग में ताइवान की लिन यू टिंग के खेलने पर अन्य खिलाड़ियों ने आपत्ति जताई थी।

एथलेटिक्स में दो महिला एथलीटों के जेंडर को लेकर उठा था विवाद –

IOC के नए नियम से DSD एथलीटों पर भी पड़ेगा असर – यह नियम केवल ट्रांसजेंडर खिलाड़ियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन खिलाड़ियों पर भी लागू होगा, जिनके शरीर में ‘डिफरेंस ऑफ सेक्स डेवलपमेंट’ (DSD) की स्थिति है। यानी वे एथलीट जिनके पास सामान्य महिला XX क्रोमोसोम नहीं हैं।

दक्षिण अफ्रीका की दिग्गज रनर कास्टर सेमेन्या जैसे एथलीट इससे प्रभावित होंगी। सेमेन्या ने इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे ‘बहिष्कार का नया नाम’ और ‘पीछे खींचने वाला कदम’ बताया।

सेमेन्या 2012 लंदन ओलिंपिक और 2016 रियो ओलिंपिक में महिलाओं की 800 मीटर दौड़ में गोल्ड मेडल जीता था।

नियम के विरोध की आशंका यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब पूरी दुनिया में महिलाओं के खेलों में ट्रांसजेंडर एथलीटों की भागीदारी को लेकर बहस चल रही है। हालांकि, IOC का कहना है कि यह निष्पक्षता के लिए जरूरी है, लेकिन मानवाधिकार समूहों और एक्टिविस्ट्स की ओर से इस फैसले की आलोचना होने की भी पूरी संभावना है।

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Author: Bharat Sarathi

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