डॉ. नीरज भारद्वाज

आज भारतीय ज्ञान परंपरा को लेकर अध्ययन अध्यापन हो रहा है। विचार करें तो भारतीय ज्ञान परंपरा और भारतीय समाज कभी किसी देश पर आश्रित नहीं रहा है। हमें जो भी चाहिए था, हमने शोधपरक दृष्टि से उसे वस्तु को यहां पैदा किया है। हमारे ऋषि-मुनियों, साधकों, संतों, शोधकर्ताओं ने सृष्टि में जड़ से लेकर वृक्ष के हर भाग पर शोध किया। नदी, पर्वतों, ग्रहों, नक्षत्रों, दिन-रात के पहरों, पलों आदि सभी का अध्ययन किया।हमारे स्वास्थ्य, पर्यावरण, समाज को कैसे ठीक रखा जा सकता है, उसका उपचार किया। उसके अलग-अलग नाम और उपयोग भी समाज को समझाये। लकड़ी का ही उदाहरण ले सकते हैं। यज्ञ में प्रयोग होने वाली आम की लकड़ी, जिसे समिधा कहा जाता है। चूल्हे में जलने पर इसे ईंधन कहा जाता है। चिता में लकड़ी लगाई जाती है। इस प्रकार अलग-अलग प्रयोग क्षेत्र में अलग-अलग शब्द प्रयोग में लाए गए। हमने अपने आसपास और वातावरण के हिसाब से फल-सब्जियां, अन्न आदि को बोया-खाया, जिससे हम स्वस्थ रहें।
हमारे समाज का विकास हर क्षेत्र में अलग-अलग तरीके से किया गया। गांव में ही कारीगरों को स्थापित किया गया। गांव का सारा काम बिना किसी बड़े खर्च के वहां रह रहे लोग आसानी से आपसी सहयोग से कर लेते थे। सभी काम आपसी भाईचारे के साथ किए जाते थे। जैसे-जैसे आक्रमणकारी भारत में आए, उन्होंने हमारी सामाजिक व्यवस्था को भंग किया। देश में नए-नए विवाद पैदा कर दिए। गांव से अलग किले, नगर और महानगर बसा दिए गए। जाति-धर्म के नाम पर लोगों को बांटकर आपस में ही लड़वाया गया। समाज विकसित कम बिखरा हुआ अधिक दिखाई देने लगा।
एक बार फिर गांव की ओर चलते हैं। गांव में कभी ऊर्जा, जल, खाद्य सामग्री आदि का संकट था ही नहीं और ना कभी होगा, यह भी एक दावे के साथ कहा जा सकता है। हमने गांव के बाहर पानी के तालाब बनवाए हुए थे जिसमें पशु-पक्षी सभी पानी पीते थे। बरसात का पानी वहां इक्ट्ठा होता था। तालाब के नजदीक ही कुएं बनवाएं, जिनका पानी मीठा रहा। पीने के प्रयोग और खान-पान में प्रयोग होने के चलते ही इन कुओं को हमने पूजा और कुआं पूजन आज भी भारतीय संस्कृति में है। पशुधन से दूध मिला, साथ ही उनके गोबर से उपले बनाकर खाना बनाने में अर्थात ईंधन के रूप में प्रयोग किया। उत्तम खेती के लिए गोबर का खाद प्रयोग में लिया। विचार करें तो किसान खेत में बहुत सारी फैसलें ऐसी भी बोता है, जिससे ईंधन पैदा होता है, जैसे- सरसों, ढांचा, अरहर आदि की खेती से बड़ी मात्रा में ईंधन निकलकर आता है, इससे चूल्हा जलता है। ईंधन अर्थात ऊर्जा का कोई संकट किसी भी तरीके का नहीं था।
आधुनिकता की दौड़ने नगरों-महानगरों को जन्म दिया लेकिन विचार करके देखें तो यहां सुविधाओं के साथ संकट की भी स्थिति पैदा हो जाती है। वर्तमान में वैश्विक स्तर पर जो युद्ध हो रहे हैं, उनसे हमारे देश का किसी प्रकार का कोई लेना-देना नहीं है और ना ही हम उस युद्ध में शामिल हैं। उन देशों की लड़ाई का संकट आज हमारे देश में भी कई प्रकार का संकट खड़ा कर रहा है जिसमें ऊर्जा संकट सबसे बड़ा है क्योंकि हम ऊर्जा के लिए आश्रित हो गए हैं। हमने अपनी ज्ञान परंपरा, अपने सामाजिक ढांचे को सही से समझा नहीं। अब घरेलू गैस, डीजल, पेट्रोल आदि की कमी के चलते लोग शहर से फिर गांव की ओर बढ़ रहे हैं। कोरोना के समय भी लोग शहर से गांव की ओर आए थे। सही मायने में हमारी सामाजिक और ज्ञान परंपरा गांव में ही बसती है। हमें अपने गांवों को उन्नत करना होगा, वहां पर साधन-सुविधाओं का विकास करना होगा। वैश्विक पटल पर दुनिया अपना अलग रंग रखती है लेकिन गांव व्यक्ति के मूल से जुड़े हैं। पीपल-बरगद के नीचे बैठे लोग डिप्रेशन में नहीं बल्कि मौज-मस्ती से बात करते हैं। हम आधुनिकता और नयापन का चोला ओढ़ कर महानगरों में भागते हैं। संकट के समय फिर गांव की ओर होते हैं। विदेशी आक्रमणकारियों ने हमें ऐसा व्यापार सिखाया है, जिससे हम उन पर आश्रित हो सके, हमें उनसे लाभ कम, हानि अधिक होती है।
सरकार को अपनी नीतियों में परिवर्तन लाना होगा।विचार करें तो गौशाला के अंदर ही गोबर गैस प्लांट की संख्या को बढ़ाना होगा। साथ ही पशु डेयरी उद्योग में भी गोबर गैस प्लांट को नए सिरे से जन्म देना होगा। सौर ऊर्जा से घर की रसोई का ईंधन बनाना आदि विषयों पर सोचना होगा। बहुत सारे परिवर्तनों के साथ सरकार को इस ओर ध्यान देना होगा। यदि हम किसी भी देश पर आश्रित रहेंगे तो विकसित भारत का जो स्वप्न है, वह कैसे संभव हो पाएगा। ऐसे तो विश्व में कहीं ना कहीं युद्ध और कहीं ना कहीं अर्थव्यवस्था, राजनीति आदि में परिवर्तन होता ही रहता है। ऐसे संकटों से निपटने के लिए सरकार को स्वयं बड़े-बड़े निर्णय लेने होंगे और आत्मनिर्भर की ओर बढ़ना होगा। जिससे कि समयानुसार हम किसी दूसरे का मुंह ना तांके।








