धर्म और जाति को लेकर आए ‘सुप्रीम आदेश’ के राजनीतिक-सामाजिक मायने

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कमलेश पांडेय

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से बाहर जाकर धर्म परिवर्तन करता है, तो उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। दरअसल, आंध्र प्रदेश के एक धर्मांतरित ईसाई पादरी से जुड़े मामले में आए इस नवीनतम फैसले के व्यापक राजनीतिक और सामाजिक मायने हैं। इससे हिन्दू समुदाय के दलितों और पिछड़ों को निशाना बनाकर धर्मांतरित करवाये जाने का पूरा खेल ही अब हतोत्साहित हो जाएगा।

हालांकि, कांग्रेस व समाजवादी मूल की क्षेत्रीय पार्टियां यदि चाहें तो इस मुद्दे पर अपनी राजनीति भी शुरू कर सकती है कि जब हिन्दू, बौद्ध या सिख बनेंगे तो उनका एससी/ओबीसी स्टेटस बरकरार रहेगा, लेकिन जैन, ईसाई, मुसलमान, पारसी आदि बनने पर नहीं, यह कौन सा खिचड़ी न्यायिक दर्शन हैं, जो हर गतिरोध के बाद एक नया गतिरोध पैदा कर देता है। कहने का तातपर्य यह कि ज्यूडिशियल एंटीबायोटिक पॉवर बढ़ाये बिना सम्बन्धित व्यक्ति या समूह का कल्याण नहीं होने वाला है।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने गत 23-24 मार्च 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें कहा गया कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म (जैसे ईसाई, इस्लाम आदि) में परिवर्तन करने पर अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा तुरंत समाप्त हो जाता है। इस आदेश से एससी/एसटी आरक्षण लाभ और अत्याचार निवारण अधिनियम का संरक्षण खत्म हो जाता है। दरअसल, यह फैसला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मई 2025 के आदेश पर आधारित है, जहां एक ईसाई पादरी को एससी/एसटी एक्ट के तहत संरक्षण से वंचित किया गया। क्योंकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुसूचित जाति आदेश 1950 के अनुसार केवल निर्दिष्ट धर्मों के अनुयायी ही एससी लाभ ले सकते हैं। ईसाई या इस्लाम अपनाने पर जातिगत पहचान और लाभ दोनों समाप्त हो जाते हैं।

इस फैसले के अहम राजनीतिक मायने हैं। यह फैसला धर्मांतरण पर आधारित आरक्षण दावों को रोक सकता है, जो दक्षिणपंथी दलों के लिए समर्थन बढ़ाएगा। वहीं, अल्पसंख्यक आरक्षण बहस (जैसे दलित ईसाई/मुस्लिम) को प्रभावित कर चुनावी राजनीति में हिंदू एकता पर जोर देगा। राज्य सरकारें ओबीसी/एससी सूचियों की समीक्षा के दबाव में आ सकती हैं। वहीं, इस फैसले के बाद धर्म परिवर्तन और आरक्षण से जुड़ी बहस जोर पकड़ सकती है। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आलोक में फैसला दिया है, लेकिन कुछ मसले ऐसे होते है जहां कानून और जमीनी हकीकत आमने-सामने आ जाते हैं। भारत में जाति एक सच्चाई है, जिसे नहीं बदला जा सकता, लेकिन इससे जुड़ी बुराइयों को खत्म करने की तमाम कोशिश होनी चाहिए। जो राजनीतिक और न्यायिक अदूरदर्शिता वश नहीं हो पा रही है और तरह तरह के संवैधानिक विवाद जन्म ले रहे हैं, जिससे राष्ट्रीय हितों को लगातार धक्का लग रहा है।

जहां तक इस फैसले के सामाजिक प्रभाव की बात है तो धर्म परिवर्तन के बाद एससी/ओबीसी का लाभ न मिलने से सामाजिक न्याय की नीति मजबूत होगी, लेकिन धार्मिक रूपांतरण रोकने या जातिगत अस्मिता पर बहस तेज हो सकती है। चूंकि दलित समुदायों में हिंदू/सिख/बौद्ध रहने का दबाव बढ़ेगा, जबकि ईसाई/मुस्लिम समुदायों में असंतोष उत्पन्न हो सकता है। फिर भी कुल मिलाकर देखा जाए तो यह आरक्षण को ऐतिहासिक अन्याय सुधार तक सीमित रखने की दिशा में उठाया गया निर्णायक कदम है। इस पर मौजूदा मोदी सरकार के वैचारिक असर से भी इनकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह सरकार दलित/ओबीसी हिंदुओं की एकजुटता व समग्र उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है।

हालांकि देश में जाति से जुड़ा सवाल बहुत टेढ़ा और जटिल है। क्योंकि सामाजिक स्तर पर हमेशा से यह बहस का विषय रहा है कि क्या धर्म बदलने भर से जातिगत भेदभाव खत्म हो जाता है? गाहे बगाहे ऐसे मामले सामने आते रहे है, जिनमें दलित या ओबीसी समुदाय के लोगों को दूसरा धर्म अपनाने के बाद भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। पिछले साल मार्च में ही तमिलनाडु के कुछ ईसाई परिवारों, जो पहले दलित थे, ने आरोप लगाया था कि उनके साथ समान व्यवहार नहीं होता। यहां तक कि कब्रिस्तान में उनके लोगों के शवों को दफनाने के लिए भी अलग जगह है।

उल्लेखनीय है कि शीर्ष अदालत के फैसले का आधार संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 है। जिसका क्लॉज 3 कहता है कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाले ही एससी श्रेणी में आ सकते है। धर्म परिवर्तन और जाति से जुड़ी यह बहस बहुत पुरानी है। इसके दो पहलू है। एक, जिन धर्मो में जाति व्यवस्था नही है, उन्हें अपनाकर फिर जाति से जुड़े लाभ कैसे लिए जा सकते है। पिछले साल दिसंबर में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया था कि जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है, उन्होंने अनुसूचित जाति से जुड़े लाभ छोड़ दिए हों।

तब हाईकोर्ट ने कहा था कि धर्म परिवर्तन के बाद भी अनुसूचित जाति समुदाय को मिलने वाले फायदे लेते रहना संविधान के साथ धोखा है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के पास इस तरह की कई शिकायतें है और उसने पिछले साल देशभर में जांच भी शुरू की थी। कुल मिलाकर उद्देश्य यह है कि संविधान के तहत मिले अधिकार का दुरुपयोग न होने पाए। क्योंकि जाति और धर्म का दुरुपयोग होने की चिंता शुरू से ही न्यायिक विमर्श का मुद्दा बनी हुई है। लिहाजा ब्रेक के बाद न्यायदेश मिलते रहते हैं।

# इंद्रा साहनी केस (1992) से इस फैसले का सम्बन्ध

इंद्रा साहनी केस (1992) मुख्य रूप से ओबीसी आरक्षण पर केंद्रित था, लेकिन हालिया सुप्रीम कोर्ट फैसले (धर्म परिवर्तन पर SC दर्जा समाप्ति) से इसका अप्रत्यक्ष संबंध है। दोनों आरक्षण को जाति-आधारित ऐतिहासिक अन्याय सुधार तक सीमित रखने के सिद्धांत साझा करते हैं। इंद्रा साहनी का सार: इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी को 27% आरक्षण मान्य किया, लेकिन 50% कुल सीमा तय की और स्पष्ट किया कि आरक्षण का आधार धर्म या जाति अकेला नहीं हो सकता। क्रीमी लेयर बहिष्कार और पिछड़ापन के सामाजिक-शैक्षिक मापदंड निर्धारित किए गए।

हालिया फैसले से संबंध: 2026 के एससी/एसटी फैसले में संविधान के अनुसूचित जाति आदेश 1950 का हवाला दिया गया, जो इंद्रा साहनी के सिद्धांतों से मेल खाता है कि आरक्षण धर्म पर आधारित नहीं। ओबीसी मामलों में (जैसे मुस्लिम आरक्षण रद्द), कोर्ट ने इंद्रा साहनी का जिक्र कर धर्म को आधार बनाने से रोका, जो एससी केस की भावना से जुड़ता है। हालांकि, सीधा उल्लेख नहीं मिला, लेकिन सामान्य आरक्षण दर्शन समान है, जिसका सर्वकालिक महत्व जगजाहिर है।

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Author: Bharat Sarathi

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