“कांग्रेस का वार्ड फॉर्मूला सवालों के घेरे में, क्या कार्यकर्ताओं की कमी से जूझ रही पार्टी?”
“पुराने चेहरों पर नया दांव: गुरुग्राम में कांग्रेस की संगठनात्मक रणनीति पर संशय”
“वार्ड प्रभारी बने, पर क्या बनेगा संगठन? कांग्रेस के फैसले पर चर्चा तेज”
गुरुग्राम। नगर निगम गुरुग्राम क्षेत्र में संगठन को बूथ और वार्ड स्तर तक मजबूत करने के उद्देश्य से जिला कांग्रेस कमेटी (शहरी) ने सभी 36 वार्डों में प्रभारियों की नियुक्ति की है। ये प्रभारी अपने-अपने वार्ड में अध्यक्षों के चयन और संगठन विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
जिला कांग्रेस अध्यक्ष (शहरी) पंकज डावर की स्वीकृति से महासचिव (संगठन) सूबे सिंह यादव ने वार्ड प्रभारियों की सूची जारी की। नियुक्त प्रभारियों में सविंदर लोहिया, कार्तिक गहलोत, अंकित यादव, जयपाल चौधरी, अमित शर्मा, ओम प्रकाश पांचाल, दीपक दहिया, प्रहलाद सिंह लोहचब, अमन प्रजापति, राजीव यादव, निर्मल यादव, अशोक टांक, राजेश यादव, रविंदर तंवर, सौरभ अग्रवाल, रविंदर कुमार, राहुल यादव, भजन लाल यादव, राहुल नंबरदार, अरविंद उल्लावास, कर्मवीर यादव, अमित कोचर, सतीश सांगवान, महाबीर सिंह, मुकेश डागर, रामपाल पांचाल, नरेश वशिष्ठ, श्याम लाल बामनिया, हरकेश बोहत, मनोज आहूजा, सुशील सहरावत, पंकज मेंहदीरत्ता, धर्मेंद्र मिश्रा, अमन कौशिक, विकास हुड्डा और परविंदर कटारिया शामिल हैं।
जिला अध्यक्ष पंकज डावर ने कहा कि सभी प्रभारी अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाते हुए वार्ड स्तर पर संगठन को मजबूत करेंगे। वहीं महासचिव (संगठन) सूबे सिंह यादव ने भरोसा जताया कि यह कदम कांग्रेस को जमीनी स्तर पर सशक्त बनाएगा।
वादे कुछ और, ज़मीनी हकीकत कुछ और?
कांग्रेस संगठन का गठन जुलाई माह में हुआ था और अगस्त में शहरी जिला अध्यक्ष के जन्मदिन कार्यक्रम के दौरान पार्टी की रणनीति को लेकर बड़े दावे किए गए थे। उस समय राज बब्बर और जिला अध्यक्ष पंकज डावर से हुई बातचीत में स्पष्ट कहा गया था कि नगर निगम के लिए अलग संगठनात्मक ढांचा खड़ा किया जाएगा।
योजना के तहत प्रत्येक वार्ड में एक स्वतंत्र अध्यक्ष बनाया जाना था, जो अपने-अपने क्षेत्र के पार्षदों के कामकाज पर नजर रखेगा। साथ ही इन वार्ड अध्यक्षों को अपनी टीम तैयार करने की जिम्मेदारी भी दी जानी थी, जिससे संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूती मिल सके।
लेकिन वर्तमान में जिस तरह से मौजूदा पदाधिकारियों को ही वार्ड प्रभारी बनाकर नई टीम तैयार करने का दायित्व सौंपा गया है, उससे सवाल उठने लगे हैं कि क्या पहले की गई घोषणाएं केवल कागजों तक ही सीमित रह गईं?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर पार्टी अपने ही घोषित मॉडल पर अमल नहीं कर पाती, तो संगठनात्मक मजबूती का दावा कमजोर पड़ सकता है। अब देखने वाली बात होगी कि यह नई व्यवस्था वास्तविक बदलाव लाती है या फिर यह भी केवल एक औपचारिक कदम बनकर रह जाती है।








