विचार, संघर्ष और बलिदान की जीवंत कहानी: क्यों आज भी प्रासंगिक हैं भगत सिंह
-कमलेश भारतीय

किसी मित्र ने मुझसे शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की जीवनी लिखने का आग्रह किया। यह एक साधारण काम नहीं था। इधर-उधर के कार्यों के बीच भी उनके प्रति मेरी श्रद्धा और उनके पैतृक गांव खटकड़ कलां में बिताए वर्षों की स्मृतियां मुझे लगातार इस जिम्मेदारी का अहसास कराती रहीं।
भगत सिंह पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। अनगिनत किताबें, लेख, संस्मरण—फिर सवाल उठता है कि नया क्या कहा जाए? शायद एक “शुद्ध जीवनी” से अधिक ज़रूरी है उन विचारों, प्रसंगों और प्रेरणाओं को सामने लाना, जिन्होंने उन्हें शहीद-ए-आज़म बनाया।
जन्म और खटकड़ कलां का महत्व
आमतौर पर जीवनी की शुरुआत जन्म से होती है। 27 सितंबर 1907 को भगत सिंह का जन्म उस क्षेत्र में हुआ जो आज पाकिस्तान का हिस्सा है।
रोचक तथ्य यह है कि वे अपने पैतृक गांव खटकड़ कलां कभी नहीं गए, फिर भी यह स्थान उनके नाम से अमर है। क्यों?
क्योंकि स्वतंत्र भारत में शहीदों को श्रद्धांजलि देने के दो प्रमुख केंद्र हैं—खटकड़ कलां और हुसैनीवाला शहीद स्मारक।
खटकड़ कलां में उनका घर और जमीन थी, जिसे परिवार ने राष्ट्र को समर्पित कर दिया। वहीं हुसैनीवाला वह स्थान है जहां राजगुरु और सुखदेव के साथ उनके पार्थिव शरीरों का अंतिम संस्कार किया गया—वह भी चोरी-छिपे, रात के अंधेरे में।
अगले दिन उनकी माता विद्यावती राख समेट कर लाई थीं—एक मां का वह दर्द आज भी स्मारक में जीवित है।
डायरी से मिली सीख
भगत सिंह की डायरी आज भी प्रेरणा का स्रोत है। उसमें उन्होंने उन क्रांतिकारियों की गलतियों को नोट किया था, जिनके कारण वे पकड़े गए।
यह केवल इतिहास नहीं, एक गहरी सीख है—
गलतियों से सीखो, उन्हें दोहराओ मत।
क्रांति के बीज: बचपन से ही
क्रांति उनके भीतर अचानक नहीं आई। यह एक प्रक्रिया थी।
उनके चाचा अजीत सिंह और पिता किशन सिंह दोनों अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय थे और जेल जाते रहे।
जन्म के समय जब दोनों जेल से छूटे, तो दादी ने उन्हें “भागां वाला” कहा—भाग्यशाली बच्चा।
बचपन का एक प्रसंग प्रसिद्ध है—
जब पिता खेत में बीज बो रहे थे, तो बालक भगत सिंह ने पूछा:
“अगर बंदूकें बो दी जाएं तो?”
यह प्रश्न नहीं, एक सोच थी।
भावनात्मक असर और जालियांवाला बाग
चाची हरनाम कौर का दुख, घर का माहौल—इन सबने उनके बालमन को प्रभावित किया।
फिर आया जालियांवाला बाग हत्याकांड।
महज 13 वर्ष की उम्र में वे अकेले अमृतसर पहुंचे और वहां की मिट्टी लेकर लौटे। उस मिट्टी को उन्होंने अपनी मेज पर रखा—एक संकल्प के रूप में।
प्रेरणास्रोत और शिक्षा
भगत सिंह करतार सिंह सराभा को अपना गुरु मानते थे।
उन्होंने नेशनल कॉलेज लाहौर में पढ़ाई की, जहां देशभक्ति का वातावरण था और जहां से उनके क्रांतिकारी विचारों को दिशा मिली।
यहीं वे लाला लाजपत राय जैसे नेताओं से प्रेरित हुए।
लाठीचार्ज से प्रतिशोध तक
साइमन कमीशन के विरोध में हुए लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए और उनका निधन हो गया।
यह घटना निर्णायक बनी।
साथियों के साथ मिलकर भगत सिंह ने सांडर्स की हत्या कर बदला लिया।
भागते समय उनका नाटकीय भेष—टोपी, अंग्रेजी लुक और साथ में दुर्गा भाभी—उनकी सूझबूझ का उदाहरण है।
पत्रकार और विचारक भगत सिंह
घर छोड़कर वे कानपुर पहुंचे और गणेश शंकर विद्यार्थी के साथ “बलवंत” नाम से पत्रकारिता की।
उनका लेख “होली के दिन रक्त के छींटे” बेहद चर्चित हुआ।
अगर वे शहीद न होते, तो निस्संदेह एक बड़े लेखक या पत्रकार बनते।
असेम्बली बम कांड और विचार
असेम्बली में बम फेंकने का उद्देश्य हत्या नहीं, बल्कि “बहरी सरकार को जगाना” था।
उन्होंने भागने के बजाय गिरफ्तारी दी ताकि अपने विचार अदालत में रख सकें।
उनकी प्रसिद्ध रचना मैं नास्तिक क्यों हूं आज भी व्यापक रूप से पढ़ी जाती है।
पुस्तक प्रेम और अंतिम क्षण
भगत सिंह अंत तक पढ़ते रहे।
फांसी से पहले भी वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे।
अपने भाई कुलतार को लिखा—
“पढ़ो, पढ़ो, पढ़ो… विचारों की सान इसी से तेज होती है।”
शहादत: एक अमर कहानी
23 मार्च 1931—
जब लोग जीवन के सपने देखते हैं, उस उम्र में उन्होंने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया।
उनकी जवानी पर कोई नशा नहीं चढ़ा—
सिवाय आज़ादी के।
अंतिम पंक्तियां
फिर भी रहेंगी कहानियां,
तुम न रहोगे, हम न रहेंगे,
फिर भी रहेंगी कहानियां…
(लेखक: पूर्व उपाध्यक्ष, हरियाणा ग्रंथ अकादमी)








