✍️ योगेश शर्मा
अखिल भारतीय अध्यक्ष, भारतीय प्राइवेट ट्रांसपोर्ट मजदूर महासंघ (भारतीय मजदूर संघ)

23 मार्च—यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा में अंकित वह अमर दिवस है, जब भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर जैसे महान क्रांतिकारियों ने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। लाहौर की जेल में 23 मार्च 1931 को दी गई उनकी शहादत आज भी देशवासियों के हृदय में प्रेरणा की अखंड ज्योति बनकर जल रही है।
आज, शहीदी दिवस के इस पावन अवसर पर, मैं उन सभी अमर शहीदों को नमन करता हूँ, जिन्होंने “राष्ट्र सर्वोपरि” के भाव को अपने जीवन से सिद्ध किया।
क्यों आज भी प्रासंगिक हैं भगत सिंह?
समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, लेकिन कुछ विचार ऐसे होते हैं जो कालातीत होते हैं। भगत सिंह ऐसे ही विचारों के धनी थे।
आज जब हम बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, सामाजिक विभाजन और वैश्विक अस्थिरता जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, तब यह प्रश्न स्वाभाविक है—
क्या भगत सिंह के विचार आज भी हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं?
उत्तर है—हाँ, और पहले से भी अधिक।
विचारधाराओं का द्वंद्व और समाधान की दिशा
मानव समाज के विकास के साथ दो प्रमुख दार्शनिक धाराएँ उभरीं—
- विचारवाद – जो चेतना और विचार को मूल मानता है
- भौतिकवाद – जो भौतिक परिस्थितियों को वास्तविकता का आधार मानता है
आधुनिक युग में इन दोनों के समन्वय से “द्वंद्वात्मक भौतिकवाद” का सिद्धांत विकसित हुआ, जो बताता है कि
परिस्थितियाँ विचारों को जन्म देती हैं और विचार पुनः परिस्थितियों को बदलते हैं।
भगत सिंह इसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रभावित थे। उन्होंने न केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अध्ययन किया, बल्कि विश्व की क्रांतियों—विशेषकर रूसी क्रांति—से भी प्रेरणा ली।
आज की समस्याओं की जड़
अपने गहन अध्ययन के आधार पर भगत सिंह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि—
- गरीबी
- बेरोजगारी
- सामाजिक असमानता
- शोषण
इन सभी का मूल कारण पूंजीवादी व्यवस्था है, जिसमें उत्पादन के साधन कुछ लोगों के हाथों में सिमट जाते हैं, और मेहनतकश वर्ग शोषण का शिकार होता है।
आज भी स्थिति बहुत अलग नहीं है—
- शिक्षा और स्वास्थ्य महंगे हो रहे हैं
- आम व्यक्ति कर्ज के जाल में फँस रहा है
- आर्थिक विषमता बढ़ रही है
भगत सिंह का समाधान: व्यवस्था परिवर्तन
भगत सिंह का स्पष्ट मत था कि केवल सत्ता परिवर्तन से कुछ नहीं होगा,
समस्या का समाधान “व्यवस्था परिवर्तन” में निहित है।
उन्होंने जिस समाज की कल्पना की, उसकी मुख्य विशेषताएँ थीं—
- उत्पादन के साधनों का समाजीकरण
- शिक्षा और स्वास्थ्य का सार्वभौमिक अधिकार
- श्रमिकों के कार्यघंटों में कमी
- तकनीकी प्रगति का समान वितरण
आज के संदर्भ में प्रासंगिकता
यदि आज हम उनके विचारों को लागू करें—
- रोजगार की गारंटी सुनिश्चित हो
- कार्य के घंटे सीमित हों
- न्यूनतम वेतन सम्मानजनक हो
तो समाज में—
गरीबी, अपराध, नशाखोरी और असमानता जैसी समस्याओं में व्यापक कमी लाई जा सकती है।
“भगत सिंह राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून” जैसी परिकल्पना आज के भारत में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकती है।
श्रमिकों के अधिकार: समय की मांग
आज भी देश का श्रमिक वर्ग अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है।
सरकारों के बदलने के बावजूद, अपेक्षित सम्मान और आर्थिक सुरक्षा उन्हें नहीं मिल पाई है।
इसी संदर्भ में, भारतीय मजदूर संघ की यह मांग अत्यंत न्यायसंगत है कि—
👉 देश में न्यूनतम वेतन कम से कम ₹26,000 प्रति माह निर्धारित किया जाए,
ताकि श्रमिक सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें और राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान और सशक्त रूप से दे सकें।
निष्कर्ष: श्रद्धांजलि नहीं, संकल्प चाहिए
भगत सिंह को याद करना केवल एक औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं है।
यह एक संकल्प है—
- उनके विचारों को समझने का
- उन्हें जीवन में उतारने का
- और एक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण का
आज, शहीदी दिवस पर, मैं देश के उन सभी ज्ञात-अज्ञात वीरों को श्रद्धासुमन अर्पित करता हूँ, जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।








