20 मार्च : विश्व खुशी दिवस विशेष : सुख की दुकान में ‘खुशी’ की तलाश : वह महँगा सौदा जो हम हार रहे हैं

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

उमेश कुमार साहू

हर साल 20 मार्च को ‘विश्व प्रसन्नता दिवस’ (International Day of Happiness) मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित यह दिन कैलेंडर के पन्नों पर एक रस्म बनकर रह गया है लेकिन आज जब हम अपने चारों ओर देखते हैं तो एक यक्ष प्रश्न खड़ा होता है – क्या हम वास्तव में खुश हैं? या हम केवल खुश दिखने का अभिनय कर रहे हैं? ऊँची अट्टालिकाएँ, चमचमाती गाड़ियाँ और हाथ में दुनिया भर की सूचनाओं को समेटे स्मार्टफोन्स! भौतिक विकास के इस शिखर पर खड़े होने के बावजूद इंसान के चेहरे से वह सहज मुस्कान गायब है, जो कभी नीम के पेड़ के नीचे बैठे बुजुर्गों या गलियों में धूल फाँकते बच्चों के पास हुआ करती थी।

आभासी दुनिया : झूठी मुस्कान का मायाजाल

आज की सबसे बड़ी विडंबना ‘डिजिटल खुशी’ है। हम अपनी जिंदगी जीने से ज्यादा उसे ‘पोस्ट’ करने में व्यस्त हैं। रेस्तरां में खाना आने पर हम स्वाद बाद में लेते हैं, पहले उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा करते हैं। विडंबना देखिए, लोग अपनी तस्वीरों को ‘फिल्टर’ लगाकर सुंदर बना रहे हैं, जबकि असल जिंदगी में तनाव की झुर्रियां गहराती जा रही हैं।

हम दूसरों की ‘रंगीन’ फीड देखकर अपनी ‘साधारण’ जिंदगी की तुलना करने लगते हैं। यह तुलना ही तनाव की जननी है। हम यह भूल जाते हैं कि स्क्रीन पर दिखने वाली वह ‘परफेक्ट’ दुनिया महज एक चुनिंदा पल है, पूरी सच्चाई नहीं। दूसरों की नकली खुशी को मानक मानकर हम अपनी असली शांति की बलि चढ़ा रहे हैं।

प्रकृति से दूरी : जड़ों को काटकर खुशबू की तलाश

इंसान ने कंक्रीट के जंगल तो बना लिए, लेकिन वह उस माटी की महक भूल गया जहाँ से उसका अस्तित्व शुरू हुआ था। ब्रह्मांड की हर इकाई – चाहे वह चहचहाती चिड़िया हो, बहती नदी हो या खिलता हुआ फूल। हर कोई अपनी प्रकृति में आनंदित है। सूरज बिना थके रोशनी देता है और खुश रहता है, पेड़ फल देकर निहाल रहता है। केवल इंसान ही है जो प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने के बजाय उसे जीतने की कोशिश में खुद को अकेला कर चुका है। जब हम नंगे पैर घास पर चलना छोड़ देते हैं, जब हम उगते सूरज को देखने के बजाय अलार्म की आवाज पर झुंझलाते हैं, तो समझ लीजिए कि हमने खुशी का एक बड़ा द्वार खुद ही बंद कर लिया है।

बड़ी उपलब्धियों का मोह और छोटी खुशियों का कत्ल

हम एक ऐसी अंधी दौड़ में शामिल हैं जहाँ ‘बड़ा’ होना ही सफलता का पर्याय बन गया है। हम सोचते हैं कि जब बड़ा घर होगा, बड़ी पदवी होगी या बैंक बैलेंस करोड़ों में होगा, तब हम खुश होंगे। इस ‘कल’ की तलाश में हम अपना ‘आज’ मार रहे हैं।

खुशी कोई मंजिल नहीं है जिसे आप एक दिन पहुंच कर हासिल कर लेंगे; यह तो रास्ते में मिलने वाले छोटे-छोटे पत्थर हैं जो चमकते हैं। घर की चाय की चुस्की में, बच्चों की तुतलाहट में, किसी पुराने दोस्त के अचानक आए फोन में या बारिश की पहली बूंदों में जो आनंद है, वह किसी बड़े प्रमोशन की फाइल में नहीं मिलेगा। जो छोटी खुशियों को सहेज नहीं सकता, वह बड़ी खुशियों को कभी संभाल नहीं पाएगा।

जीवन की क्षणभंगुरता : नश्वरता का बोध ही आनंद का मार्ग है

भारतीय दर्शन कहता है कि यह शरीर और यह संसार नश्वर है। जिसे हम अपना कह रहे हैं, वह एक दिन मुट्ठी से रेत की तरह फिसल जाएगा। यदि हम इस सत्य को आत्मसात कर लें कि हमारी जीवन अवधि क्षणिक है तो हम नफरत, ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा के लिए समय ही नहीं निकाल पाएंगे। हर पल को इस तरह जीना चाहिए जैसे वह अंतिम हो। जब आप यह जान लेते हैं कि कल का भरोसा नहीं, तो आप आज को पूरी शिद्दत से खुशियों के नाम कर देते हैं। खुद खुश रहना केवल आपकी जरूरत नहीं, बल्कि समाज के प्रति आपकी जिम्मेदारी है, क्योंकि एक दुखी व्यक्ति केवल दुख ही बांट सकता है।

कृतज्ञता : ईश्वर के उपहारों का सम्मान

तुलना करना बंद कीजिए। आपके पास जो है, वह दुनिया के लाखों लोगों के लिए एक सपना है। बिना तुलना किए जब हम उस परम सत्ता का आभार व्यक्त करते हैं, तो मन में संतोष का भाव पैदा होता है। ‘जो है, वह पर्याप्त है’ – यह सोच ही इंसान को मानसिक गुलामी से मुक्त करती है। भौतिक विकास शरीर को सुख दे सकता है, लेकिन आत्मा की तृप्ति केवल ‘संतुष्टि’ से आती है।

कार्यस्थल और परिवार : खुशी का वास्तविक केंद्र

खुशी खरीदी नहीं जा सकती, लेकिन यह कमाई जरूर जा सकती है। अपने कार्यस्थल को केवल ‘बोझ’ न समझें। यदि आप अपने काम को ईश्वर की सेवा मानकर खुशी-खुशी करेंगे, तो थकान भी उत्सव बन जाएगी। उसी तरह, अपने घर-परिवार के रिश्तों में समय का निवेश करें। संवाद की कमी रिश्तों को खोखला कर रही है। अपनों के साथ बैठकर बात करना, उनके दुख-सुख को सुनना ही वह निवेश है जिसका लाभांश ‘खुशी’ के रूप में मिलता है।

सौदेबाजी बंद करो, जीना शुरू करो

अंततः, हमें यह समझना होगा कि जिस ‘खुशी’ को हम शोर-शराबे वाली दुकानों, महँगे ब्रैंड्स और डिजिटल दुनिया के दिखावे में तलाश रहे हैं, वह वहाँ कभी थी ही नहीं। हम उस कस्तूरी मृग की तरह हैं जो सुगंध की तलाश में पूरी दुनिया छान मारता है, जबकि वह महक उसकी अपनी नाभि में छिपी होती है।

बाजार आपको ‘सुविधा’ बेच सकता है, ‘सुकून’ नहीं। वह आपको ‘बिस्तर’ दे सकता है, ‘नींद’ नहीं। वह आपको ‘भीड़’ दे सकता है, ‘साथ’ नहीं। हमने इस महँगे सौदे में अपनी सादगी, अपनी शांति और अपना ‘स्व’ (Self) दांव पर लगा दिया है। अब समय आ गया है कि हम इस घाटे के व्यापार से बाहर निकलें।

खुशी कोई ‘स्टेटस सिंबल’ नहीं बल्कि ‘साँसों का संगीत’ है। यह किसी मॉल के शोर में नहीं, बल्कि घर की रसोई से आती महक में, किसी बूढ़े हाथ को थामने के अहसास में और प्रकृति की खामोशी को सुनने में छिपी है। जिस दिन हम तुलना करना छोड़ देंगे, उसी दिन हम अमीर हो जाएंगे।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें

error: Content is protected !!