डॉ. घनश्याम बादल

दुनिया की बड़ी राजनीति अक्सर आम आदमी की छोटी-छोटी ज़रूरतों पर भारी पड़ती रही है। जब कहीं युद्ध की आहट होती है, तो उसके धमाके केवल सीमाओं पर ही नहीं गूंजते, बल्कि रसोई के चूल्हों, पेट्रोल पंपों और घर के बजट में भी सुनाई देने लगते हैं। इन दिनों पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने एक बार फिर यही सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर वैश्विक ताकतों की जंग का बोझ कब तक साधारण नागरिक उठाता रहेगा।
इजरायल, ईरान और अमेरिका के जंग ने दुनिया के सबसे संवेदनशील ऊर्जा मार्ग हरमुज जलडमरूमध्य को संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है। दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुज़रता है। यहां से आपूर्ति रुकने या बाधित होने का असर सीधे दुनिया की अर्थव्यवस्था और भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों की जेब पर पड़ रहा है।
युद्ध की राजनीति में तेल केवल ऊर्जा नहीं, बल्कि रणनीतिक हथियार भी बन जाता है। ईरान लंबे समय से यह संकेत देता रहा है कि यदि उस पर सैन्य दबाव बढ़ता है तो वह हरमुज जलडमरूमध्य को बंद करने जैसे क़दम उठा सकता है। यह धमकी सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी है। दुनिया के तेल बाजार में ज़रा सी हलचल होते ही कीमतें आसमान छूने लगी हैं। इसका मतलब है कि पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में उछाल, परिवहन महंगा और अंततः हर चीज की कीमत में वृद्धि। यह वही श्रृंखला है जो सीधे आम आदमी के जीवन में आर्थिक दर्द पैदा करती है।
भले ही भारत इस युद्ध का हिस्सेदार नहीं है और न ही यह युद्ध भारत और उसकी सीमाओं के आसपास लड़ा जा रहा है लेकिन फिर भी इस युद्ध के प्रभावों की दृष्टि से भारत इस वैश्विक खेल का एक प्रभावित किरदार है, क्योंकि देश अपनी ज़रूरत का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से तेल आयात करके पूरा करता है।
पश्चिम एशिया में युद्ध या तनाव की हर ख़बर दिल्ली के नीति निर्माताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खींच रही है लेकिन विडंबना यह है कि जहां एक ओर वैश्विक संकट का सामना करने के लिए राष्ट्रीय एकता की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर देश के भीतर सियासी बहस अक्सर आरोप-प्रत्यारोप की आग में उलझ रही है। विपक्ष सरकार से सवाल करता है कि तेल और गैस की बढ़ती कीमतों से जनता को राहत क्यों नहीं दी जा रही। सरकार जवाब देती है कि यह वैश्विक बाजार का असर है और भारत ने जितना संभव है संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। विपक्ष सरकार को गैस एजेंसियों के सामने लगी हुई लंबी-लंबी लाइन दिखाकर सवाल खड़े कर रहा है तो सरकार इसे उसकी क्षुद्र राजनीति बता रही है।
सच यह है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी राजनीतिक मजबूरियों के साथ खड़े हैं, लेकिन इन बहसों के बीच वह व्यक्ति सबसे ज्यादा परेशान है जो सुबह मोटरसाइकिल में पेट्रोल भरवाता है, दोपहर में सब्जी खरीदता है और शाम को सिलेंडर की कीमत का हिसाब लगाता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बड़े-बड़े बयान और टीवी स्टूडियो की बहसें उसके जीवन की वास्तविकता को नहीं बदलतीं। उसके लिए जंग का मतलब है महंगाई, और महंगाई का मतलब है रोजमर्रा की ज़रूरतों पर कुठाराघात।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे दिलचस्प और विडंबनापूर्ण पहलू यह है कि तेल की वैश्विक राजनीति अक्सर घरेलू सियासत का सबसे सुविधाजनक हथियार बन जाती है। जब कीमतें बढ़ती हैं तो विपक्ष सरकार पर हमला करता है कि उसने टैक्स कम क्यों नहीं किए। जब कीमतें कुछ कम होती हैं तो सरकार इसे अपनी आर्थिक नीति की सफलता बताती है। लेकिन आम आदमी के लिए यह बहस उस पुरानी कहावत जैसी लगती है जिसमें “हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और” होते हैं। उसे तो बस इतना पता है कि उसका बजट लगातार असंतुलित होता जा रहा है।
पश्चिम एशिया की जंग केवल तेल तक सीमित नहीं वरन् वैश्विक कूटनीति, वर्चस्व के लिए चल चला दांव, सैन्य गठबंधनों और शक्ति संतुलन की जटिल कहानी भी है। इज़रायल की सुरक्षा चिंताएं, ईरान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं और अमेरिका की रणनीतिक मौजूदगी- इन तीनों के बीच खिंची रस्साकशी किसी भी क्षण विश्व युद्ध का रूप ले सकती है। यदि ऐसा हुआ तो उसका असर केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। तेल बाजार में उथल-पुथल, समुद्री व्यापार में बाधा और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता की लहरें दूर-दूर तक महसूस की जाएंगी।
भारत के लिए तो चुनौती दोहरी है। एक ओर उसे अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करनी है, दूसरी ओर घरेलू आर्थिक स्थिरता बनाए रखनी है। सरकार ने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, रणनीतिक तेल भंडार और विविध आयात मार्गों की बात ज़रूर की है, लेकिन सच यह भी है कि निकट भविष्य में तेल पर निर्भरता पूरी तरह समाप्त करना संभव नहीं है। यही कारण है कि पश्चिम एशिया में हर संकट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए झटका बन जाता है।
इन परिस्थितियों में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीति को कम से कम ऐसे मुद्दों पर थोड़ी परिपक्वता नहीं दिखानी चाहिए?
जब वैश्विक संकट सामने हो, तब देश के भीतर संवाद और सहयोग की संस्कृति मज़बूत होनी चाहिए लेकिन दुर्भाग्य से अक्सर ऐसा नहीं होता। संसद से लेकर सड़क तक, हर जगह आरोपों की ऐसी गूंज सुनाई देती है जिसमें समाधान की आवाज़ न के बराबर और एक दूसरे की टांग खिंचाई कहीं अधिक होती है।
आखिरकार जंग का सबसे बड़ा सच यही है कि उसके असली पीड़ित वे लोग होते हैं जिनका उससे सीधा कोई संबंध नहीं होता। तेल की कीमतों में उछाल, गैस सिलेंडर की महंगाई और रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ती लागत-ये सब उस अवांछित युद्ध के परिणाम हैं जिसे आम आदमी ने कभी चुना ही नहीं। उसके लिए दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों की रणनीति का अर्थ सिर्फ इतना है कि उसके घर का बजट और तंग हो गया है।
यही समय है जब दुनिया को यह समझने की ज़रूरत है कि ऊर्जा संसाधनों पर आधारित शक्ति की राजनीति अंततः मानव समाज को ही कमज़ोर करती है। यदि वैश्विक नेतृत्व सचमुच स्थिरता चाहता है तो उसे युद्ध की भाषा से आगे बढ़कर सहयोग की भाषा अपनानी होगी लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक तेल के इस खेल में गैस का दर्द, सियासत की कड़वाहट और जंग की आशंका आम आदमी के जीवन में लगातार नए घाव जोड़ती रहेगी।









