डा. विनोद बब्बर

भाषा मानसिक क्रियाओं, मनोभावों और मनोवेगों की अभिव्यक्ति का माध्यम है । कल्पना शक्ति, ज्ञान-प्रयोग एवं सम्प्रेषण का माध्यम है। भाषा के माध्यम से ही हम स्वयं के अतिरिक्त परिवार, समाज और विश्व से संसार से जुड़ते है। हमारे व्यक्तित्व का विकास जिसमें शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है, भाषा के बिना संभव नहीं। हम संकेतों की भाषा से आरंभ हुई भाषा से जुड़ाव की यह यात्रा मातृभाषा की मजबूत नींव के बिना विस्तार नहीं पा सकती। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार हमारी समस्त मानसिक क्रियाए मातृभाषा के माध्यम से ही घटित होती हैं। मातृभाषा ही हमारी संकल्पनाओं का आधार है। बालक की शिक्षा का स्वाभाविक माध्यम मातृभाषा ही है। सरलतम और सहज रूप से प्राप्त अभिव्यक्ति के इस माध्यम को कोई भी बच्चा ह्रदय की धड़कन की तरह बिना प्रयास के सीखता है। अपनी मातृभाषा में सोचता, कल्पना लोक में विचरण करता और स्वप्न देखता है। अतः मातृभाषा बच्चे के जीवन का अभिन्न अंग और अमूल्य निधि होती है। इसीलिए पूरी दुनिया के शिक्षाविद और समाजशास्त्री मातृभाषा को हर बच्चे की शिक्षा का अनिवार्य माध्यम बनाने के पक्षधर है। पिछले 50 वर्षों में विश्व भर में हुए लगभग हर अध्ययन ने प्राथमिक स्तर तक मातृभाषा को माध्यम बनाने के पक्ष में निष्कर्ष प्रस्तुत किये। विशेषज्ञों के मतानुसार, ‘विदेशी भाषा में अध्ययन से बालक के मस्तिष्क का बहुत कम भाग सक्रिय हो पाता है जबकि मातृभाषा के माध्यम से ज्ञान की प्राप्ति सरल होती है। प्रख्यात वैज्ञानिक पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने एक व्याख्यान में कहा था, ‘मैं अच्छा वैज्ञानिक इसलिए बना क्योंकि मैंने गणित और विज्ञान की शिक्षा अपनी मातृभाषा में प्राप्त की।’
केवल कलाम साहब ही नहीं, विश्वकवि रविन्द्र नाथ टैगोर का मत है, ‘यदि विज्ञान को जन-सुलभ बनाना है तो मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा दी जानी चाहिए।’ गांधी जी जब अफ्रीका में थे तो उन्होंने अपने बच्चों को सर्वप्रथम गुजराती सिखाने पर बल दिया। क्योंकि उनका मत था, ‘अन्य भाषाएं तो कभी भी सीखी जा सकती हे लेकिन मातृभाषा अभी या कभी नहीं।’ उन्होंने अनेको बार इस मत को दोहराया, ‘विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा से बच्चों की तंत्रिकाओं पर अत्याधिक बोझ बढ़ता है जो उन्हें रट्टू बनाता है। वे सृजन के लायक नहीं रहते। मैं विदेशी भाषा लादकर अपने बच्चों को दुर्बल बनाने वालों को पाप का भागीदार मानता हूं।’ अपनी पत्रिका हरिजन के 25 अगस्त, 1946 के अंक में वे लिखते हैं, ‘ अपनी मातृभाषा की कतिपय कमियों के बावजूद मैं उसके साथ उसी तरह से चिपटा रहूंगा जैसाकि माँ की छाती। एकमात्र यही मुझे जीवनदायिनी के रूप में दूध पिलाती है। मेरे लिए मातृभाषा का अनादर माँ के अनादर समान है। जो मातृभाषा और माँ का अनादर करे वह राष्ट्रभक्त हो ही नहीं सकता।’
यह सब विदित है कि भाषा और संस्कृति की तरह भाषा एवं शिक्षा का गर्भनाल का संबंध है। एक बच्चा सर्वप्रथम अपने परिवार और परिवेश की भाषा सीखता है। अभी उसका मस्तिष्क इतना विकसित नहीं होता कि वह एक साथ अनेक भाषाएं सीख सके। इसीलिए दुनियाभर के चिंतक, शिक्षा-शास्त्री और अनुभवी शिक्षकों का मत है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए। वह उस भाषा में सिखाएं हुए को बेहतर ढ़ंग से सीखता है। जर्मनी, रूस, जापान सहित अनेक विकसित देशों में शिक्षा का माध्यम उनकी अपनी भाषा है। शिक्षाविदों और मनोवैज्ञानिकों का मत है कि परिवेश से भिन्न अथवा अपरिचित भाषा बालक की प्रतिभा को कुंठित करती है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह कि स्वतंत्रता के पश्चात हम विदेशी भाषा के मोहजाल में ऐसा फंसे कि मातृभाषाओं को उपेक्षित कर रहे हैं। पूरे देश में गली-गली अंग्रेजी माध्यम स्कूलों का ऐसा जाल बिछ रहा है कि वहां पढ़े बच्चे न मातृभाषा सीख पाते हैं और न ही अंग्रेजी। आधा तीतर आधा बटेर बने इन बच्चों में आप यदि वैज्ञानिक ढ़ूंढ़ने हैं तो यह ज्यादती के अतिरिक्त आखिर और क्या है। सेवानिवृत वरिष्ठ वैज्ञानिक संक्रात सानू की पुस्तक में दिये गये तथ्यों के अनुसार ‘विश्व में प्रथम पंक्ति के 20 देश वे हैं जहां सारा कार्य उनकी मातृभाषा में होता है। इनमें चार देश अंग्रेजी भाषी है, क्योंकि उनकी मातृभाषा अंग्रेजी है। लेकिन जब हम विश्व के सबसे पिछड़े हुए 20 देशों की सूची बनाते हैं तो ये वे देश हैं जहां विदेशी भाषा शिक्षा से शासन-प्रशासन तक हावी है।’ विश्व को आर्य भट्ट, वराहमिहिर और वृहस्पति जैसे गणितज्ञ देने वाले भारत में विज्ञान में आविष्कार न होना, प्रौद्यौगिकी के लिए दूसरों पर निर्भरता के अन्यत्र कारण तलाशने की आवश्यकता नहीं है। मात्र 2 प्रतिशत फ्रांसीसी, जापानी, जर्मनी बोलने वाले दुनिया में प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं तो हम भारतीय हीनभावना के शिकार क्यों? जब रशियन, जापानी, जर्मनी अपनी भाषा में उच्चशिक्षा के बावजूद विश्व में उच्चतम सम्मान बनाये हुए हैं तो हम अपनी भाषा में ऐसा क्यों नहीं कर सकते?
यूनिसेफ की एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट का निष्कर्ष है, ‘बीच में पढ़ाई छोड़ देने का मुख्य कारण शिक्षा का माध्यम मातृभाषा का न होना है। उसे बात ठीक से समझ ही नहीं आती इसलिए वह स्कूल से जी चुराने लगता है।’ यह निर्विवाद सत्य है कि बच्चा जितनी ऊर्जा और समय ‘माध्यम’ का ज्ञान अर्थात् अंग्रेजी सीखने में लगाता है उतना मूल विषय सीखने में नहीं लगाता। इसी का प्रभाव है कि विज्ञान, गणित और अंग्रेजी में अनुत्तीर्ण होने वालों का अनुपात सर्वाधिक होता है। यह राष्ट्र के संसाधनों और मानवीय संसाधनों का घोर अपमान एवं दुरुपयोग तो है ही, बच्चे के व्यक्तित्व के संपूर्ण विकास में भी बाधक है। यह असफलता अनेक बार युवाओं को गलत कदम उठाने के लिए बाध्य करती है। कुछ नशे का सहारा लेने लगते हैं तो कुछ इससे भी गलत चुनते हैं। आईईटी, इंदौर के इंजीनियरिंग छात्र शुभम मालवीय ने अपने सुसाइड नोट में माता-पिता को लिखा है, ‘मुझे माफ कर देना। आप मुझे पढ़ाना चाहते थे, लेकिन मुझे अंग्रेजी नहीं आती है। इसलिए मैं ठीक से नहीं पढ़ पा रहा हूं। मेरी मौत के बाद दोनों भाइयों का ख्याल रखना।’
कोटा में कोचिंग लेने वाली छात्रा कृति ने अंतिम पत्र में अपनी मां कोे लिखा, ‘आपने मेरे बचपन और बच्चा होने का फायदा उठाया और मुझे विज्ञान पसंद करने के लिए मजबूर करती रहीं। मैं भी विज्ञान पढ़ती रहीं ताकि आपको खुश रख सकूं। मैं क्वांटम फिजिक्स और एस्ट्रोफिजिक्स जैसे विषयों में ही बीएससी करना चाहती थी लेकिन मैं आपको बता दूं कि मुझे आज भी साहित्य और इतिहास बहुत अच्छा लगता है क्योंकि ये मुझे मेरे अंधकार के वक्त में मुझे बाहर निकालते हैं।’ उसी पत्र में कृति ने चेतावनी देते हुए कहा है, ‘इस तरह की चालाकी और मजबूर करनेवाली हरकत 11 वीं क्लास में पढ़नेवाली छोटी बहन से मत करना, वह जो बनना चाहती है और जो पढ़ना चाहती है उसे वो करने देना क्योंकि वो उस काम में सबसे अच्छा कर सकती है जिससे वो प्यार करती है।’
यह समझना जरूरी है कि भाषा के केवल संम्पेषण का माध्यम नहीं बल्कि हजारों, लाखों वर्षों के संचित ज्ञान और संस्कृति का प्रवाह है। हमारी मातृभाषा हमें हमारे पूर्वजों से जोड़ती है। अंग्रेजी से अत्याधिक लगाव का सबसे अधिक प्रभाव मातृभाषाओं पर पड़ रहा है। पिछले दिनों एक सुबह स्वर्ण मंदिर की चौखट को प्रणाम करने का सुयोग बना। उसके बाद प्रबंधक कमेटी कार्यालय में एक अधिकारी से हुई भेंट में मेरे पंजाबी में पूछे गये हर प्रश्न का उत्तर वे अंग्रेजी मिश्रित हिंदी में ही दिया तो मैंने पूछ ही लिया, ‘क्या कारण है आप अपनी मातृभाषा के बदले हिंदी अंग्रेजी का प्रयोग कर रहे हैं?’ उनका उत्तर था, ‘वीर जी, पिछले कुछ सालों में हमारे घरों का माहौल भी इतना बदला है कि क्या बताऊं। मजबूरी कहो या गलती, हम सबके बच्चे अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ते हैं। ढ़ाई – तीन साल के बच्चे पर अंग्रेजी लादी जाती है। हम जानते है कि यह गलत है लेकिन क्या करें। आगे बढ़ने के लिए अंग्रेजी जरूरी। देश से जुड़ने के लिए हिंदी जरूरी। उस मासूम पर तीन-तीन भाषाओं का बोझ जुल्म नहीं तो और क्या है। एजुकेशन सिस्टम के फाल्ट और भाषा के मुद्दे पर आजादी से आज तक कितनी आवाजे उठी, पर क्या हुआ? अंग्रेजी तो बढ़ती ही जा रही है। पिछड़ रही हैं तो हमारी मां बोलियां। बलि पर चढ़ रही है तो मां बोलियां। स्टेट से सेंटर तक मां बोली और हिंदी के लिए बड़ी बडी बाते करने वाले भी आये पर सब अंग्रेजी के रंग में रंग गये। कोई वजह तो जरूर होगी। सबने वह वजह ढ़ूंढ़ने की कोशिश की। वजह मिली पर इलाज नहीं मिला। इसलिए बीमारी तेजी से फैल रही है। हमने, आपने, सबने समझौता कर लिया है। आप भी प्लीज मेरी लेंग्वेज को माइंड न करें।’
लगभग यही बात आपसी बातचीत में अरूणाचल विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक ने कही। उनके अनुसार, ‘अपनी बूढ़ी माँ से केवल मैं ही बात करता हूं क्योंकि मेरे पढ़ी लिखी पत्नी मातृभाषा बोलने से बचाती है और बच्चें मातृभाषा जानते नहीं। आसपास भी कोई ऐसा नहीं जो मां की भाषा समझ या बोल सके।’ विचारणीय है कि अंग्रेजी से सबसे अधिक खतरा मां बोली (मातृ भाषा, स्थानीय बोली) पर है। अपनी संस्कृति, अपनी परम्परा से सर्वाधिक प्रेम करनी वाली कौम का एक सिपाही अपने पूर्वजों की भाषा के मामले में विवश है तो समझना होगा खतरा कितना बड़ा है। आप हथियार डालने को कमजोरी कहकर उन्हें कोस सकते हो लेकिन पहले इस प्रश्न का उत्तर तलाशना होगा कि हिंदी के ओजस्वी वक्ता हिंदी में वोट मांगकर जब हिंद के सिंहासन पर विराजित होते हैं तो वे क्यों हथियार डाल देते हैं? जब तक इस मजबूरी का निदान और उपचार नहीं होगा, स्थानीय बोलियां, भाषाएं उपेक्षित होती रहेगी। अभी हाल ही मैं अबूधाबी सरकार ने हिंदी को भी तीसरी भाषा के रूप में मान्यता दी है। वहां के न्यायालयों में भी हिंदी को स्वीकार किया जायेगे लेकिन दुर्भाग्य कि बात यह कि भारत के न्यायालयों में अंग्रेजी हावी है। जब तक यहां भी प्रशासन और न्यायालय में अपनी भाषाओं को सम्मान प्राप्त नहीं होगा, हम ज्ञान से लोक व्यवहार तक सम्मान प्राप्त नहीं कर सके।
यह संतोष की बात है कि नई शिक्षा नीति में प्राथमिक कक्षाओं तक मातृभाषा में शिक्षा देना अनिवार्य बनाया गया है। लेकिन देश के दूर दराज के क्षेत्र में नहीं अपितु राजधानी दिल्ली एनसीआर के सभी निजी स्कूलों में शिक्षा का माध्यम आज भी यथावत अंग्रेजी है। दुखद आश्चर्य यह कि एक भी विद्यालय पर शिक्षा नीति के घोर उल्लंघन का मामला दर्ज नहीं किया गया। भारत जैसे बहुभाषी देश में किसी भी व्यक्ति के लिए सभी भाषाएं सीखना संभव नहीं है इसीलिए त्रिभाषा फार्मूला बनाया गया लेकिनअनेक राज्यों द्वारा उसका पालन न करने पर देश की सर्वोच्च संसद अथवा माननीय उच्चतम न्यायालय ने कोई संज्ञान नहीं लिया। जबकि देश का प्रत्येक व्यक्ति या चाहता है कि शिक्षा, न्याय और प्रशासन में त्रिभाषा फार्मूले का पालन होना ही चाहिए।
21 फरवरी विश्व मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन 21 फरवरी 1952 को वर्तमान बांग्ला देश (तब पूर्वी पाकिस्तान) के ढाका शहर में अपनी मातृभाषा बांग्ला के लिए आंदोलन कर रहे भाषा प्रेमियों पर पाकिस्तानी सेना ने गोली चलाई जिससे अनेक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। यह घटना प्रमाण है कि भाषा का धर्म से कोई संबंध नहीं होता। इस बात से भला किसी सुसंस्कृत व्यक्ति भला कैसे असहमति हो सकती है कि जननी के प्रति आदर, जन्मभूमि के प्रति समर्पण और मातृभाषा के प्रति प्रतिबद्धता से ही किसी मनुष्य के व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास संभव है । इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम अन्य भाषाओं के प्रति तिरस्कार का भाव रखें लेकिन अन्य भाषाओं की कीमत पर अपनी मातृभाषा को भी अपेक्षित नहीं किया जा सकता। इसलिए 21 फरवरी विश्व मातृभाषा दिवस के अवसर पर हम संकल्प ले कि अपने घर पर मातृभाषा का अपयोग करेंगे। घर पर अपनी बोली के लोक-संगीत, लोकगीतों के कैसेट जरूर रखें जिन्हें कम से कम छुट्टी वाले दिन जरूर बजायें। अपने घर, कार्यालय, दुकान में नाम पट्ट एवं पट्टिकाएं अपनी भाषा में ही लिखे। अपने व्यक्तिगत पत्र, आवेदन पत्र, निमंत्रण-पत्र आदि भी मातृभाषा या भारतीय भाषा में छपायेंगें। संकल्प लें कि केवल उन्हीं मांगलिक कार्यक्रमों में भाग लेंगे जिनके निमंत्रण पत्र हिंदी अथवा किसी भारतीय भाषा में होंगे। यदि हमें अपनी संस्कृति और अपनी पहचान को जीवित रखना है तो यह सदैव याद रखना होगा कि मातृभाषा ‘मात्र’ भाषा नहीं हमारी जड़े हैंऔर जो अपनी जड़ों से कट जाता है वह मिट जाता है।









