एक स्कूल पर केस दर्ज, लेकिन सवाल सौ—कितने और “फर्जी एफिलिएटेड” स्कूल कर रहे हैं जनता को गुमराह?
गुरुग्राम, 20 फरवरी। गुरुग्राम के सेक्टर-9B स्थित Educrest International School के खिलाफ दर्ज धोखाधड़ी के मामले ने शहर की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। आरोप है कि स्कूल ने स्वयं को Central Board of Secondary Education (CBSE) से संबद्ध बताकर अभिभावकों से भारी शुल्क वसूला और बोर्ड परीक्षा के समय छात्रा को एडमिट कार्ड तक उपलब्ध नहीं कराया।
लेकिन बड़ा सवाल यह है—क्या यह सिर्फ एक स्कूल की कहानी है, या गुरुग्राम में ऐसे “फर्जी एफिलिएटेड” स्कूलों का जाल फैला हुआ है?
क्या गुरुग्राम में 100 से अधिक संदिग्ध स्कूल?
शिक्षा से जुड़े जानकारों और अभिभावकों का कहना है कि गुरुग्राम में ऐसे स्कूलों की संख्या 100 से भी अधिक हो सकती है, जो या तो बिना मान्यता के संचालित हो रहे हैं या किसी अन्य संस्थान की मान्यता का हवाला देकर अभिभावकों को भ्रमित कर रहे हैं।
कई मामलों में देखा गया है कि एक स्कूल किसी नाम से पंजीकृत होता है, लेकिन उसी नाम से अलग-अलग स्थानों पर शाखाएं खोल दी जाती हैं—जिनकी स्वयं की कोई वैध मान्यता नहीं होती। फिर भी अभिभावकों को यही बताया जाता है कि “सभी शाखाएं मान्यता प्राप्त हैं।”
क्या यह सीधे-सीधे शिक्षा के नाम पर व्यापार नहीं है?
शिक्षा विभाग और प्रशासन की भूमिका पर सवाल
प्रश्न यह भी उठता है कि जब स्कूलों को खोलने, मान्यता देने और निरीक्षण करने की जिम्मेदारी हरियाणा के शिक्षा विभाग की है, तो ऐसे संस्थान वर्षों तक कैसे चलते रहते हैं?
क्या जिला प्रशासन, स्थानीय शिक्षा अधिकारी और संबंधित विभाग नियमित रूप से स्कूलों की मान्यता और संबद्धता की जांच करते हैं?
अगर करते हैं, तो फिर यह गड़बड़ियां सामने क्यों नहीं आतीं?
अगर नहीं करते, तो यह लापरवाही किसकी है?
क्या चल रहा है लेन-देन और “सुविधा शुल्क”?
शहर में चर्चा यह भी है कि कुछ स्कूलों के संचालन के पीछे कथित रूप से “लेन-देन” और “सुविधा शुल्क” की व्यवस्था चलती है। क्या इसी कारण अवैध या संदिग्ध स्कूलों पर समय रहते कार्रवाई नहीं होती?
और यदि इनमें से कुछ स्कूल राजनीतिक संरक्षण में चल रहे हैं, तो क्या यह मान लिया जाए कि शिक्षा भी अब राजनीतिक संरक्षण और आर्थिक लाभ का साधन बन चुकी है?
मध्यवर्गीय अभिभावकों पर दोहरी मार
गुरुग्राम की मध्यवर्गीय जनता अपने बच्चों के भविष्य के लिए निजी स्कूलों की ओर रुख करती है। वे भारी फीस, बिल्डिंग फंड, गतिविधि शुल्क और अन्य मदों में मोटी रकम चुकाते हैं।
सरकारी स्कूलों की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है—छात्र संख्या घट रही है, संसाधनों की कमी है और अभिभावकों का विश्वास भी कम हो रहा है। आखिर यह किसकी कमियों से हो रहा?
क्या इसी स्थिति का लाभ उठाकर कुछ निजी संस्थान शिक्षा को “व्यवसाय” में बदल रहे हैं?
क्या बच्चों के सपनों और माता-पिता की मेहनत की कमाई को मुनाफे का साधन बनाया जा रहा है?
अब क्या होना चाहिए?
- गुरुग्राम में संचालित सभी निजी स्कूलों की व्यापक जांच हो।
- प्रत्येक स्कूल की मान्यता और संबद्धता की सार्वजनिक सूची जारी की जाए।
- फर्जी प्रमाण-पत्र दिखाने वाले संस्थानों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो।
- अभिभावकों के लिए एक ऑनलाइन सत्यापन प्रणाली अनिवार्य की जाए।
- शिक्षा विभाग और प्रशासन की जवाबदेही तय हो।
निष्कर्ष
Educrest International School का मामला केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह गुरुग्राम की शिक्षा व्यवस्था की गहराई से जांच का अवसर है।
सतवंती नेहरा का कहना है कि यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो यह मान लेना गलत नहीं होगा कि शिक्षा के नाम पर चल रहा यह खेल आगे भी मासूम बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करता रहेगा।
अब सवाल सिर्फ एक स्कूल का नहीं—पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही का है।
क्या प्रशासन जागेगा, या फिर अगली शिकायत का इंतजार करेगा?


