कमलेश पांडेय

समकालीन पूंजीवादी दुनिया में बहुआयामी व चतुर्दिक विकास के मद्देनजर भारतीय चार्वाक दर्शन का बोलबाला है। केंद्र में तीन पारियों से सत्तारूढ़ भाजपा नीत राजग गठबंधन की मोदी सरकार भी इसी दर्शन को प्राथमिकता देती दिखाई दे रही है। तभी तो बीते नौ साल में भारत में प्रति व्यक्ति कर्ज तीन गुना बढ़ गया है। साथ ही दुनियाभर के विकसित कर्जदार देशों की होड़ में शामिल हुआ भारत आज बहुमुखी विकास का डंका भी बजा रहा है।
भारतीय कर्जखोरी का साइड इफेक्ट्स यह है कि भारत सरकार अपने कुल राजस्व (Income) का लगभग 25-30% हिस्सा केवल कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च कर देती है जबकि उन्मुक्त अर्थव्यवस्था के नाम पर 1990 के दशक से ही शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे जनोपयोगी सब्सिडी में अपेक्षाकृत लगातार कमी देखी जा रही है। कहना न होगा कि सूदखोरी हमारी रगों में शामिल है और इसे लेना-देना सनातन संस्कृति में इस्लाम की तरह प्रतिबंधित नहीं है।
दुनियावी धारणा है कि विकसित देश भारी कर्जे में लदे हुए हैं, इसलिए भारत को भी विकसित देश बनने के लिए आकंठ कर्ज में डूबना होगा, खासकर अपने पूंजीवादी मार्गदर्शक अमेरिका-यूरोप के तरक्की पसंद देशों की तरह। इसलिए अंधाधुंध कर्ज राष्ट्रीय चिंता का विषय नहीं बल्कि हर्ष की बात है।
दरअसल, संस्कृत में एक श्लोक है- “यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः॥ कहने का तातपर्य यह है कि “ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत, जावत जीवेत सुखम जीवेत” चार्वाक दर्शन का एक प्रसिद्ध भौतिकवादी सूत्र है, जो तार्किक व सेहतमंद उपभोग की वकालत करता है। इस श्लोक का पूरा अर्थ है: “जब तक जिएं, सुख से जिएं, चाहे उधार (ऋण) लेकर घी (घृत) पीना पड़े, क्योंकि शरीर के जलकर राख हो जाने के बाद यह दोबारा नहीं आता।” यह दर्शन परलोक, पुनर्जन्म और स्वर्ग-नरक को नकारता है, और वर्तमान जीवन को ही परम सत्य मानता है।
तभी तो दुनियाभर के विकसित कर्जदार देशों की होड़ में शामिल हुआ भारत आज विकास का डंका बजा रहा है। वो इसलिए कि भारत का कर्ज जीडीपी के लगभग 56% पर स्थिर है, जो विकसित देशों जैसे जापान (264%) या अमेरिका (134%) से काफी कम है। फिर भी, बढ़ते कर्ज के बीच उच्च विकास दर इसे टिकाऊ बनाती है। भारत का केंद्रीय ऋण FY27 में जीडीपी का 55.6% रहने का अनुमान है, जो FY26 के 56.1% से कम है।
मौजूदा बजट 2026-27 में 17.2 लाख करोड़ का सकल उधार लिया जाएगा, लेकिन नेट 11.7 लाख करोड़ ही रहेगा। यह राजकोषीय घाटे को 4.3% पर नियंत्रित रखने के लिए है। यदि विकसित देशों से भारत की तुलना की जाए तो जहां विकसित देशों का औसत कर्ज-जीडीपी अनुपात ऊंचा है: जापान 264%, इटली 142%, अमेरिका 134%, जबकि भारत 56% पर है। खासकर भारत का कर्ज $2.9 ट्रिलियन है, लेकिन विकास निवेश पर केंद्रित है।
# देश/ कर्ज-जीडीपी (%)/विकास दर अनुमान (%)
जापान 264 1.0
अमेरिका 134 2.4
भारत 56 7.4


