एससी ने एचसी के फैसले को ‘संवेदनहीन’ और कानून के खिलाफ बताते हुए पलटा

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रामस्वरूप रावतसरे

सुप्रीम कोर्ट ने 17 फरवरी 2026 को अहम फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस विवादित आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें कहा गया था कि किसी महिला को गलत तरीके से छूना और उसके पायजामे की नाड़ा खोलना ‘रेप की कोशिश’ नहीं माना जा सकता।

शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि अगर कोई आरोपित किसी लड़की का पायजामा खोलने की कोशिश करता है, उसके कपड़े से छेड़छाड़ करता है और उसे जबरन खींचता है तो यह केवल छेड़छाड़ या यौन उत्पीड़न नहीं बल्कि साफतौर पर ‘रेप की कोशिश’ की श्रेणी में आएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे कृत्य को हल्के में लेना कानून और समाज, दोनों के लिए खतरनाक है।

अदालत ने यह भी माना कि हाई कोर्ट का नजरिया कानून की सही व्याख्या नहीं करता और इससे गलत संदेश जा सकता है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का फैसला खारिज कर दिया और कहा कि इस मामले में रेप की कोशिश से जुड़ी धाराएँ लागू होंगी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सुओ मोतो यानी खुद संज्ञान लिया, क्योंकि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ एनजीओ ‘वी द वीमन’  सहित वरिष्ठ वकीलों और एक्सपर्ट्स ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखा था कि यह निर्णय ‘संवेदनहीन’ और कानून के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्यकांत की अगुवाई में जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस एनवी अनजारिया की बेंच ने इस मामले में सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि किसी अपराध को कोशिश मानने के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह पूरी तरह अंजाम तक पहुँच जाए। अगर आरोपित ने ऐसा ठोस कदम उठा लिया हो जिससे साफ पता चले कि उसका इरादा अपराध करने का था और वह उस दिशा में आगे बढ़ चुका था तो उसे कोशिश माना जाएगा।

सुप्रीम अदालत ने कहा कि इस मामले में आरोपित का व्यवहार स्पष्ट रूप से गंभीर यौन हमले की दिशा में था और इसे हल्के अपराध की तरह नहीं देखा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में बीएनएस की धारा 376 को धारा 511 के साथ पढ़ा जाना चाहिए, जो बलात्कार की कोशिश से जुड़ी है। साथ ही पोस्को कानून की धारा 18 भी लागू होगी जो नाबालिग के साथ पेनिट्रेटिव यौन अपराध की कोशिश से संबंधित है।

सुप्रीम अदालत के अनुसार नाबालिगों के मामलों में अदालतों को ज्यादा संवेदनशील रुख अपनाना चाहिए और तकनीकी आधार पर गंभीर धाराएँ हटाना न्याय के उद्देश्य के खिलाफ है। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के उस हिस्से को पूरी तरह रद्द कर दिया जिसमें बलात्कार की कोशिश की धारा हटाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि मामला उन्हीं गंभीर धाराओं के तहत आगे बढ़े जैसा निचली अदालत ने पहले तय किया था।

दरअसल, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 17 मार्च 2025 को एक विवादित फैसला सुनाया था, जिसने पूरे देश में बहस छेड़ दी थी। यह आदेश जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की सिंगल बेंच ने दिया था। मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले से जुड़ा था, जहाँ एक 11 साल की नाबालिग बच्ची के साथ छेड़छाड़ का आरोप था। घटना साल 2021 की बताई गई थी।

मामले के अनुसार, दो आरोपितों पर आरोप था कि उन्होंने बच्ची के साथ जबरदस्ती की, उसके स्तन पकड़े, उसका पायजामे का नाड़ा तोड़ा और उसे एक सुनसान जगह की ओर खींचने की कोशिश की। निचली अदालत ने इन तथ्यों को गंभीर मानते हुए आरोपितों को बीएनएस की धारा 376 (रेप) और पोस्को एक्ट की धारा 18 (रेप की कोशिश) के तहत मुकदमा चलाने का आदेश दिया था।

लेकिन 17 मार्च 2025 के अपने फैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध त्थ्यों के आधार पर यह साबित नहीं होता कि आरोपितों ने ‘रेप करने की पूरी कोशिश’ की थी। अदालत ने कहा कि सिर्फ पायजामे का नाड़ा तोड़ना और शरीर के ऊपरी हिस्से को पकड़ना, अपने आप में ‘रेप की कोशिश’ साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि कथित तौर पर कपड़े पूरी तरह नहीं उतारे गए थे।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि यह कृत्य गंभीर है, लेकिन इसे गंभीर यौन उत्पीड़न माना जाएगा, न कि रेप की कोशिश। इसीलिए अदालत ने बीएनएस की धारा 354(इ) और पोस्को एक्ट की धारा 9/10 के तहत मुकदमा चलाने को सही ठहराया।

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Author: Bharat Sarathi

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