15 फरवरी की रात को ही महाशिवरात्रि मनाना शास्त्र सम्मत: पं. अमरचंद भारद्वाज
पं. अमरचंद भारद्वाज

गुरुग्राम। पं. अमरचंद भारद्वाज ने कहा कि भगवान शंकर का जलाभिषेक करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का महापर्व मनाया जाता है, जिस दिन श्रद्धालु मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित कर पूजा, व्रत और रात्रि-जागरण करते हैं।
श्रीमाता शीतला देवी श्राइन बोर्ड के पूर्व सदस्य एवं कथावाचक पं. भारद्वाज ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार यदि चतुर्दशी तिथि पहले दिन निशीथ व्यापिनी हो तो उसी दिन महाशिवरात्रि मनाना उचित माना जाता है। इस वर्ष चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी 2026, रविवार को शाम 5:04 बजे से प्रारंभ होकर 16 फरवरी 2026, सोमवार को शाम 5:34 बजे तक रहेगी। चूंकि महाशिवरात्रि की मुख्य पूजा रात्रि में होती है, इसलिए 15 फरवरी की रात को ही पर्व मनाना शास्त्रसम्मत रहेगा। शहर के सनातन धर्म सभा से जुड़े मंदिरों में भी इसी तिथि पर पर्व मनाने का निर्णय लिया गया है।
उन्होंने बताया कि शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए मिट्टी के पात्र में जल या दूध भरकर उसमें बेलपत्र, आक-धतूरा, पुष्प और अक्षत डालकर अर्पित करना चाहिए। इस दिन शिव पुराण का पाठ, महामृत्युंजय मंत्र तथा “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप अत्यंत फलदायी माना गया है। रात्रि-जागरण का भी विशेष विधान है और शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार ‘निशीथ काल’ में पूजन सर्वोत्तम रहता है।
निशीथ काल पूजा का श्रेष्ठ समय 15 और 16 फरवरी की मध्यरात्रि 12:09 बजे से 1:01 बजे तक रहेगा। पं. भारद्वाज ने कहा कि शिवरात्रि और दीपावली की रात भगवान शिव, काली माता और भैरव की पूजा तथा तांत्रिक साधना के लिए अत्यधिक शुभ मानी जाती है। पुराणों के अनुसार इसी काल में भगवान शिव पृथ्वी पर शिवलिंग रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए इस समय की गई पूजा विशेष फल प्रदान करती है। श्रद्धालु रात्रि के चारों प्रहरों में से अपनी सुविधा अनुसार पूजन कर सकते हैं।
ज्योतिषीय दृष्टि से चतुर्दशी तिथि के स्वामी स्वयं भगवान शिव माने गए हैं, इसलिए प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि भी मनाई जाती है। मान्यता है कि इस तिथि पर चंद्रमा की स्थिति कमजोर होती है, जबकि भगवान शिव ने चंद्रमा को मस्तक पर धारण किया हुआ है। अतः शिव आराधना से मन को बल मिलता है, इच्छाशक्ति सुदृढ़ होती है और जीवन में साहस व दृढ़ता का संचार होता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसके फलस्वरूप फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को दोनों का विवाह हुआ, जिसके कारण महाशिवरात्रि को अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। देवाधिदेव महादेव की आराधना इस दिन विशेष रूप से फलदायी मानी गई है।








