— सतवंती नेहरा

भारत का संविधान समानता की बात करता है, लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था असमानता को संस्थागत रूप देती जा रही है। शिक्षा, जो सामाजिक न्याय का सबसे सशक्त हथियार होनी चाहिए थी, आज स्वयं राजनीतिक प्रयोगशाला बना दी गई है। सवाल यह नहीं है कि आरक्षण किसे मिला—सवाल यह है कि समान शिक्षा आज तक क्यों नहीं मिली?
आज शिक्षा का आधार योग्यता नहीं, बल्कि श्रेणी बन चुकी है। नतीजा यह है कि कक्षा में बैठा हर बच्चा पहले अपनी जाति पहचानता है, फिर अपनी किताब। यही वह सबसे खतरनाक विफलता है, जिसके लिए न सरकारें जवाबदेह हैं, न नीति निर्माता।
सामान्य वर्ग का सक्षम बच्चा खुद को ठगा हुआ महसूस करता है—क्योंकि मेहनत के बावजूद उसे अवसर नहीं मिलता।
आरक्षित वर्ग का मेधावी बच्चा भी कम पीड़ित नहीं—क्योंकि उसकी सफलता को उसकी योग्यता नहीं, उसकी श्रेणी से तौला जाता है।
यह दोहरी चोट है—आत्मविश्वास पर भी और सामाजिक समरसता पर भी।
राजनीतिक दल वर्षों से आरक्षण को सामाजिक न्याय का पर्याय बताकर वोट बटोरते रहे, लेकिन किसी ने यह ईमानदार सवाल नहीं उठाया कि— जब शिक्षा ही समान नहीं है, तो न्याय किस बात का?
आज देश में
- कहीं सरकारी स्कूल बदहाल हैं,
- कहीं निजी स्कूल महंगे हैं,
- कहीं शिक्षक नहीं हैं,
- और कहीं तकनीक केवल शहरों तक सीमित है।
ऐसी असमान शिक्षा व्यवस्था में आरक्षण सिर्फ असफल शासन का पर्दा बन जाता है।
स्पष्ट और कड़ा सत्य यह है—
- शिक्षा संस्थानों में आरक्षण समाधान नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता की स्वीकारोक्ति है।
- असली सामाजिक न्याय समान शिक्षा से आएगा, न कि सीटों की गणना से।
- जाति-आधारित वर्गीकरण बच्चों को आगे नहीं बढ़ाता, उन्हें मानसिक रूप से बाँटता है।
देश की ज़रूरत है— “वन नेशन, वन एजुकेशन सिस्टम”
अगर देश एक संविधान, एक चुनाव और एक कर प्रणाली की बात कर सकता है, तो एक शिक्षा प्रणाली से क्यों डरता है?
हमारी मांग है—
✔ पूरे देश में एक समान पाठ्यक्रम
✔ शहर और गाँव में समान स्तर के शिक्षक
✔ स्कूलों में समान संसाधन और सुविधाएँ
✔ डिजिटल शिक्षा का ग्रामीण भारत तक वास्तविक विस्तार
✔ शिक्षा को इतना सस्ता बनाया जाए कि किसी बच्चे की प्रतिभा फीस में न दबे
हमारा लक्ष्य बिल्कुल साफ है—
“आरक्षण से नहीं, समान शिक्षा से सामाजिक न्याय।”
जिस दिन देश का हर बच्चा एक जैसी गुणवत्ता की शिक्षा पाएगा, उस दिन न किसी को आरक्षण माँगना पड़ेगा, न किसी को उससे डर लगेगा।
लेकिन असली डर यह है कि समान शिक्षा लागू होने पर राजनीतिक ठेकेदारी खत्म हो जाएगी—और शायद यही वजह है कि इस मुद्दे पर सबसे ज़्यादा चुप्पी है।
अब वक्त है शिक्षा को राजनीति का औज़ार नहीं, राष्ट्र निर्माण का आधार बनाया जाए।
अब वक्त है कि बच्चा अपनी जाति से नहीं, अपनी योग्यता से पहचाना जाए।







