जाति जनगणना से पीछे हटना भाजपा की सोची-समझी राजनीतिक धोखाधड़ी : सुबे सिंह यादव

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गुरुग्राम, 25 जनवरी 2026। कांग्रेस कमेटी गुरुग्राम के महासचिव (संगठन) सुबे सिंह यादव एडवोकेट ने केंद्र सरकार पर आगामी जनगणना में जाति गणना को लेकर जनता से विश्वासघात करने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि जाति जनगणना से पीछे हटना किसी नीतिगत विवेक का नहीं, बल्कि राजनीतिक छल और जनमत को गुमराह करने की रणनीति का परिणाम है।

सुबे सिंह यादव ने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा ने जाति जनगणना का सार्वजनिक आश्वासन देकर वोट माँगे, लेकिन सत्ता में आते ही उसी वादे से मुकर गई। उन्होंने याद दिलाया कि भले ही 30 अप्रैल 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगामी जनसंख्या सर्वे में जाति गणना शामिल करने की घोषणा की हो, लेकिन सरकार की अब तक की चुप्पी और टालमटोल जनता के साथ किए गए विश्वासघात को उजागर करती है।

उन्होंने इसे बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि 2010 के बाद से देश में कोई पूर्ण जनगणना नहीं कराई गई, और एक दशक से अधिक समय तक बिना अद्यतन जनसंख्या व सामाजिक आँकड़ों के देश चलाया गया। ऐसे में जब जनगणना की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, तब जाति को जानबूझकर बाहर रखना इस बात का प्रमाण है कि सरकार सामाजिक सच्चाई से डर रही थी

यादव ने कहा कि जब जनगणना में पहले से ही 33 प्रश्न पूछे जा रहे हैं, तब जाति पर केवल एक प्रश्न जोड़ने को लेकर बहाने बनाना सरासर झूठ और जनता की समझ का अपमान है। भारत की वास्तविकता यह है कि जाति आज भी शिक्षा, रोज़गार, आय और अवसरों को प्रभावित करती है, और उसी सच्चाई को दर्ज करने से सरकार बचती रही।

उन्होंने आरोप लगाया कि जाति जनगणना से इनकार कर सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया था कि सामाजिक न्याय उसके एजेंडे में नहीं है। आज देश की अधिकांश जाति-आधारित नीतियाँ दशकों पुराने, अधूरे और अनुमान आधारित आँकड़ों पर टिकी हैं। बिना सटीक और अद्यतन डेटा के बनाई गई नीतियाँ केवल दिखावा हैं, समाधान नहीं।

अलग से जाति जनगणना कराने के सुझाव पर कटाक्ष करते हुए सुबे सिंह यादव ने कहा कि यह भी जनता को गुमराह करने की एक और चाल है। इससे संसाधनों, समय और मानव शक्ति पर अनावश्यक बोझ पड़ेगा और प्रक्रिया को जानबूझकर लंबा खींचा जाएगा। उन्होंने कहा कि मौजूदा जनगणना में जाति को शामिल करना सबसे सरल, तार्किक और पारदर्शी विकल्प है, जबकि अलग सर्वे का प्रस्ताव देरी और जवाबदेही से बचने की साजिश के अलावा कुछ नहीं।

उन्होंने चेतावनी दी कि इस फैसले का सबसे खतरनाक असर नीति निर्माण पर पड़ेगा। जाति डेटा के बिना आरक्षण, सब्सिडी, छात्रवृत्ति और कल्याणकारी योजनाएँ अंधेरे में तीर चलाने जैसी होंगी, जिसका सीधा नुकसान उन्हीं समुदायों को होगा जिनके नाम पर सत्ता वोट माँगती है।

सुबे सिंह यादव ने दो टूक शब्दों में कहा कि भारत जैसे देश में जाति को जनगणना से बाहर रखना तटस्थता नहीं, बल्कि असमानता को बनाए रखने और सच को दबाने की नीति है। उन्होंने मांग की कि प्रधानमंत्री के हालिया ऐलान को महज़ घोषणा तक सीमित न रखते हुए सरकार तत्काल बिना किसी बहाने के जनगणना में जाति गणना शामिल करे, ताकि देश को एक और दशक तक अंधेरे में न रखा जाए।

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Author: Bharat Sarathi

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