गुरुग्राम कांग्रेस संगठन: गठन या गुटबाजी का विस्तार?

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गुरुग्राम | 17 जनवरी 2026 – गुरुग्राम जिला कांग्रेस संगठन की 17 जनवरी 2026 को जारी सूची ने संगठन को मजबूती देने के बजाय भीतर ही भीतर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस समय कांग्रेस पार्टी गुरुग्राम जैसे शहरी और राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण जिले में अपने कमजोर जनाधार को दोबारा खड़ा करने का प्रयास कर रही है, उसी समय संगठनात्मक ढांचे को लेकर उभरता असंतोष पार्टी के लिए एक चेतावनी संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

संगठन निर्माण में संतुलन का अभाव

सूची का गहराई से विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि संगठन गठन में न तो क्षेत्रीय संतुलन साधा गया और न ही संगठनात्मक अनुभव को पर्याप्त महत्व दिया गया। ऐसे कई नाम सामने आए हैं जिन्हें जिला उपाध्यक्ष जैसे अहम पद सौंपे गए, जबकि उनका संगठनात्मक योगदान पहले कभी चर्चा में नहीं रहा। कुछ व्यक्तियों को एक से अधिक जिम्मेदारियां सौंपे जाने से यह धारणा और मजबूत होती है कि संगठनात्मक मर्यादाओं को नजरअंदाज किया गया है।

सीमित कार्यकर्ता, फिर भी उपेक्षा

वर्तमान समय में कांग्रेस के सक्रिय और समर्पित कार्यकर्ताओं की संख्या पहले ही सीमित मानी जाती है। ऐसे में जिन कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक संगठन को कठिन परिस्थितियों में संभाला, आंदोलनों और चुनावी संघर्षों में पार्टी के साथ खड़े रहे, उन्हें अपेक्षित स्थान न मिलना स्वाभाविक रूप से निराशा को जन्म दे रहा है। यह स्थिति संगठन की ऊर्जा को सशक्त करने के बजाय उसे भीतर से कमजोर कर सकती है।

वरिष्ठ नेताओं के प्रभाव क्षेत्र की अनदेखी

शहरी और ग्रामीण दोनों संगठनों में यह भी स्पष्ट दिखाई देता है कि गुरुग्राम से विधायक प्रत्याशी रहे मोहित ग्रोवर, मेयर प्रत्याशी सीमा पाहुजा और वरिष्ठ कांग्रेस नेता सुखबीर कटारिया की टीम से किसी भी व्यक्ति को संगठन में शामिल नहीं किया गया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह केवल व्यक्तियों की अनदेखी नहीं, बल्कि उनके प्रभाव क्षेत्र और जमीनी नेटवर्क को भी दरकिनार करने जैसा है।

जमीनी समर्थन बनाम संगठनात्मक पद

नवगठित संगठन में कई ऐसे चेहरों को महत्वपूर्ण पद दिए गए हैं जिनके पास जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का समर्थन सीमित बताया जा रहा है। जब पद और जनाधार के बीच यह दूरी बढ़ती है, तो संगठन कागज़ों पर भले मजबूत दिखे, लेकिन मैदान में उसकी पकड़ कमजोर ही रहती है।

पिछली गलतियों की पुनरावृत्ति?

यदि इस संगठनात्मक गठन की तुलना हाल के पार्षद टिकट वितरण से की जाए, तो समान पैटर्न दिखाई देता है। उस समय भी मनपसंद व्यक्तियों को प्राथमिकता देने के आरोप लगे थे और अब संगठन में भी वही प्रवृत्ति दोहराई गई है। इससे यह संदेश जाता है कि पार्टी ने अपनी पिछली राजनीतिक चूकों से कोई ठोस सीख नहीं ली।

कुरुक्षेत्र प्रशिक्षण सेवा से जगी उम्मीद

इसी पृष्ठभूमि में कुरुक्षेत्र में आयोजित प्रशिक्षण सेवा के दौरान राहुल गांधी द्वारा सभी जिला अध्यक्षों से मुलाकात को कार्यकर्ताओं ने एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा है। संगठन के भीतर यह आशा बनी है कि राहुल गांधी जमीनी स्तर की वास्तविक स्थिति को समझेंगे और यह जान पाएंगे कि कांग्रेस संगठन किन आंतरिक चुनौतियों से गुजर रहा है। कई कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि यदि शीर्ष नेतृत्व को सही फीडबैक मिला, तो संगठनात्मक ढांचे में आवश्यक सुधार संभव हैं।

बदलाव की उम्मीद, नेतृत्व पर नजर

कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा भी है कि संगठन को मजबूती देने के लिए केवल पदों का पुनर्वितरण ही नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर जिला अध्यक्षों के स्तर पर भी बदलाव किए जा सकते हैं। यह उम्मीद इस बात का संकेत है कि जमीनी कार्यकर्ता अभी भी नेतृत्व से पूरी तरह विमुख नहीं हुए हैं, बल्कि सुधार की संभावना को जीवित मानते हैं।

निष्कर्ष

गुरुग्राम जैसे जिले में, जहां कांग्रेस पहले से ही राजनीतिक संघर्ष के दौर से गुजर रही है, संगठनात्मक निर्णयों का सीधा असर पार्टी के भविष्य पर पड़ता है। यदि नेतृत्व जमीनी कार्यकर्ताओं की आवाज को गंभीरता से सुनता है और संतुलित, समावेशी निर्णय लेता है, तो संगठन को नई दिशा मिल सकती है। अन्यथा, गुटबाजी और मनमानी का यह सिलसिला पार्टी को और कमजोर करने का कारण बन सकता है।

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Author: Bharat Sarathi

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