“बुज़ुर्गों की पेंशन पर कैंची, नेताओं की सुविधाओं पर खामोशी

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—आर्थिक अनुशासन का बोझ आखिर कब तक आम जनता पर?”

— डॉ. सत्यवान सौरभ

सरकार जब भी आर्थिक अनुशासन, बजट संतुलन या खर्च घटाने की बात करती है, तो सबसे पहले निशाने पर सामाजिक पेंशन योजनाएँ आ जाती हैं। विशेष रूप से बुढ़ापा पेंशन को लेकर बार-बार समीक्षा, कटौती और पात्रता की शर्तें सख्त करने की चर्चाएँ सामने आती रही हैं। हालिया बयानबाजी ने एक बार फिर यह मूल सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर आर्थिक सुधारों का भार हमेशा समाज के सबसे कमजोर वर्ग—बुज़ुर्गों, किसानों और मजदूर परिवारों—पर ही क्यों डाला जाता है?

बुढ़ापा पेंशन कोई सरकारी कृपा या रियायत नहीं है। यह उस सामाजिक अनुबंध का हिस्सा है, जिसमें राज्य यह स्वीकार करता है कि जिन नागरिकों ने अपनी पूरी उम्र देश की अर्थव्यवस्था को चलाने में लगा दी, उन्हें बुढ़ापे में न्यूनतम सम्मान और सुरक्षा मिलनी चाहिए। खेतों में पसीना बहाने वाले किसान, ईंट-भट्टों और फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर, असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी—इनमें से अधिकांश के पास न तो कोई पेंशन फंड होता है और न ही स्थायी बचत। ऐसे में बुढ़ापा पेंशन उनके लिए दवा, राशन और रोज़मर्रा की ज़रूरतों का आधार बनती है।

इसके बावजूद जब भी सरकारी खजाने पर दबाव की बात आती है, तो सबसे आसान रास्ता बुज़ुर्गों की पेंशन पर कैंची चलाना मान लिया जाता है। कभी फसल का बहाना, कभी ज़मीन का रकबा, कभी पारिवारिक आय और कभी बैंक खाते की तकनीकी खामियाँ—इन सब कारणों से हजारों पात्र बुज़ुर्ग पेंशन से वंचित कर दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया प्रशासनिक कम और अमानवीय अधिक प्रतीत होती है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि फसल, ज़मीन और आमदनी की ये सख्त कसौटियाँ केवल आम नागरिकों पर ही क्यों लागू होती हैं? क्या यही मानक विधायकों और सांसदों की पेंशन पर भी लागू होते हैं? क्या कभी यह जाँच की जाती है कि जनप्रतिनिधियों की वास्तविक आर्थिक स्थिति क्या है और उन्हें पेंशन की आवश्यकता है भी या नहीं?

वास्तविकता यह है कि जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली पेंशन और सुविधाएं उस वर्ग को प्राप्त होती हैं जो पहले से आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत सुरक्षित है। कई विधायक और सांसद एक से अधिक बार निर्वाचित होने के बाद कई-कई पेंशन के हकदार बन जाते हैं। इसके अलावा उन्हें वेतन, भत्ते, सरकारी आवास, वाहन, सुरक्षा और अन्य विशेष सुविधाएँ भी मिलती हैं। इसके बावजूद इन पेंशनों पर न तो कोई स्पष्ट सीमा तय है और न ही इस पर गंभीर सार्वजनिक बहस होती है।

यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों के भी खिलाफ है। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत समानता है—नीति और कानून सबके लिए समान होने चाहिए। यदि आम नागरिक से उसकी मामूली आय का हिसाब माँगा जा सकता है, तो जनप्रतिनिधियों से क्यों नहीं? यदि बुज़ुर्ग किसान की दो बीघा ज़मीन के आधार पर उसकी पेंशन रोकी जा सकती है, तो करोड़ों की संपत्ति वाले नेताओं की पेंशन पर सवाल क्यों नहीं उठते?

सरकार अक्सर यह तर्क देती है कि सामाजिक योजनाओं में अपात्र लोग शामिल हो जाते हैं, इसलिए सख्ती आवश्यक है। यह तर्क आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन इसका समाधान यह नहीं हो सकता कि जरूरतमंदों को ही व्यवस्था से बाहर कर दिया जाए। अपात्रता की आड़ में पात्र लोगों को दंडित करना किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।

यदि सरकार वास्तव में पेंशन व्यवस्था को पारदर्शी और टिकाऊ बनाना चाहती है, तो उसे सबसे पहले उन क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए जहाँ खर्च और सुविधाएं सबसे अधिक हैं। विधायकों और सांसदों की पेंशन पर स्पष्ट सीमा तय करना, बार-बार चुनाव जीतने पर अलग-अलग पेंशन देने की व्यवस्था समाप्त करना और एक समान पेंशन नीति लागू करना इस दिशा में एक ठोस कदम हो सकता है।

यह भी समझना ज़रूरी है कि सामाजिक पेंशन पर किया गया खर्च कोई बोझ नहीं, बल्कि निवेश है। बुज़ुर्गों के हाथ में थोड़ी-सी आर्थिक सुरक्षा न केवल उन्हें सम्मानजनक जीवन देती है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति देती है। यह राशि सीधे बाज़ार में जाती है—दवा की दुकानों, किराना स्टोरों और स्थानीय सेवाओं में खर्च होती है। इसके विपरीत, पेंशन बंद होने का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव कहीं अधिक नकारात्मक होता है।

लोकतंत्र में नीतियों का उद्देश्य कमजोर को मजबूत बनाना होना चाहिए, न कि मजबूर को और कमजोर करना। जब बुज़ुर्गों से उनकी आखिरी आर्थिक सहायता भी छीन ली जाती है, तो यह केवल आर्थिक निर्णय नहीं रह जाता, बल्कि एक गंभीर नैतिक प्रश्न बन जाता है। क्या एक सभ्य समाज अपने बुज़ुर्गों को इस तरह असहाय छोड़ सकता है?

अंततः सवाल केवल पेंशन का नहीं, बल्कि नीति की प्राथमिकताओं का है। क्या सरकार का ध्यान सबसे कमजोर नागरिकों पर है या सबसे सुविधासंपन्न वर्ग पर? जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब नहीं दिया जाएगा, तब तक पेंशन पर कटौती का मुद्दा एक आर्थिक बहस से अधिक, सामाजिक अन्याय का प्रतीक बना रहेगा।

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Author: Bharat Sarathi

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