धन-प्रदर्शन की होड़ और टूटता मध्यम वर्ग
— सुरेश गोयल ‘धूप वाला’
आज के समय में विवाह-शादियाँ केवल संस्कार और पारिवारिक उत्सव भर नहीं रह गई हैं, बल्कि वे धन-प्रदर्शन की खुली प्रतियोगिता बनती जा रही हैं। भव्य पंडाल, महंगी केटरिंग, फाइव-स्टार रिसॉर्ट, चकाचौंध भरी सजावट और लाखों-करोड़ों का खर्च—यह सब मानो समाज के सामने यह घोषणा हो कि “हम भी किसी से कम नहीं।”
धनवान व्यक्ति यदि अपनी सामर्थ्य के अनुसार खर्च करता है, तो वह उसका निजी अधिकार है। उस पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। लेकिन इस दिखावे की संस्कृति का सबसे गहरा और घातक असर मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग पर पड़ रहा है, जिसकी पीड़ा को समाज अभी भी गंभीरता से समझ नहीं पा रहा।
समस्या यह है कि आज समाज में एक अघोषित लेकिन बेहद कठोर सामाजिक दबाव बन चुका है। कोई भी परिवार यह जोखिम नहीं उठाना चाहता कि लोग उसे कमतर समझें। परिणामस्वरूप, लोग अपनी आर्थिक हैसियत से कई गुना अधिक खर्च करने को मजबूर हो जाते हैं। विवाह जैसे पवित्र संस्कार में भी अब “लोग क्या कहेंगे” ही सबसे बड़ा निर्णायक बन चुका है।
यह भय इतना गहरा है कि लोग अपने जीवन की शांति, बच्चों का भविष्य और आर्थिक स्थिरता—सब कुछ दांव पर लगाने से भी नहीं हिचकते।
कुछ वर्ष पूर्व का एक व्यक्तिगत अनुभव इस सामाजिक त्रासदी को बेहद स्पष्ट करता है। मेरे एक परिचित मेरे पास आए और बोले— “बेटे की रिसेप्शन रखनी है, ब्याज पर पैसों की व्यवस्था करवा दीजिए।”
मैंने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि इतनी बड़ी राशि खर्च करने से उनकी पूरी जिंदगी कर्ज और ब्याज चुकाने में निकल जाएगी। लेकिन उनका उत्तर चौंकाने वाला था— “क्या फिर समाज में मैं अपनी नाक कटवा लूं?”
यह एक वाक्य आज के सामाजिक यथार्थ को पूरी तरह नंगा कर देता है। झूठी प्रतिष्ठा के लिए लोग अपने बच्चों का भविष्य तक गिरवी रखने को तैयार हैं।
यहीं से एक गंभीर प्रश्न खड़ा होता है—
क्या विवाह वास्तव में प्रेम, संस्कार और दो परिवारों के मिलन का पर्व है, या फिर यह आर्थिक शक्ति-प्रदर्शन का मंच बन चुका है?
यदि यही प्रवृत्ति यूं ही चलती रही, तो मध्यम वर्ग की आर्थिक रीढ़ और अधिक कमजोर होती जाएगी। कर्ज, मानसिक तनाव, अवसाद, पारिवारिक कलह—ये सब इसी दिखावटी संस्कृति की देन हैं।
ऐसे समय में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा प्रस्तुत उदाहरण समाज के लिए एक सशक्त संदेश बनकर सामने आया है। उनके छोटे पुत्र डॉ. अभिमन्यु यादव का विवाह उज्जैन में आयोजित एक सामूहिक विवाह सम्मेलन में संपन्न हुआ, जहाँ 21–22 जोड़ों का विवाह एक साथ कराया गया।
न फाइव-स्टार होटल, न शाही ठाठ-बाट, न दिखावे की चकाचौंध— बल्कि सादगी, परंपरा और संस्कार के साथ विवाह संपन्न हुआ।
संभवतः यह पहला अवसर है जब किसी मुख्यमंत्री के पुत्र का विवाह सामूहिक विवाह समारोह में हुआ हो। कार्यक्रम में योगगुरु बाबा रामदेव सहित कई विशिष्ट अतिथि मौजूद थे, फिर भी आयोजन में कोई आडंबर या अनावश्यक प्रदर्शन नहीं दिखा। यही कारण है कि इस विवाह की सोशल मीडिया से लेकर समाज तक व्यापक सराहना हो रही है।
यह आयोजन केवल एक पारिवारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सामाजिक संदेश बन गया है।
डॉ. मोहन यादव का यह कदम यह सिद्ध करता है कि सादगी कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। जब समाज के शीर्ष पर बैठे लोग स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, तभी आमजन को सही दिशा मिलती है।
अब समय आ गया है कि समाज के तथाकथित ठेकेदार, सामाजिक संगठन, धार्मिक संस्थाएं और बुद्धिजीवी वर्ग इस विषय पर गंभीर मंथन करें। विवाह को आर्थिक प्रतिस्पर्धा से मुक्त करना होगा। सादे, सामूहिक और सीमित खर्च वाले विवाहों को सामाजिक सम्मान देना होगा।
विवाह जीवन की शुरुआत है, कर्ज की किस्तों की शुरुआत नहीं।
यदि हम इस सच्चाई को समझ लें और सादगी को सम्मान देना सीख लें, तो न केवल व्यक्तिगत जीवन सुखी होगा, बल्कि समाज भी आर्थिक और मानसिक रूप से अधिक स्वस्थ बन सकेगा।
डॉ. मोहन यादव के परिवार द्वारा दिया गया यह संदेश यदि समाज में जड़ पकड़ ले, तो यह एक मौन लेकिन प्रभावशाली सामाजिक क्रांति से कम नहीं होगा।









