गुरुग्राम। देश की राजधानी से सटी साइबर सिटी गुरुग्राम आज बुनियादी सुविधाओं के अभाव, बढ़ते अपराध, नशे और अव्यवस्था से जूझ रही है। जनता का सवाल सीधा है—चुनाव के बाद ये नेता कहाँ चले जाते हैं?
हैरानी की बात यह है कि विकास कार्यों का टेंडर पास होते ही पक्ष और विपक्ष—दोनों में श्रेय लेने की होड़ लग जाती है, लेकिन जब जनता को समस्याओं का सामना करना पड़ता है, तब नेता नदारद रहते हैं।
चुनाव बाद ग़ायब जनप्रतिनिधि
स्थानीय लोगों का कहना है कि गुरुग्राम से दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे उम्मीदवारों—नवीन गोयल और मोहित ग्रोवर—चुनाव के बाद शहर में दिखाई तक नहीं देते। जनता ने उन्हें भी वोट दिए थे, उम्मीद के साथ कि वे जनसमस्याओं को उठाएंगे। लेकिन विपक्ष लगभग निष्क्रिय नजर आता है। कांग्रेस पर आरोप है कि वह सरकार की विफलताओं को उजागर करने के बजाय “सरकार की गोद में बैठी” दिख रही है।
वादों का अंबार, अमल शून्य
मुख्यमंत्री के बार-बार गुरुग्राम दौरे, प्रशासनिक बैठकों और बड़ी-बड़ी घोषणाओं के बावजूद जमीनी सच्चाई यह है कि कई घोषणाएं काग़ज़ों से बाहर नहीं निकल पाईं। सवाल उठता है—क्या इन घोषणाओं की प्रगति की समीक्षा होती है? और अगर नहीं होती, तो विपक्ष उन्हें लागू कराने के लिए सरकार को क्यों नहीं घेरता?
अर्जुन नगर स्कूल: चार साल की चुप्पी, टेंडर पर सक्रियता
अर्जुन नगर के सरकारी कमेटी स्कूल का मामला इस राजनीति की बानगी बन गया है। स्कूल चार साल पहले तोड़ दिया गया, लेकिन न तो शिक्षा लौटी, न नेता। जैसे ही बजट पास हुआ, वही चेहरे मीडिया के साथ मौके पर पहुंच गए, जो वर्षों तक जनता का हाल पूछने नहीं आए। स्थानीय लोगों ने नेताओं के सामने ही कहा—“टेंडर निकलते ही ड्रामा शुरू हो जाता है, दो दिन शोर, फिर दावा कि हमारे दबाव से काम शुरू हुआ।”
बताया जा रहा है कि कांग्रेस नेता पंकज डावर 7 जनवरी 2025 को मीडिया के साथ मौके पर पहुंचे—ऐसे समय में जब बजट पहले ही पास हो चुका था।
डी-शटलिंग सीवर सफाई: उद्घाटन से पहले श्रेय की तैयारी
सूरत नगर में डी-शटलिंग सीवर सफाई कार्य का उद्घाटन तय होने से पहले भी यही दृश्य दिखा। कार्य शुरू होने से दो-तीन दिन पहले ही विपक्षी नेता मीडिया के साथ पहुंचे, लोगों से बातचीत की, और बाद में मशीन लगते ही श्रेय लेने में पीछे नहीं रहे—मानो प्रदर्शन के बाद ही प्रशासन जागा हो।
बढ़ता अपराध, नशा और अवैध कब्जे
जनता का आरोप है कि शहर की सुरक्षा चरमराई हुई है। नशा बढ़ रहा है, अपराध और अवैध अतिक्रमण फैल रहे हैं। लेकिन विपक्ष इन ज्वलंत मुद्दों को लेकर न तो सड़कों पर है, न सदन में मुखर। उलटे, कई नेता अपने निजी हितों और संबंधों को प्राथमिकता देते दिख रहे हैं।
सवाल जनता का, जवाब भी जनता को ढूँढना होगा
अब बड़ा सवाल यह है—क्या विपक्ष का काम केवल भ्रम पैदा कर छवि चमकाना है, या जनता के असली मुद्दे उठाना? क्या होने वाले कार्यों का श्रेय लेने की राजनीति, जनता के साथ धोखा नहीं?
गुरुग्राम की जनता आज खुद से पूछ रही है—उन्हें कैसा नेता चाहिए:
जो सुख-दुख में साथ खड़ा हो,
या जो सिर्फ टेंडर, कैमरे और चुनावों में नजर आए?
जनता की पीड़ा साफ है—अगर पक्ष और विपक्ष दोनों जवाबदेह नहीं होंगे, तो अपनी लड़ाई जनता को खुद ही लड़नी पड़ेगी।







