भारत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है,लेकिन क्या आम भारतीय परिवार भी उसी गति से आगे बढ़ पा रहें है?

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सस्ती शिक्षा, सस्ता इलाज और कैंसर पर निर्णायक वार ज़रूरी – भारत की असली तरक्की का रास्ता,परिवार केंद्रित नीतियों से होकर गुजरता है?

महंगी निजी स्वास्थ्य सेवा : इलाज या आर्थिक तबाही? महंगी होती शिक्षा : सपनों पर भारी फीस -केंद्र सरकार को इसपर नियंत्रण के लिए स्पष्ट नीति बनाना समय की मांग

– एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत आज वैश्विक मंचों पर आर्थिक शक्ति, तकनीकी नेतृत्व और कूटनीतिक प्रभाव के प्रतीक के रूप में उभर रहा है। अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की रिपोर्टें भारत की तेज़ विकास दर, डिजिटल क्रांति और रणनीतिक भूमिका को रेखांकित करती हैं। लेकिन इसी चमकते परिदृश्य के बीच एक मौलिक प्रश्न खड़ा है—क्या यह विकास आम भारतीय परिवार के जीवन में भी उसी गति से सुरक्षा, सुलभता और सम्मान लेकर आ रहा है? एक साधारण परिवार आज सबसे पहले यह सोचने को मजबूर है कि बच्चों की शिक्षा कितनी महंगी होगी, बीमारी आने पर इलाज कैसे होगा और कैंसर जैसी भयावह बीमारी से कैसे निपटा जाएगा। यही तीन प्रश्न आज भारत की सामाजिक सच्चाई और नीति-निर्माण की कसौटी बन चुके हैं।विकास की असली परिभाषा: परिवार की सहज पहुंच, मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया (महाराष्ट्र), यह मानता हूं कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति का आकलन उसके सकल घरेलू उत्पाद, वैश्विक रैंकिंग या शेयर बाजार के सूचकांकों से नहीं किया जाना चाहिए। असली मापदंड यह है कि एक साधारण परिवार कितनी सहजता से शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी आवश्यकताओं तक पहुंच पा रहा है। भारत में सस्ती शिक्षा और सस्ता इलाज अब केवल नीतिगत मुद्दे नहीं रहे, बल्कि करोड़ों परिवारों के अस्तित्व, भविष्य और सामाजिक स्थिरता से जुड़े जीवन-मरण के प्रश्न बन चुके हैं।

अंतरराष्ट्रीय दृष्टि: सभ्य समाज की आधारशिला

संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार यह स्वीकार किया गया है कि शिक्षा और स्वास्थ्य किसी भी देश की मानव पूंजी के मूल स्तंभ होते हैं। शिक्षा व्यक्ति को सोचने, निर्णय लेने और समाज में योगदान करने की क्षमता देती है, जबकि स्वास्थ्य उसे उस क्षमता का उपयोग करने योग्य बनाता है। यदि इनमें से कोई एक भी कमजोर हो, तो विकास की पूरी संरचना असंतुलित हो जाती है। भारत में समस्या यह नहीं है कि शिक्षा और स्वास्थ्य की नीतियां नहीं हैं, बल्कि यह है कि उनकी लागत आम नागरिक की आय से कहीं अधिक तेजी से बढ़ी है।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव बनाम भारत की स्थिति

फिनलैंड, जर्मनी और नॉर्वे जैसे देशों में शिक्षा को सार्वजनिक निवेश के रूप में देखा जाता है, जहां उच्च शिक्षा तक लगभग निःशुल्क पहुंच उपलब्ध है। इसके विपरीत भारत में सार्वजनिक शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता और संख्या मांग के अनुपात में कम है, जिससे निजी क्षेत्र को अत्यधिक विस्तार का अवसर मिला। परिणामस्वरूप, प्रतिभा के बजाय आर्थिक क्षमता शिक्षा के अवसर तय करने लगी है, जो सामाजिक असमानता को और गहरा करती है।

शिक्षा और स्वास्थ्य : केवल सेवाएं नहीं, जीवन का प्रश्न

शिक्षा और स्वास्थ्य किसी भी समाज में केवल सेवाएं नहीं होतीं, बल्कि नागरिक की गरिमा, अवसर और भविष्य की गारंटी होती हैं। भारत में सस्ती शिक्षा और सस्ता इलाज अब केवल मध्यम वर्ग की मांग नहीं रहे। गरीब, निम्न-मध्यम और यहां तक कि स्थिर आय वाले परिवारों के लिए भी ये जीवन की प्राथमिक जरूरत बन चुके हैं। यदि बच्चा पढ़ नहीं पाता, तो उसका भविष्य सीमित हो जाता है; और यदि कोई गंभीर बीमारी आ जाए, तो पूरा परिवार आर्थिक व मानसिक संकट में डूब जाता है।

महंगी होती शिक्षा: सपनों पर भारी फीस

भारत के संविधान ने शिक्षा को मौलिक अधिकार माना है, किंतु ज़मीनी हकीकत यह है कि अच्छी शिक्षा अब आम परिवार की क्षमता से अधिक खर्च मांग रही है। निजी स्कूलों की फीस, किताबें, कोचिंग संस्थान और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी—इन सबने मिलकर शिक्षा को दीर्घकालिक आर्थिक दबाव में बदल दिया है। आज एक औसत परिवार अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए कर्ज लेने को मजबूर है। यह स्थिति न केवल पारिवारिक बचत को खत्म करती है, बल्कि समाज की समानता और अवसरों की निष्पक्षता को भी कमजोर करती है।

स्वास्थ्य सेवा: इलाज या आर्थिक तबाही?

भारत में बीमारी अब केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि आर्थिक आपदा बन चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, इलाज पर होने वाला अधिकांश खर्च सीधे परिवार की जेब से जाता है। इसका अर्थ है कि एक गंभीर बीमारी पूरे परिवार को वर्षों पीछे धकेल सकती है। सरकारी योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन उनकी पहुंच, क्षमता और भरोसे को लेकर अब भी बड़े सवाल बने हुए हैं।

कैंसर: एक व्यक्ति की नहीं, पूरे परिवार की लड़ाई

कैंसर आज भारत में तेजी से बढ़ती बीमारी बन चुका है। बदलती जीवनशैली, प्रदूषण, तंबाकू सेवन, तनाव और देर से जांच—इन सभी कारणों ने मिलकर कैंसर को राष्ट्रीय चुनौती बना दिया है। कैंसर का इलाज लंबा, महंगा और मानसिक रूप से थकाने वाला होता है। कई बार परिवार का कमाने वाला सदस्य बीमार पड़ता है और दूसरा सदस्य देखभाल के लिए नौकरी छोड़ देता है। इस तरह कैंसर एक व्यक्ति की बीमारी न रहकर पूरे परिवार का संघर्ष बन जाता है।

रोकथाम ही सबसे सस्ता इलाज

अंतरराष्ट्रीय अनुभव स्पष्ट बताते हैं कि कैंसर की रोकथाम और समय पर जांच, इलाज से कहीं अधिक प्रभावी और सस्ती है। नियमित स्क्रीनिंग, जन-जागरूकता, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की मजबूती और जीवनशैली में सुधार से कैंसर के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। भारत को अब इलाज-केंद्रित सोच से आगे बढ़कर रोकथाम-केंद्रित स्वास्थ्य नीति अपनानी होगी।

कैंसर: बीमारी नहीं, सामाजिक संकट

पिछले कुछ वर्षों में भारत में कैंसर के मामलों में तेज़ वृद्धि दर्ज की गई है। शहरीकरण, प्रदूषण, असंतुलित आहार और तनावपूर्ण जीवनशैली ने इसे एक सामाजिक संकट का रूप दे दिया है। कैंसर का असर केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता; यह परिवार की मानसिक शांति, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक संरचना को गहराई से प्रभावित करता है। इलाज की लागत कई परिवारों की वर्षों की आय के बराबर होती है, जिससे पूरा परिवार त्रासदी के चक्र में फंस जाता है।

शिक्षा और स्वास्थ्य का सीधा संबंध

सस्ती शिक्षा और सस्ता इलाज एक-दूसरे के पूरक हैं। शिक्षित समाज अधिक स्वास्थ्य-जागरूक होता है और स्वस्थ नागरिक बेहतर शिक्षा व उत्पादकता में योगदान देता है। जब बीमारी का बोझ कम होता है, तो परिवार शिक्षा, नवाचार और भविष्य पर निवेश कर पाता है। इस प्रकार सस्ती शिक्षा और सस्ता इलाज मिलकर एक मजबूत राष्ट्र की नींव रखते हैं।

परिवार पर तिहरा असर

जब शिक्षा महंगी होती है, इलाज महंगा होता है और कैंसर जैसी बीमारी दस्तक देती है, तो असर केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।

पहला-परिवार की बचत खत्म हो जाती है। दूसरा-बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। तीसरा-मानसिक तनाव पीढ़ियों तक असर डालता है।

इसी कारण ये मुद्दे केवल सामाजिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास से भी जुड़े हुए हैं।

नीति-निर्माताओं के लिए स्पष्ट संदेश

अब समय आ गया है कि, शिक्षा को खर्च नहीं, बल्कि राष्ट्रीय निवेश माना जाए। स्वास्थ्य को दया नहीं, बल्कि नागरिक का अधिकार समझा जाए। कैंसर को केवल बीमारी नहीं, बल्कि सख्त नीति आपातकाल के रूप में देखा जाए।

भारत की वास्तविक शक्ति उसके परिवार हैं, और परिवार तभी मजबूत होंगे जब शिक्षा सुलभ और इलाज सस्ता होगा।

वैश्विक छवि और आंतरिक सच्चाई

भारत विश्वगुरु बनने की बात करता है, लेकिन कोई भी देश तब तक नैतिक नेतृत्व नहीं कर सकता, जब तक उसके नागरिक शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए संघर्षरत हों। सस्ती शिक्षा, सस्ता इलाज और कैंसर पर ठोस रणनीति ही भारत को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानवीय महाशक्ति बना सकती है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि अब देरी की गुंजाइश नहीं,सस्ती शिक्षा, सस्ता इलाज और कैंसर की प्रभावी रोकथाम,ये तीनों मिलकर भारत की मानव-केंद्रित विकास यात्रा को सही दिशा दे सकते हैं। यही वह रास्ता है जो भारत को केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं, बल्कि एक स्वस्थ, शिक्षित और संवेदनशील राष्ट्र बनाएगा। यदि अभी ठोस, वैज्ञानिक और मानवीय रणनीति नहीं अपनाई गई, तो इसकी कीमत आने वाले वर्षों में केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि टूटते परिवारों और बिखरते सपनों में चुकानी पड़ेगी। बजट 2026 में ही सस्ती शिक्षा, सस्ता इलाज और कैंसर की निर्णायक रणनीति स्पष्ट रूप से दिखनी चाहिए,यही भारत की अगली बड़ी छलांग का आधार है।

-संकलनकर्ता/लेखक:कर विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत माध्यमा, सीए (एटीसी),एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया, महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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