— सुरेश गोयल ‘धूप वाला’
“भाई दूर, पड़ोसी नेड़े” — यह कहावत मात्र शब्दों का खेल नहीं, बल्कि जीवन के यथार्थ से उपजा गहरा अनुभव है। मनुष्य के जीवन में जब अचानक कोई संकट आता है—दुर्घटना हो, बीमारी घेर ले या कोई आपात स्थिति बन जाए—तो सबसे पहले सहायता के लिए जो व्यक्ति आगे आता है, वह अक्सर पड़ोसी ही होता है। भाई-बंधु, रिश्तेदार या अन्य परिजन चाहे कितने ही स्नेही क्यों न हों, भौगोलिक दूरी और समय की बाधाओं के कारण वे तुरंत उपस्थित नहीं हो पाते। इस दृष्टि से यह कहावत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी पहले थी—बल्कि आधुनिक समय में इसकी आवश्यकता और भी बढ़ गई है।
विडंबना यह है कि आधुनिक और तथाकथित उन्नत जीवन-शैली में पड़ोसी संबंध लगातार कमजोर होते जा रहे हैं। महानगरों की ऊँची-ऊँची इमारतों में लोग वर्षों तक साथ रहते हैं, फिर भी एक-दूसरे का नाम तक नहीं जानते। ऊपर-नीचे या अगल-बगल की मंज़िलों में रहने वाले लोग केवल औपचारिक ‘नमस्ते’ तक सीमित रह गए हैं। संयुक्त परिवारों के विघटन और एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने सामाजिक संवाद को और संकुचित कर दिया है। अब दरवाज़े खुले नहीं रहते—डिजिटल लॉक, सीसीटीवी और ऊँची दीवारें रिश्तों के बीच खड़ी हो गई हैं।
आज छोटी-छोटी बातों को लेकर पड़ोसियों के बीच तनाव और विवाद आम हो गए हैं। पार्किंग, पानी, शोर, बच्चों की आवाज़ या पालतू जानवर—ये सब मुद्दे अक्सर आपसी कटुता का कारण बन जाते हैं। संवाद के अभाव में शंकाएँ जन्म लेती हैं और शंकाओं से अविश्वास। जब अविश्वास गहराता है, तो संबंधों की मिठास समाप्त हो जाती है। परिणामस्वरूप, पड़ोसी होते हुए भी लोग एक-दूसरे के लिए अजनबी बनते जा रहे हैं।
जबकि भारतीय संस्कृति में पड़ोसी को केवल पास में रहने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि विस्तारित परिवार का हिस्सा माना गया है। हमारे गाँवों और मोहल्लों में कभी ऐसा समय था, जब एक घर की खुशी और दुख पूरे मोहल्ले का साझा विषय होता था। किसी के यहाँ विवाह हो या शोक, पड़ोसी बिना बुलाए सहयोग के लिए उपस्थित रहते थे। बच्चों की परवरिश सामूहिक जिम्मेदारी मानी जाती थी और बुज़ुर्ग पूरे मोहल्ले के मार्गदर्शक होते थे। यही सामाजिक ताना-बाना हमारी असली शक्ति था।
आज आवश्यकता इस खोती हुई परंपरा को पुनर्जीवित करने की है। पड़ोसियों के साथ मधुर और विश्वासपूर्ण संबंध बनाना कोई कठिन कार्य नहीं है। इसकी शुरुआत छोटे-छोटे प्रयासों से हो सकती है—आपसी संवाद, हालचाल पूछना, पर्व-त्योहारों पर शुभकामनाएँ देना और आवश्यकता पड़ने पर सहयोग की भावना रखना। बच्चों और बुज़ुर्गों के प्रति संवेदनशीलता भी पड़ोसी संबंधों को मजबूत बनाती है। जब हम एक-दूसरे को केवल “साथ रहने वाला” नहीं, बल्कि “साथ निभाने वाला” समझने लगते हैं, तभी सच्चे अर्थों में पड़ोस का भाव विकसित होता है।
संकट के समय पड़ोसी ही वह पहला सहारा होता है, जो बिना किसी औपचारिकता के मदद के लिए आगे आता है—अस्पताल पहुँचाने से लेकर घर की देखभाल तक। यह भूमिका कोई दूर का रिश्तेदार तत्काल नहीं निभा सकता। इसलिए यह हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है कि हम पड़ोसी संबंधों को समय, सम्मान और संवेदना दें।
निष्कर्षतः, आधुनिकता के नाम पर हम सुविधाएँ तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन संवेदनशीलता खोते जा रहे हैं। “भाई दूर, पड़ोसी नेड़े” की कहावत आज भी हमें यह सिखाती है कि जीवन की वास्तविक सुरक्षा और सुख दीवारों व तकनीक से नहीं, बल्कि रिश्तों से आते हैं। यदि हम आपसी विश्वास, सहयोग और संवाद को पुनः स्थान दें, तो न केवल हमारे पड़ोसी संबंध सुदृढ़ होंगे, बल्कि समाज भी अधिक सुरक्षित, सहिष्णु और मानवीय बनेगा।







