बादशाहपुर की बैठक में खाली कुर्सियाँ, सूचना के बिना भीड़ कैसे आए? — कार्यकर्ताओं की नाराज़गी
ऋषि प्रकाश कौशिक

गुरुग्राम/बादशाहपुर। दिल्ली रामलीला मैदान में 14 दिसंबर को प्रस्तावित कांग्रेस की ‘वोट चोर गद्दी छोड़ महारैली’ को लेकर गुरुवार को बादशाहपुर स्थित ग्रामीण जिला कांग्रेस कार्यालय में अहम बैठक की गई। इसमें हरियाणा में पार्टी मामलों के प्रभारी बी.के. हरिप्रसाद, पूर्व मुख्यमंत्री व नेता प्रतिपक्ष चौधरी भूपेंद्र सिंह हुड्डा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह, सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा, सह-प्रभारी जितेंद्र भगेल और कार्यकारी अध्यक्ष जितेंद्र भारद्वाज मौजूद रहे।
नेताओं ने अपने संबोधन में कहा कि भाजपा संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग करते हुए मतदाता सूची से छेड़छाड़ और वोट चोरी के सहारे सत्ता हथिया रही है।
बी.के. हरिप्रसाद ने कहा कि यह रैली लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का अभियान है, न कि केवल कोई राजनीतिक कार्यक्रम।
वहीं भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि राहुल गांधी ने हरियाणा व कर्नाटक में वोट चोरी के मामलों को उजागर कर भाजपा-चुनाव आयोग की मिलीभगत को बेनकाब किया है।
राव नरेंद्र सिंह ने दावा किया कि रामलीला मैदान की रैली ऐतिहासिक होगी और हर कार्यकर्ता इसमें अपनी भूमिका सुनिश्चित करे।
घोषणाएँ बनाम हकीकत — कार्यकर्ताओं की नाराज़गी की जड़ यहीं!
बैठक से पहले कल जारी प्रेस नोट में जिला ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष वर्धन यादव ने दावा किया था कि कार्यक्रम में —
बी.के. हरिप्रसाद, भूपेंद्र हुड्डा, राव नरेंद्र सिंह, राष्ट्रीय महासचिव कुमारी शैलजा, दीपेंद्र हुड्डा, जितेंद्र भगेल, कार्यकारी अध्यक्ष जितेंद्र भारद्वाज और अन्य वरिष्ठ नेताओं — सबकी उपस्थिति सुनिश्चित है।
लेकिन वास्तविक रूप में आज की बैठक में कुमारी शैलजा एवं उनके गुट के प्रमुख नेता उपस्थित ही नहीं दिखे। यही नहीं, स्थानीय कार्यकर्ताओं की उपस्थित भी बेहद कम रही।
सूचना तंत्र फेल — खाली कुर्सियों ने नेतृत्व की पोल खोली
कई कार्यकर्ताओं ने कहा कि उन्हें बैठक के बारे में कोई भी जानकारी नहीं दी गई — न फोन, न मैसेज, न व्हाट्सऐप।
यही कारण है कि बैठक में खाली कुर्सियाँ ज्यादा दिखाई दीं।
एक कार्यकर्ता की तीखी टिप्पणी—
“चमचागिरी करने वालों का बोलबाला है,
मेहनतकश जमीनी कार्यकर्ता हाशिये पर धकेले जा रहे हैं।”
कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिलाध्यक्षों की नियुक्ति के बाद भी स्थानीय कमेटियों का गठन अधूरा है, जिससे संगठनात्मक संवाद टूट चुका है।







