गुरुग्राम। हरियाणा की राजनीति में गुरुग्राम हमेशा से रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जिला रहा है, लेकिन इसी जिले में कांग्रेस संगठन के भीतर असंतोष अब लगातार गहराता जा रहा है। यह असंतोष अब केवल बंद कमरों की चर्चाओं तक सीमित नहीं, बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेतृत्व के बीच खुलकर बातचीत का विषय बन चुका है। कई पुराने पदाधिकारी और जमीनी कार्यकर्ता मानते हैं कि संगठन की दिशा, निर्णय प्रक्रिया और कार्यप्रणाली में गंभीर खामियां उभरकर सामने आई हैं, जिन पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है।
टिकट वितरण पर सबसे बड़ा सवाल—“समर्पण की कोई कीमत नहीं?”
गुरुग्राम कांग्रेस में असंतोष की सबसे बड़ी वजह टिकट वितरण को माना जा रहा है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछले लोकसभा, विधानसभा, मेयर और पार्षद चुनावों में पार्टी ने वर्षों से कांग्रेस की रीति-नीति के साथ काम कर रहे निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी की। आरोप है कि—
- लोकसभा चुनाव में स्थानीय दावेदारों को किनारे कर बाहरी उम्मीदवार को प्राथमिकता दी गई।
- विधानसभा चुनावों में ऐसे लोगों को टिकट दिया गया जो चुनाव से ठीक पहले तक संगठन में सक्रिय ही नहीं थे।
- मेयर और पार्षद चुनावों में भी कई टिकट उन चेहरों को मिले जो या तो हाल ही में दूसरी पार्टियों से आए थे या जिनकी कांग्रेस के साथ कोई स्थायी पहचान नहीं थी।
कई पुराने कार्यकर्ताओं का कहना है कि “सालों की मेहनत और समर्पण को न तो महत्व मिला, न ही सम्मान।” यह भावना संगठन की जड़ों को कमजोर कर रही है।
जमीनी संगठन कमजोर—कार्यक्रमों में ‘नगण्य’ भागीदारी
सिर्फ टिकट वितरण ही नहीं, बल्कि संगठन का जमीनी ढांचा भी सवालों के घेरे में है। गुरुग्राम, बादशाहपुर, सोहना और पटौदी (आरक्षित) समेत कई विधानसभा क्षेत्रों में जिलास्तरीय नेतृत्व और पूर्व प्रत्याशियों की सक्रियता पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं।
- कई कार्यक्रमों में कार्यकर्ताओं की उपस्थिति 50 तक भी नहीं पहुंचती।
- संगठन की गतिविधियाँ कागज़ों और औपचारिक बयानों तक सीमित रह गई हैं।
- जिलाध्यक्षों और पदाधिकारियों की जनता तथा कार्यकर्ताओं के बीच वास्तविक उपस्थिति बेहद कमजोर बताई जा रही है।
- संवाद की कमी सबसे बड़ा मुद्दा है—कई कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जिलाध्यक्ष फोन तक नहीं उठाते, जिससे जमीनी संगठन हतोत्साहित हो रहा है।
इन परिस्थितियों ने संगठनात्मक मनोबल को गहरी चोट पहुंचाई है।
पारदर्शिता और आत्मसमीक्षा—कार्यकर्ताओं की प्रमुख मांगें
तेज़ी से बढ़ते असंतोष के बीच कार्यकर्ताओं और कांग्रेस समर्थकों की मुख्य मांग है कि पार्टी अपने संगठनात्मक ढांचे की गंभीर समीक्षा करे। उनकी अपेक्षाओं में शामिल हैं—
- टिकट वितरण और पदों के चयन की प्रक्रिया पूर्णतः पारदर्शी हो।
- वर्षों से काम कर रहे निष्ठावान कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता मिले।
- संगठन में प्रवेश कर चुके बाहरी और संदिग्ध तत्वों की समीक्षा हो।
- जिलास्तरीय नेतृत्व को जवाबदेह बनाया जाए और संवाद को मज़बूत किया जाए।
कार्यकर्ताओं का मानना है कि संगठन तभी मजबूत हो सकता है जब स्थानीय नेतृत्व की जवाबदेही तय हो और जमीनी कार्यकर्ताओं का सम्मान वापस बहाल किया जाए।
सुधार की गुंजाइश बड़ी—नेतृत्व की निर्णायकता अत्यंत आवश्यक
गुरुग्राम जैसा आर्थिक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जिला किसी भी पार्टी की सफलता के लिए निर्णायक भूमिका निभाता है। ऐसे में कांग्रेस संगठन की वर्तमान स्थिति पार्टी के लिए चिंता का विषय है। विशेषज्ञों का मानना है कि—
- कार्यकर्ताओं का सम्मान,
- निरंतर संवाद,
- पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया,
- और जमीनी स्तर पर सक्रिय उपस्थिति
ये चार स्तंभ संगठन को फिर से खड़ा कर सकते हैं।
गुरुग्राम कांग्रेस में उभरे असंतोष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संगठनात्मक मजबूती केवल बड़े नेताओं के बयानों से नहीं आएगी। इसके लिए वास्तविक जमीनी कार्यकर्ताओं की भूमिका को पहचानना और उनके योगदान का सम्मान करना आवश्यक है।
यदि कांग्रेस नेतृत्व ईमानदार आत्ममंथन और सुधारात्मक कदमों के साथ आगे बढ़ता है, तो गुरुग्राम न केवल संगठनात्मक रूप से पुनर्जीवित हो सकता है, बल्कि हरियाणा की राजनीति में भी अपनी मजबूत उपस्थिति एक बार फिर स्थापित कर सकता है।








