राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस पर समाजसेवी का गंभीर सवाल—“क्या केंद्र सरकार के पास हवा को शुद्ध करने की कोई नीति है?”

गुरुग्राम, 2 दिसंबर। राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस के अवसर पर समाजसेवी इंजीनियर गुरिंदरजीत सिंह (अर्जुन नगर, गुरुग्राम) ने भोपाल गैस त्रासदी में जान गंवाने वाले हजारों लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि आज 2 दिसंबर सिर्फ एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति प्रशासनिक जवाबदेही का आईना है। उन्होंने कहा कि “भोपाल गैस कांड ने हमें बताया कि लापरवाही और प्रदूषण मिलकर किस तरह हजारों जिंदगियाँ छीन लेते हैं।”
“गुरुग्राम–एनसीआर हर साल गैस चेंबर बन रहा है, फिर सरकार मौन क्यों?” — गुरिंदरजीत सिंह
इंजीनियर गुरिंदरजीत सिंह ने कहा कि दिल्ली–एनसीआर की हवा लगातार जहरीली हो रही है, जबकि सरकारें केवल मीटिंग और वादों तक सीमित हैं। उन्होंने कठोर सवाल उठाया:
“जब हर साल प्रदूषण नियंत्रण दिवस मनाते हैं, फिर भी गुरुग्राम गैस चेंबर जैसा क्यों बन रहा है? क्या केंद्र सरकार के पास हवा को शुद्ध करने का कोई ठोस उपाय नहीं है?”
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: प्रदूषण का असली दोषी कौन?
गुरिंदरजीत सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में CJI सूर्यकांत की उस महत्वपूर्ण टिप्पणी का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया:
“कोविड में भी पराली जली, फिर भी आसमान नीला था—तो फिर असली प्रदूषण कौन फैला रहा है?”
उन्होंने कहा कि यह टिप्पणी साफ करती है कि
- समस्या सिर्फ किसानों की पराली नहीं,
- बल्कि शहरों का ट्रैफिक, धूल, उद्योग और प्रशासनिक कमजोरी बड़े कारण हैं।
नीति आयोग की 35 वर्षीय अधिकारी को स्टेज-4 लंग कैंसर: ‘जीवन बचाने के लिए हवा बचानी होगी’
गुरिंदरजीत सिंह ने बताया कि हाल ही में नीति आयोग की 35 वर्षीय अधिकारी उर्वशी प्रसाद, जो नॉन-स्मोकर हैं, को स्टेज–4 लंग कैंसर हुआ है—जिसका बड़ा कारण डॉक्टरों ने प्रदूषण बताया है।
उर्वशी प्रसाद ने स्वयं कहा:
“मैंने कभी स्मोकिंग नहीं की, फिर भी स्टेज-4 कैंसर… यह बेबसी की सजा जैसा है।”
यह घटना एनसीआर की जहरीली हवा की भयावहता पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।
विशेषज्ञों की चेतावनी—“प्रदूषित हवा धूम्रपान से भी खतरनाक”
डॉक्टरों के अनुसार:
- प्रदूषित हवा में लंबे समय तक सांस लेना, धूम्रपान से भी अधिक नुकसानदेह है।
- लंग कैंसर अब केवल स्मोकर्स की बीमारी नहीं—प्रदूषण बड़ा कारण बन चुका है।
अध्ययन बताते हैं:
- 1998 में 90% मरीज स्मोकर्स थे,
- 2018 के बाद 50–70% मरीज नॉन-स्मोकर हैं।
- 2025 तक लंग कैंसर के मामले 81,200 होने का अनुमान है।
गुरुग्राम में स्वास्थ्य संकट गहराता हुआ
गुरुग्राम के NH-48, साइबर सिटी, गोल्फ कोर्स रोड जैसे कॉरिडोर लगातार भारी ट्रैफिक और निर्माण धूल से घिरे हैं।
स्थिति alarming:
- पिछले पाँच वर्षों में सांस की बीमारियाँ 35–40% बढ़ी
- अस्पतालों में आने वाले 10 में से 6 मरीज फेफड़ों की समस्या से परेशान
- AQI कई दिनों तक 300–450, यानी “बहुत खराब” से “गंभीर” स्तर
डॉक्टरों की सलाह:
- AQI 200+ पर मास्क अनिवार्य
- सुबह–शाम खुली हवा में व्यायाम न करें
- HEPA फ़िल्टर वाले एयर-प्यूरीफायर का उपयोग
- बच्चों–बुजुर्गों को अधिक प्रदूषण वाले दिनों में बाहर न निकालें
सरकार के लिए स्पष्ट संदेश: अब कार्रवाई का समय है
गुरिंदरजीत सिंह ने कहा:
“प्रदूषण अब असुविधा नहीं, जीवन के लिए खतरा बन चुका है। यह स्वास्थ्य आपातकाल है। युवा, बच्चे, बुजुर्ग सभी प्रभावित हैं। सरकार को तुरंत ठोस कदम उठाने होंगे, वरना आने वाला समय और भयावह होगा।”
उन्होंने अपील की कि
- प्रदूषण नियंत्रण को राजनीति से ऊपर रखा जाए,
- शहरों में वैज्ञानिक उपाय लागू हों,
- और जनता को स्वच्छ हवा का मौलिक अधिकार दिया जाए।
निष्कर्ष
गुरुग्राम–एनसीआर में प्रदूषण सिर्फ आंकड़ा या मौसम का मसला नहीं—यह जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन चुका है। समाजसेवी इंजीनियर गुरिंदरजीत सिंह का संदेश स्पष्ट है:
“अगर हमने अभी हवा नहीं बचाई, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बचाना मुश्किल होगा।”








