-कमलेश भारतीय

पता नहीं, किधर से किधर , यादों की गलियों में निकल जाता हूँ और बहुत बार यादों में खोया-खोया, किसी एक में पूरी तरह खो जाता हूँ। आज जालंधर के बहाने पंजाब के ही नहीं, देश के प्रसिद्ध नाटककार मोहन राकेश की ओर वापस आ रहा हूँ। उनके ठहाके आज भी जालंधर के पुराने लेखकों को याद हैं, उन ठहाकों के पीछे का दर्द कम ही लोग जानते हैं! जगजीत सिंह की गायी ग़ज़ल जैसी हालत है :

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या गम है, जिसको छुपा रहे हो!.

मोहन राकेश के हाथों में शादी की सही लकीर नहीं थी! तीन तीन शादियों के बावजूद वे ठहाकों के पीछे अपना दर्द छिपाते रहे! पर उनके नाटकों की ओर आता हूँ।

मोहन राकेश ने जीवन में तीन नाटक लिखे-आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और‌ आधे अधूरे। चौथा नाटक पूरा नहीं कर पाये, जिसे बाद में उनके कथाकार त्रयी में से एक मित्र कमलेश्वर ने ‘पैर तले की ज़मीन’ के रूप में पूरा किया। ‘आषाढ़ का एक दिन’ से ‘आधे अधूरे’ तक तीनों नाटक खूब पढ़े ही नहीं देश भर में खूब मंचित किये जा रहे हैं ! आषाढ़ का एक दिन पंजाब विश्वविद्यालय के थियेटर विभाग में दैनिक ट्रिब्यून के शुरुआती दिनों में देखा था ओर संयोग देखिये कि मल्लिका के रूप में भावपूर्ण अभिनय करने वाली छात्रा को आज भी जानता हूँ ओर वे हैं वंदना राजीव भाटिया! हिसार के ही ऱगकर्मी राजीव भाटिया की पत्नी। इस नाटक में कालिदास की प्रेमिका की भूमिका बहुत ही भावनाओ में बहकर निभाने वाली वंदना को कैसे भूल सकता हूँ! वह भी राजीव भाटिया के साथ मुम्बई रहती हैं और कुछेक विज्ञापनों में अचानक देखा है वंदना को! मुम्बई सबकी कला का सही इस्तेमाल कहाँ करती है! यह बात प्रसिद्ध अभिनेत्री दीप्ति नवल ने मेरे साथ फोन पर हुई इंटरव्यू में कही थी कि मैं बाकायदा कत्थक नृत्य प्रशिक्षित थी लेकिन किसी भी निर्देशक ने किसी भी फिल्म में मेरी इस कला का कोई उपयोग नहीं किया! मुझे यह खुशी है कि दीप्ति नवल के पिता हमारे नवांशहर के ही थे और‌ दीप्ति नवल कभी भी नवांशहर आ सकती हैं, अपने पिता के शोरियां मोहल्ले में!

खैर, हम बात कर रहे थे, मोहन राकेश के नाटकों की ! आषाढ़ का एक दिन का आखिरी संवाद है कि क्योंकि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता ! कालिदास राजा के आमंत्रण पर राज दरबार में जाना नहीं चाहता लेकिन मल्लिका जैसे कैसै मना कर कालिदास को भेजती है लेकिन उसकी माँ कहती है कि वह तुम्हें साथ क्यों नहीं लेकर गया तब मल्लिका कहती है कि भावनाओं को आप नही समझोगी, मां! मैने भावना में भावना का वरन किया है और मल्लिका कालिदास से खामोश प्यार करती रहती है जबकि उसकी शादी विलोम से हो जाती है। जब सब कुछ गंवा कर कालिदास वापस मल्लिका के पास आता है तब मल्लिका उसे भोजपत्रों का पुलिंदा यह कहकर सौ़पती है कि सोचा था, यह आपको दूंगी ताकि इस पर कोई ग्रंथ लिख सको! कालिदास उन भोजपत्रों को यह कह कर लौटा देता है कि इन पर तो पहले ही एक ग्र्ंथ की रचना हो चुकी है यानी उन पन्नों पर मल्लिका के कालिदास के वियोग के बहाये आंसू दिखते हैं ! यह नाटक एन एस डी से लेकर न जाने देश के किस किस कोने में मंचित नहीं किया गया! यही हाल लहरों के राज हंस का रहा और आधे अधूरे का भी! लहरों के राजहंस में संवाद देखिये जो ऩंद की पत्नी कहती है कि नारी का आकर्षण पुरुष को पुरुष बनाता है तो नारी का अपकर्षण उसे महात्मा बुद्ध बना देता है ! आखिर मे़ ऩंद लहरों के राज़हंस की तरह पत्नी सु़दरी को कहता है कि मैं जाकर बुद्ध से पूछूँगा कि उसने मेरे बालों का क्या किया? यह है इंसान‌ जो लहरों के राजहंसो़ की तरह अपने ही फैसले बदलता रहता है !

अंतिम नाटक आधे अधूरे आज के समाज को आइना दिखाने के लिए काफी है कि हम सब आधी अधूरी ख्वाहिशों के साथ जीते हैं! इस नाटक का आइडिया मोहन राकेश को उनकी पत्नी अनिता राकेश ने ही दिया था और इसकी भावभूमि उनकी ससुराल ही थी!

आज काफी हो गया! कल फिर मिलते हैं! कभी कभी बता दिया कीजिये कुछ तो! 9416047075

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