-कमलेश भारतीय

हरियाणा के कद्दावर नेता चौ बीरेन्द्र सिंह का एक तकिया कलाम है -राजनीति में मैं दरियां बिछाने नहीं आया ! हरियाणा में रहते रहते छब्बीस साल बीत गये लेकिन चौ बीरेन्द्र सिंह के मन की मुराद पूरी नहीं हुई । यानी सीधे सीधे समझ लीजिए कि वे सिर्फ मंत्री या केंद्रीय मंत्री बन कर ही संतुष्ट नहीं हो सकते । उन्हें तो मुख्यमंत्री बनना है , यह एक सपना था , है और रहेगा । यह सपना अभी तक पूरा नहीं हुआ और अधूरा सपना परेशान किये रहता है । कांग्रेस में रहते चौ बीरेन्द्र सिंह वित्तमंत्री बनाये गये और तब मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा यह कहते थे कि मैंने खजाने की चाबियां चौ बीरेन्द्र सिंह को सौंप रखी हैं , कोई कमी हो तो बतायें । पर चौ साहब तो मुख्यमंत्री बनना चाहते थे और इन्हें शांत करने के लिए केंद्रीय रेलमंत्री बनाया जाना था लेकिन ऐन वक्त पर वह भी न बनाये गये । इस तरह कांग्रेस से दिल टूट गया । फिर ये भाजपा में इसी उम्मीद में शामिल हो गये लेकिन भाजपा की दो दो बार आई सरकार में भी चौ बीरेन्द्र सिंह की बजाय मनोहर लाल खट्टर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपनी नजदीकियों के चलते मुख्यमंत्री बने । इस तरह यहां भी मायूसी ही हाथ लगी । राज्यसभा में चुने गये और केंद्रीय मंत्री बनाये गये लेकिन दिल है कि मानता ही नहीं । मुख्यमंत्री से नीचे कुछ अच्छा नहीं लगा । फिर लोकसभा चुनाव में बेटे व पूर्व आईएएस अधिकारी बृजेंद्र सिंह को हिसार लोकसभा क्षेत्र से इस गुप्त शर्त पर टिकट दिलवा पाने में सफल रहे कि वे अब चुनाव नहीं लड़ेंगे । इस तरह बृजेंद्र सिंह का एक सांसद के रूप में राजनीति में पदार्पण हो गया । पत्नी उचाना से विधायक न बन पाईं । दुष्यंत चौटाला से हार गयीं और वे बन गये उपमुख्यमंत्री !

अब नया मोड़ यह आया कि मंडी आदमपुर से कांग्रेस विधायक व पूर्व मुख्यमंत्री चौ भजनलाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई ने कांग्रेस का हाथ झटक कर भाजपा का कमल थाम लिया । इसमें हिसार की लोकसभा सीट और मंडी आदमपुर की विधानसभा सीटें मांगी हैं । अगर यह सच है तो बृजेंद्र सिंह के लिए यह खतरे की घंटी है कि अगले लोकसभा चुनाव में कहां से टिकट मिलेगी ? इस नये घटनाक्रम के बीच मंडी आदमपुर का उपचुनाव भी आयेगा । राजनीतिक गलियारों में किसी ने कहा कि इस उपचुनाव में म्यान तो होगी भूपेंद्र सिंह हुड्डा की और,तलवार होगी चौ बीरेन्द्र सिंह की ! पता नहीं यह बात कितनी सच है या कितनी झूठ !

चौ बीरेन्द्र सिंह भाजपा से खफा हैं और अपने पुराने साथियों को राज्य भर में मिलने निकले हैं और वे अगले वर्ष यह घोषणा करेंगे कि उनका अगला कदम क्या होगा और उनका ठिकाना क्या होगा ? वे लगातार राज्य भर में अपने कार्यकर्त्ताओं से बैठकें , जलसे और जनसभाएं कर रहे हैं । वे चौंकाने के लिए कुछ भी कर डालते हैं । जैसे पिछले साल इनेलो के मंच पर देखे गये थे । वे राजनीति में कद्दावर हैं लेकिन लगता है कि किसान आंदोलन में कोई सही फैसला लेने से चूक गये । अब यह तो समय ही बतायेगा कि चौ साहब दरियां ही बिछाने आये है या फिर तख्त पर शोभायमान होंगे ? यह सब भविष्य के गर्भ में है । पर चौ साहब की सक्रियता कुलदीप बिश्नोई के लिए खतरे की घंटी मानी जा सकती है ।
-पूर्व उपाध्यक्ष, हरियाणा ग्रंथ अकादमी ।

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