प्रकृति को अपना बना लो फिर किसी से कुछ मांगने की ही आवश्यकता नहीं : कंवर साहेब
हौसले को कभी मत गिरने दो, हौसला है तो इंसान सब कुछ कर सकता है।
गुरु अनेक हो सकते लेकिन सतगुरु केवल एक : हजूर कंवर साहेब जी 
सात्विक भोजन खाने से विचार ऊंचे होते हैं : कंवर साहेब जी
गुरु वचन पूर्णत आत्मसात कर लेना गुरु भक्ति है : हुजूर कंवर साहेब जी

चरखी दादरी/हांसी जयवीर फोगाट

10 अप्रैल, इंसान किन चीजों में दीवाना हुआ फिरता है। सांसारिक चीजे सदा रहने वाली नहीं है। सदा रहने वाला कुछ है तो केवल सत्संग है क्योंकि सत्संग सत पुरुष का संग है और सत्पुरुष की बंदगी से बढ़ कर कुछ नहीं है। गुरु कंवर साहेब जी महाराज ने कहा कि सत्संग देखने सुनने का नहीं बल्कि करने का है। उन्होंने कहा कि मैं खुद भी सत्संग कराता नहीं करता हूं। उन्होंने कहा कि जीवन का अर्थ ये नहीं है कि हम इसकी वस्तुओ में गाफिल होकर मस्ती करे और एक दिन इस अनमोल जीवन को खो दें। जीवन का अर्थ है इसके सार तत्व को ग्रहण करना। जीवन के असल उद्देश्य को खोजना। जीवन का असल उद्देश्य है यौनियों के भटकाव से छुटकारा। ये छुटकारा पाया जा सकता है किसी पूर्ण संत की शरण लेकर जीव भेद को पा लेना। हुजूर ने फरमाया कि हम ये नहीं जानते कि कल क्या होने वाला है फिर भी हम सदियों तक की बात सोचते हैं। अरे जीना है तो आज में जीवो। चिंतन करो और मनन करो कि कैसे हम अपने जीवन को परमात्मा की भक्ति में लगा सकते हैं। उन्होंने कहा कि गंदगी को गंदगी से साफ नहीं किया जा सकता। झूठ को झूठ से नहीं काटा जा सकता। गंदगी को निर्मलता से हटाया जाएगा और झूठ को सच की ताकत से ही हराया जा सकता है। दुख आने से पहले ही यदि हम परमात्मा को याद कर ले तो दुख आएगा ही नहीं। गुरु जी ने फरमाया कि हौसला कभी मत गिरने दो क्योंकि यदि हौसला है तो इंसान वो सब कुछ कर सकता है जो पहले किसी इंसान ने किया है।

गुरु महाराज ने एक प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक राजा हाथी पर शिकार करने जाता था। हाथी राजा का बड़ा प्यारा था। जंगल में सुबह से शाम तक शिकार करते रहे। रात हुई तो शिविर में सब ठहर गए। सेवक हाथी को जल पिलाने सरोवर में ले गए लेकिन हाथी दलदल में फंस गया। बड़ा जोर लगाया लेकिन हाथी बाहर नहीं निकला। हाथी ने हौसला छोड़ दिया। जब राजा को पता चला तो राजा ने कहा कि हाथी के सामने ढोल नगाड़े बजा कर युद्ध जैसा नजारा बनाया जाए। जब ढोल नगाड़े बजने लगे तो हाथी ने युद्ध के जोश वाला जोर लगाया और दलदल से बाहर आ गया। यानी जब उसने खोए हुए हौसले को दुबारा समेटा तो उसका सारा दुख जाता रहा। हजूर ने कहा कि ये कर्म प्रधान संसार है लेकिन गीता का संदेश मत भूलो कि कर्म बिना फल की इच्छा के हो तो लाभदायक है। उन्होंने कहा कि भक्ति को सर्वोपरि मानो ना कि मुक्ति को। मुक्ति को चाह कर की गई भक्ति भी फल को इच्छित करके किया गया कर्म है को फलदाई नहीं होगा।

गुरु अनेक हो सकते लेकिन सतगुरु केवल एक :

हजूर कंवर साहेब जीगुरु महाराज जी ने कहा कि हमारे गुरु अनेक हो सकते हैं क्योंकि जिससे हमे कुछ ज्ञान मिले वही गुरु हो गया। दतात्र्य ऋषि ने 24 गुरु धारण किए। जिस भी वस्तु या इंसान से उसे कुछ ज्ञान हुआ उन सभी को उन्होंने गुरु मान लिया। सूर्य, चंद्रमा, भंवरा, नदी, चील सब को उन्होंने गुरु माना। इसी प्रकार हमारे भी अनेकों गुरु हो सकते हैं लेकिन सतगुरु केवल एक ही होता है। सतगुरु देह रूप में परमात्मा का ही रूप होते हैं जो इंसान को अपना ही भेद बताने इस धरा पर आते हैं। उन्होंने कहा कि इस प्रकृति का कण कण हमें सिखाता है। प्रकृति को अपना बना लो फिर कुछ मांगने की ही आवश्यकता नहीं है। आप अपना समर्पण पूर्ण कर लो सामने वाला स्वत आपका हो जाएगा। उन्होंने एकलव्य का जिक्र करते हुए कहा आप सिर्फ सत्य के साथ रहो यह कायनात आपकी मदद करने खुद आएगी। उन्होंने कहा कि हैरानी की बात है कि अवगुण हमें बरबादी की तरफ ले कर जाते हैं फिर भी हम उन्हें अपनाते हैं। संगति पर आपका वर्तमान और भविष्य दोनो जुड़े हैं इसलिए संतो की संगति करो। संतो की संगति ही सत्संग कहलाती है।

सात्विक भोजन खाने से विचार ऊंचे होते हैं :

कंवर साहेब जीगुरु जी ने कहा कि पहले देना सीखो आपको अपने आप मिलता जाएगा। हम जमीन में एक दाना डालते हैं लेकिन बदले में वो हमें हजारों दाने देती है। उन्होंने कहा कि अपने मन को उन्नत बनाओ। मन उन्नत होगा सतगुनी अन्न से।जो सात्विक भोजन खाता है उसके विचार ऊंचे होते हैं। महाराज जी ने कहा कि अभ्यासी का भोजन सात्विक ही होना चाहिए। पौष्टिक भोजन खाओ लेकिन सात्विक खाओ। गुरु जी ने कहा कि सबसे पहले अपनी काया को निरोगी रखो उसके बाद अपनी संगत को सुधारो क्योंकि जैसा आपको संग होगा वैसे ही आपके गुण होंगे। जैसे आग के पास बैठने से गर्माहट और पानी के पास जाने से शीतलता आती है वैसे ही सज्जन के संग से सद्गुण और दुर्जन के संग से अवगुण ही पनपेंगे। 

गुरु वचन पूर्णत आत्मसात कर लेना गुरु भक्ति है :

हुजूर कंवर साहेब जीगुरू महाराज जी ने कहा कि मनमुखता को मार कर गुरुमुख्ता को धारण करना चाहिए। असल शिष्य वही है जो गुरु की बात का दुख ना माने। गुरु का हर वचन कल्याणकारी होता है। गुरु हर पल अपने शिष्य की संभाल करता है। उन्होंने कहा कि यह सत्य है कि आज गुरु शिष्य का व्यवहार झूठ पर टिका हुआ है। लेकिन परमात्मा के दरबार में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है। परमात्मा के दरबार में झूठी गवाही नहीं चलती। गुरु को चाहिए कि शिष्य से कुछ ना ले और शिष्य को चाहिए कि गुरु को सर्वस्व दे। गुरु जी ने कहा कि हर पल सत्संग वचनों का चिंतन और मनन किया करो क्योंकि इससे मन भटकाव से हटकर दया धर्म परोपकार में लगता है। आपके मन वचन और कर्म की गति बहुत तेज है। मन से, वचन से और कर्म से किया गया व्यवहार आपका पीछा करता है। हुजूर ने कहा कि कभी भी सत्य के मार्ग पर चलने से मत घबराओ।

गुरु की शरण में जाकर उनके वचन को पूर्णत आत्मसात कर लेना गुरु भक्ति है। जो गुरु की भक्ति करता है उसका अध्यात्मिक जीवन के साथ साथ सामाजिक जीवन भी सुधरता है। उन्होंने कहा कि एक संकल्प धारो कि हम एक महीने में कम से कम एक अवगुण का त्याग करेंगे। अगर ऐसा कर लिया तो भी एक साल में हम अपने अंदर से 12 अवगुणों को निकाल कर अपने अंदर 12 सद्गुण भर लेंगे। उन्होंने कहा कि ये जीवन बहुत बहुमूल्य है इसे बर्बाद नही आबाद करो। जियो और जीने दो। अच्छे काम करो। मां बाप की सेवा और बड़े बुजुर्गो का सम्मान करो। घरों में सुख शांति पनपाने का काम करो।

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