भाजपा बनाम कांग्रेस : विचारधारा, मतभेद, बदजुबानी और टकराव

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विचारों की प्रतिस्पर्धा जब व्यक्तिगत अपमान में बदलती है, तो लोकतांत्रिक संवाद और सामाजिक एकता दोनों कमजोर होते हैं

डॉ. घनश्याम बादल

लोकतंत्र में विचारों का टकराव स्वाभाविक है, लेकिन जब विचारों की जगह विद्वेष, तर्क की जगह तंज और राजनीतिक विरोध की जगह व्यक्तिगत चरित्रहनन ले ले, तब समझ लेना चाहिए कि राजनीति अपनी मर्यादा खो रही है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच वैचारिक संघर्ष पुराना है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह संघर्ष जिस तरह कटुता, अमर्यादित भाषा और संस्थाओं के प्रति अविश्वास तक पहुंचा है, वह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।

सवाल यह नहीं कि कौन-सा दल सही है और कौन गलत; सवाल यह है कि सत्ता और विपक्ष की लड़ाई में कहीं देश की सामाजिक एकता तो दांव पर नहीं लग रही?

कांग्रेस और भाजपा दो अलग राजनीतिक धाराओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। कांग्रेस की वैचारिक परंपरा स्वतंत्रता आंदोलन, धर्मनिरपेक्षता, बहुलतावाद, सामाजिक न्याय और विविधता में एकता की अवधारणा से जुड़ी रही है। वहीं, भाजपा की राजनीति सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, राष्ट्रीय अस्मिता, मजबूत नेतृत्व और एकात्म मानववाद की वैचारिक धारा से प्रेरणा लेती है। कांग्रेस जहां संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक विविधता पर जोर देती है, वहीं भाजपा भारतीय संस्कृति और सभ्यतागत पहचान को राष्ट्रीय जीवन के केंद्र में रखने की पक्षधर है।

इन दोनों विचारधाराओं के बीच मतभेद होना अस्वाभाविक नहीं है। लोकतंत्र में यही मतभेद विकल्प पैदा करते हैं। समस्या तब शुरू होती है, जब कोई दल अपनी विचारधारा को ही राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र बताने लगे और विरोधी विचारधारा को देश-विरोध का पर्याय बना दे। राष्ट्र कोई एक दल, विचार या नेता नहीं है। कांग्रेस के समर्थक भी उतने ही भारतीय हैं, जितने भाजपा के समर्थक। किसी दल का विरोध करना अपने आप में राष्ट्र का विरोध करना नहीं है।

विडंबना यह है कि दोनों दल लोकतंत्र, संविधान और देशहित की दुहाई देते हैं, लेकिन उनके नेताओं की भाषा बार-बार इन्हीं मूल्यों पर चोट करती दिखाई देती है। कोई नेता विरोधी को अज्ञानी, भ्रष्ट या देश का दुश्मन बताता है, तो कोई प्रतिद्वंद्वी के लिए ऐसे विशेषण चुनता है, जिनका उद्देश्य तर्क प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि अपमानित करना होता है। राजनीतिक मंचों से निकलने वाले ऐसे शब्द सामाजिक माध्यमों पर पहुंचकर और जहरीले हो जाते हैं। फिर समर्थक अपने नेताओं की भाषा को ही राजनीतिक संस्कार समझने लगते हैं।

राजनीति में व्यंग्य और आलोचना का अपना महत्त्व है। सत्ता से सवाल पूछना विपक्ष का धर्म है और विपक्ष की आलोचना का उत्तर देना सरकार की जिम्मेदारी। किंतु आलोचना और अपमान के बीच एक महीन रेखा है। उस रेखा को लांघते ही बहस का स्तर गिरता है और लोकतांत्रिक संवाद की जगह शत्रुता लेने लगती है। नेता भूल जाते हैं कि उनके शब्द केवल विरोधी दल तक सीमित नहीं रहते; वे समाज के व्यवहार, युवाओं की भाषा और आम नागरिकों की सोच को भी प्रभावित करते हैं।

इसी कटु राजनीतिक वातावरण में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण जैसे मुद्दे भी टकराव का कारण बन रहे हैं। मतदाता सूची की शुद्धता चुनावी लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है। फर्जी, दोहराव वाले या अपात्र नामों को हटाना और पात्र मतदाताओं के नाम शामिल करना निर्वाचन प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है। दूसरी ओर, यदि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक का नाम छूटने, दस्तावेज जुटाने में कठिनाई आने या वास्तविक मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने की आशंका पैदा होती है, तो उस पर सवाल उठाना भी उतना ही आवश्यक है।

इसलिए विशेष गहन पुनरीक्षण को केवल सरकार या निर्वाचन व्यवस्था के समर्थन-विरोध का प्रश्न बनाना उचित नहीं है। प्रक्रिया पारदर्शी हो, पात्र मतदाताओं को पर्याप्त अवसर मिले, आपत्तियों का निष्पक्ष निस्तारण हो और गलतियों को सुधारने की प्रभावी व्यवस्था हो—ये सभी पक्ष लोकतंत्र के हित में हैं। विपक्ष को बिना प्रमाण हर कार्रवाई को साजिश नहीं बताना चाहिए, तो निर्वाचन व्यवस्था को भी आलोचनाओं का उत्तर तथ्यों और पारदर्शिता से देना चाहिए। मताधिकार की सुरक्षा को लेकर अविश्वास की स्थिति लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर सकती है।

मतदाता सूची पुनरीक्षण के अतिरिक्त चुनावी निष्पक्षता, संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका, आरक्षण, जातिगत गणना, धार्मिक पहचान, नागरिकता और केंद्र-राज्य संबंधों जैसे मुद्दों पर भी राजनीतिक खींचतान तीखी हुई है। इनमें से कई विषय वास्तविक नीतिगत बहस की मांग करते हैं। लेकिन जब हर निर्णय को राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई और हर असहमति को षड्यंत्र के चश्मे से देखा जाता है, तब समाधान पीछे छूट जाता है। देश समस्याओं पर चर्चा करने के बजाय आरोपों की अंतहीन प्रतियोगिता में उलझ जाता है।

इसका सबसे घातक परिणाम समाज का ध्रुवीकरण हो सकता है। राजनीतिक विरोध धीरे-धीरे सामाजिक और पारिवारिक संबंधों तक पहुंच जाता है। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर अविश्वास बढ़ता है। सामाजिक माध्यमों पर अफवाहें और भ्रामक सूचनाएं आग में घी डालती हैं। कार्यकर्ता अपने नेताओं का अनुसरण करते हुए मर्यादा तोड़ते हैं और आम नागरिक एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी नहीं, शत्रु समझने लगते हैं। ऐसी स्थिति में सामाजिक सद्भाव कमजोर होता है, विकास के मुद्दे गौण हो जाते हैं और राष्ट्रीय चुनौतियों से निपटने की सामूहिक क्षमता घटती है।

राजनीतिक दलों और नेताओं को समझना होगा कि चुनाव जीतना लोकतंत्र का अंतिम उद्देश्य नहीं, बल्कि जनसेवा की जिम्मेदारी प्राप्त करने का माध्यम है। सत्ता पक्ष को आलोचना सहने, असहमति का सम्मान करने और संस्थाओं की निष्पक्षता के प्रति विश्वास बनाए रखने का साहस दिखाना चाहिए। विपक्ष को भी तथ्य, प्रमाण और रचनात्मक विकल्पों के साथ सरकार को घेरना चाहिए। आरोप लगाना आसान है; आरोप सिद्ध करना और समाधान प्रस्तुत करना कठिन, किंतु अधिक जिम्मेदारी का काम है।

कार्यकर्ताओं की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। उन्हें अपने नेताओं के हर बयान का अंधानुकरण करने के बजाय विवेक से काम लेना चाहिए। सामाजिक माध्यमों पर अपुष्ट सामग्री साझा करने, विरोधियों को अपमानित करने और समुदायों के विरुद्ध नफरत फैलाने से बचना चाहिए। राजनीतिक निष्ठा नागरिक कर्तव्य से ऊपर नहीं हो सकती। दलों को अपने मंचों से स्पष्ट संदेश देना होगा कि असहमति स्वीकार्य है, लेकिन धमकी, हिंसा और सामाजिक विद्वेष नहीं।

अंततः कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों को याद रखना चाहिए कि विचारधाराएं लोकतंत्र को दिशा देती हैं, जबकि अहंकार और बदजुबानी उसे कमजोर करते हैं। भारत की शक्ति उसकी विविधता, सहिष्णुता और संवाद की परंपरा में है। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को शत्रु मानने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना समय की मांग है। देश की एकता और अखंडता केवल नारों से सुरक्षित नहीं रहतीं; इनके प्रति प्रतिबद्धता व्यवहार, भाषा और निर्णयों में भी दिखाई देनी चाहिए।

अस्तु, लोकतंत्र में लड़ाई विचारों की होनी चाहिए, व्यक्तियों के अपमान की नहीं; नीतियों की होनी चाहिए, नागरिकों को बांटकर मत बटोरने की नहीं। सत्ता बदल सकती है, सरकारें आ-जा सकती हैं और विचारधाराओं के बीच संघर्ष चलता रह सकता है। लेकिन यदि इस संघर्ष में समाज का विश्वास, राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक मर्यादा टूट गई, तो जीत भले ही किसी दल की हो जाए, हार पूरे देश की होगी।

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Author: Bharat Sarathi

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