व्रत-त्योहार : धर्म, निष्ठा और समर्पण का संगम : करवा चौथ

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

निर्जल उपवास, चंद्रदर्शन और उपहारों से आगे, परस्पर सम्मान और साथ निभाने का संदेश देता है यह पर्व

डॉ. घनश्याम बादल

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला करवा चौथ केवल एक व्रत नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, समर्पण और जीवनभर साथ निभाने की कामना का पर्व है। इस दिन विवाहित महिलाएं पति की दीर्घायु और सुखी जीवन की कामना करते हुए दिनभर निर्जल व्रत रखती हैं। शाम ढलते ही चांद की प्रतीक्षा शुरू होती है। पूजा की थाली, छलनी, दीपक और चंद्रदर्शन के बाद पति का चेहरा देखकर व्रत खोलने की परंपरा दांपत्य प्रेम का विशिष्ट दृश्य रचती है। लेकिन सवाल है कि क्या करवा चौथ का अर्थ केवल भूखे-प्यासे रहकर पति की लंबी आयु की कामना करना है या इसके आगे भी कोई व्यापक संदेश है?

पौराणिक कथाओं में निष्ठा और संकल्प

करवा चौथ से जुड़ी सबसे प्रचलित कथा वीरवती की है। सात भाइयों की लाड़ली बहन वीरवती ने करवा चौथ का व्रत रखा, लेकिन भूख-प्यास से व्याकुल हो गई। भाइयों ने पेड़ के पीछे दीपक जलाकर उसे चंद्रमा निकलने का भ्रम दिया और उसने व्रत खोल लिया। इसके बाद उसके पति के जीवन पर संकट आ गया। कथा के अनुसार, वीरवती ने पश्चात्ताप और तपस्या से अपने पति के प्राण वापस प्राप्त किए। लोक-आस्था में प्रचलित इस कथा का संदेश व्रत के प्रति निष्ठा और संकल्प से जुड़ा है।

दूसरी कथा करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री की है। उसने अपने पति को मगरमच्छ से बचाने के लिए अद्भुत साहस दिखाया और अपने दृढ़ संकल्प से यमराज तक को चुनौती दी। कथा का मूल भाव है कि प्रेम केवल भावना नहीं, संकट के समय अपने साथी के साथ खड़े रहने का साहस भी है। महाभारत से जोड़कर सुनाई जाने वाली एक अन्य लोककथा में द्रौपदी द्वारा श्रीकृष्ण की सलाह पर अर्जुन के कल्याण के लिए व्रत रखने का वर्णन मिलता है। इन कथाओं का महत्त्व उस भाव में भी निहित है, जो पीढ़ियों से इनके माध्यम से संप्रेषित होता आया है।

धार्मिक दृष्टि से करवा चौथ पर भगवान गणेश, माता पार्वती, भगवान शिव और चंद्रदेव की पूजा का विशेष महत्त्व है। माता पार्वती को अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। शिव-पार्वती का संबंध प्रेम, विश्वास और परस्पर सम्मान की प्रेरणा देता है। गणेश पूजा विघ्नों के निवारण की कामना से जुड़ी है, जबकि चंद्रमा को शीतलता, मन और भावनात्मक संतुलन का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार यह पर्व पति की दीर्घायु के साथ परिवार के सुख और संबंधों की स्थिरता की कामना का अवसर भी है।

चंद्रदर्शन का धार्मिक और आध्यात्मिक भाव

चांद को देखकर ही व्रत क्यों खोला जाता है? इसका उत्तर धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक प्रतीकों में निहित है। हिंदू परंपरा में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है। उसकी शीतलता और कलाएं जीवन में संतुलन तथा परिवर्तनशीलता का बोध कराती हैं। चंद्रमा का उदय दिनभर के उपवास के समापन का संकेत बनता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पति का चेहरा देखना प्रेम, विश्वास और मिलन का प्रतीक है। छलनी के पार दिखता जीवनसाथी मानो यह संदेश देता है कि प्रेम किसी को देखने के साथ उसे समझने और स्वीकार करने की दृष्टि में भी बसता है।

आध्यात्मिक अर्थ में चंद्रमा की प्रतीक्षा धैर्य और संयम का अभ्यास भी मानी जा सकती है। चंद्रदर्शन और अर्घ्य देने की परंपरा में श्रद्धा, मंगलकामना और आत्मीयता का भाव समाहित है। यही भाव इस पर्व को दांपत्य जीवन से गहराई से जोड़ता है।

दिखावे से बड़ी है रिश्ते की आत्मीयता

समय के साथ करवा चौथ का स्वरूप बदला है। बाजार और प्रदर्शन की संस्कृति ने भी इसमें जगह बना ली है। महंगे परिधान, आभूषण, उपहार और तस्वीरों की प्रतिस्पर्धा कई बार पर्व के मूल भाव पर भारी पड़ जाती है। बाजार ने प्रेम को भी आकर्षक आवरण में लपेटकर बेचने की कला सीख ली है। महंगा उपहार अधिक प्रेम का प्रमाण और साधारण उपहार कम प्रेम का संकेत नहीं हो सकता। दांपत्य की असली समृद्धि आभूषणों या धन-संपत्ति में नहीं, कठिन समय में निभाए गए साथ में दिखाई देती है।

आज करवा चौथ के मूल संदेश को जीवन में उतारने की जरूरत है। यदि पत्नी पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती है, तो पति भी पत्नी के स्वास्थ्य, सम्मान और सुख के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे। अनेक दंपती साथ में पूजा करते हैं, जबकि कुछ पति भी पत्नी के साथ व्रत रखते हैं। विवाह किसी एक व्यक्ति का दूसरे के लिए आजीवन त्यागपत्र नहीं, दो व्यक्तियों की साझा जिम्मेदारी है।

दांपत्य में प्रेम का अर्थ केवल उपहार देना या सार्वजनिक रूप से तस्वीरें साझा करना नहीं है। एक-दूसरे की बात सुनना, असहमति में भी सम्मान बनाए रखना, घर और बच्चों की जिम्मेदारियां बांटना, आर्थिक निर्णयों में साझेदारी करना और कठिन परिस्थितियों में सहारा बनना प्रेम की वास्तविक परीक्षा है। पति पत्नी की आकांक्षाओं का सम्मान करे और पत्नी भी पति की भावनाओं तथा जिम्मेदारियों को समझे। बराबरी रिश्ते की आत्मीयता घटाती नहीं, बल्कि उसे अधिक परिपक्व बनाती है।

श्रद्धा के साथ विवेक भी जरूरी

व्रत में विवेक भी जरूरी है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने या नियमित दवाएं लेने की स्थिति में उपवास का निर्णय चिकित्सकीय सलाह के अनुसार करना चाहिए। धर्म का उद्देश्य जीवन में मंगल की कामना है, स्वास्थ्य को अनावश्यक जोखिम में डालना नहीं। व्रत की भावना प्रार्थना, संयम, सद्भाव और आत्मीयता से भी व्यक्त की जा सकती है।

करवा चौथ अपने रिश्ते को समझने और संवारने का अवसर भी है। इस दिन पति पत्नी से पूछ सकता है कि क्या वह खुश है, क्या उसकी कोई अधूरी इच्छा है और क्या उसे पर्याप्त सम्मान तथा सहयोग मिलता है। पत्नी भी पति की चिंताओं और अपेक्षाओं को समझ सकती है। पूजा के बाद कुछ समय साथ बैठकर मन की बात करना किसी महंगे उपहार से अधिक मूल्यवान हो सकता है।

करवा चौथ का चांद आसमान में उगता है, लेकिन उसकी असली रोशनी घर के भीतर उतरनी चाहिए। यदि पत्नी पति की दीर्घायु की कामना करती है और पति उसके सम्मान का ध्यान नहीं रखता, तो व्रत का आध्यात्मिक अर्थ अधूरा रह जाता है। यदि दोनों एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी हैं, तो बिना दिखावे के मनाया गया करवा चौथ भी सार्थक है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

और पढ़ें