‘थारा फूफा जिंदा है’ कहकर सिस्टम को जगाने वाले दुलीचंद का निधन, 106 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस

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*पेंशन काटे जाने पर 102 साल की उम्र में दूल्हा बनकर निकाली थी बारात,*

*नवीन जयहिंद के नेतृत्व में हुआ था अनोखा प्रदर्शन*

रोहतक, 25 अक्टूबर 2026 – हरियाणा के रोहतक जिले के गांधरा गांव निवासी बुजुर्ग दुलीचंद का 106 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। शनिवार शाम उन्होंने अपने घर पर अंतिम सांस ली। रविवार को गांव गांधरा में उनका अंतिम संस्कार किया गया, जहां उनके बड़े बेटे ने उन्हें मुखाग्नि दी। दुलीचंद अपने पीछे 10 बच्चों और लगभग 70 सदस्यों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं।

दुलीचंद वही बुजुर्ग थे, जिन्होंने अपनी पेंशन काटे जाने के खिलाफ ‘थारा फूफा जिंदा है’ कहकर पूरे हरियाणा में सरकारी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए थे। उनका यह नारा न केवल लोगों की जुबान पर चढ़ा, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड में जीवित व्यक्ति को मृत घोषित किए जाने जैसी गंभीर समस्या का प्रतीक भी बन गया।

*102 साल की उम्र में दूल्हा बनकर निकाली थी बारात*

करीब चार साल पहले मार्च 2022 में दुलीचंद की बुढ़ापा पेंशन बंद कर दी गई थी। अधिकारियों ने रिकॉर्ड में उन्हें मृत घोषित कर दिया था, जबकि वह पूरी तरह जीवित थे। परिवार के अनुसार, उनकी आखिरी पेंशन 2 मार्च 2022 को आई थी। इसके बाद पेंशन बंद होने पर उन्होंने अधिकारियों के कार्यालयों के कई चक्कर लगाए, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ।

आखिरकार दुलीचंद सामाजिक कार्यकर्ता नवीन जयहिंद के संपर्क में आए। इसके बाद नवीन जयहिंद ने सरकारी व्यवस्था के खिलाफ अनोखे तरीके से विरोध दर्ज कराने का फैसला किया।

दुलीचंद को दूल्हे की तरह सजाकर रथ पर बैठाया गया और रोहतक की सड़कों से होते हुए जिला उपायुक्त कार्यालय तक बारात निकाली गई।

इस अनोखे प्रदर्शन में कई ऐसे बुजुर्ग भी शामिल हुए, जिनकी पेंशन उन्हें जीवित होने के बावजूद मृत घोषित किए जाने या अन्य कारणों से बंद कर दी गई थी। दुलीचंद के हाथों में ‘मैं जिंदा हूं’ और ‘थारा फूफा जिंदा है’ लिखी तख्तियां थीं। फरसा, लाठी और सनग्लासेज के साथ दूल्हे के रूप में निकले दुलीचंद की तस्वीरें और उनका नारा पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गए।

*आंदोलन के बाद दोबारा शुरू हुई पेंशन*

दुलीचंद के मामले ने सरकारी रिकॉर्ड में गड़बड़ियों और पेंशन से वंचित बुजुर्गों की परेशानी को प्रमुखता से सामने रखा। विरोध प्रदर्शन के बाद अधिकारियों को मामले पर कार्रवाई करनी पड़ी। कैंप लगाकर दुलीचंद सहित अन्य प्रभावित बुजुर्गों, विधवा महिलाओं और दिव्यांगजनों की पेंशन संबंधी समस्याओं का समाधान किया गया। इसके बाद दुलीचंद और अन्य पात्र लाभार्थियों की पेंशन दोबारा शुरू हुई।

दुलीचंद का यह संघर्ष उन लोगों के लिए आवाज बना, जिन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने के बजाय दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। उनका नारा आज भी सरकारी व्यवस्था की लापरवाही के खिलाफ एक यादगार उदाहरण के रूप में जाना जाएगा।

*दुलीचंद के चर्चित नारे से प्रेरित होकर बनी फिल्म*

दुलीचंद के अनोखे आंदोलन और उनके चर्चित नारे से प्रेरित होकर निर्देशक संजय भसीन ने एक हरियाणवी फिल्म बनाई थी। हालांकि, इस फिल्म को लेकर विवाद भी खड़ा हो गया। दुलीचंद ने आरोप लगाया था कि उनकी अनुमति के बिना उनके वास्तविक जीवन और आंदोलन से जुड़ी सामग्री का इस्तेमाल किया गया। इस मामले में उन्होंने अदालत का रुख किया था।

इस विवाद में नवीन जयहिंद ने भी फिल्म निर्माताओं पर दुलीचंद के जीवन और आंदोलन से जुड़ी सामग्री का इस्तेमाल करने के आरोप लगाए थे। मामले में निर्देशक सहित 12 लोगों के खिलाफ आरोप लगाए जाने की बात सामने आई थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मामला अदालत में विचाराधीन है। इस संबंध में अंतिम न्यायिक निर्णय को लेकर कोई दावा नहीं किया जा रहा है।

*दुलीचंद का लगभग 70 सदस्यों का परिवार*

दुलीचंद के परिवार में छह बेटे और चार बेटियां हैं। सभी विवाहित हैं। उनके परिवार में लगभग 40 पौत्र-पौत्रियां और दोहते-दोहतियां तथा करीब 20 पड़पौत्र-पड़पौत्रियां बताए जाते हैं। इस तरह उनका परिवार लगभग 70 सदस्यों का है।

दस्तावेजों के अनुसार उनकी उम्र 106 वर्ष थी, जबकि ग्रामीणों का कहना था कि उनकी वास्तविक उम्र करीब 108 वर्ष थी। ग्रामीणों के मुताबिक, वह किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित नहीं थे।

दुलीचंद का निधन केवल एक बुजुर्ग का जाना नहीं, बल्कि उस संघर्षशील आवाज का खामोश हो जाना है, जिसने अपने अनोखे अंदाज में व्यवस्था की खामियों को उजागर किया। ‘थारा फूफा जिंदा है’ का नारा दुलीचंद को हमेशा याद दिलाता रहेगा कि एक आम नागरिक की आवाज भी व्यवस्था को जवाब देने के लिए मजबूर कर सकती है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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