शरद पूर्णिमा पर चंद्र उपासना और लक्ष्मी आराधना का विशेष महत्त्व : डॉ. सुरेश मिश्रा

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श्रद्धा, स्वच्छता और सद्भाव के साथ पर्व मनाने का आह्वान

कुरुक्षेत्र, 24 अक्टूबर (प्रमोद कौशिक)। ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु आचार्य तथा श्री दुर्गा देवी मंदिर पिपली के पीठाधीश डॉ. सुरेश मिश्रा ने कहा कि सनातन धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व चंद्र उपासना, मां लक्ष्मी की आराधना, भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और दान-पुण्य की परंपराओं से जुड़ा है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष शरद पूर्णिमा रविवार, 25 अक्टूबर को मनाई जाएगी।

डॉ. मिश्रा ने बताया कि शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस रात्रि चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। ब्रज की परंपरा में यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के महारास से जुड़ा है। वहीं, कोजागरी परंपरा में मां लक्ष्मी की पूजा, रात्रि जागरण और सुख-समृद्धि की कामना का विशेष स्थान है।

चांदनी में खीर रखने की परंपरा

डॉ. मिश्रा ने कहा कि शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा की शीतल चांदनी में खीर रखने और अगले दिन उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। धार्मिक आस्था में चंद्रमा की किरणों को अमृततुल्य माना गया है। इस अवसर पर श्रद्धालु चंद्र दर्शन, मंत्र-जप, ध्यान, भजन-कीर्तन तथा भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं। उन्होंने कहा कि प्रसाद रखते समय स्वच्छता का ध्यान रखें और उसे ढककर सुरक्षित स्थान पर रखें।

आत्मचिंतन और दान का संदेश

उन्होंने कहा कि शरद पूर्णिमा जीवन में शांति, संयम, कृतज्ञता और सद्भाव अपनाने का अवसर भी है। इस दिन जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र अथवा सामर्थ्य के अनुसार दान देना, परिवार के साथ पूजा करना और समाज में प्रेम एवं सहयोग की भावना बढ़ाना पर्व की सार्थकता को बढ़ाता है।

डॉ. मिश्रा ने श्रद्धालुओं से अपील की कि वे शरद पूर्णिमा श्रद्धा, स्वच्छता और सामाजिक सद्भाव के साथ मनाएं। धार्मिक परंपराओं का पालन करते हुए विवेकपूर्ण आचरण अपनाएं तथा परिवार और समाज के कल्याण की कामना करें।

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Author: Bharat Sarathi

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