24 अक्टूबर : संयुक्त राष्ट्र स्थापना दिवस विशेष : संयुक्त राष्ट्र : एक लाचार चौकीदार की नियति

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महाशक्तियों के हितों और वीटो की राजनीति के बीच विश्व शांति की चुनौती

डॉ. घनश्याम बादल

जब दुनिया के किसी कोने में युद्ध छिड़ता है, निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं, अस्पताल मलबे में बदलते हैं और बच्चे भूख से बिलखते हैं, तब पीड़ितों की निगाहें संयुक्त राष्ट्र की ओर उठती हैं। वहां से चिंता जताई जाती है, युद्धविराम की अपील होती है और मानवीय संकट पर दुख व्यक्त किया जाता है। लेकिन जब इन अपीलों के बावजूद हिंसा नहीं रुकती, तब यह विश्व संस्था एक ऐसे लाचार चौकीदार जैसी दिखाई देती है, जो खतरे की घंटी तो बजा सकता है, मगर हमलावरों को रोकने की क्षमता उसके हाथ में नहीं है।

सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि दुनिया की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्था युद्ध रोकने में निर्णायक भूमिका नहीं निभा सकती, तो उसकी प्रासंगिकता क्या है? क्या वह शांति की प्रहरी है या महाशक्तियों की मनमानी की मूक दर्शक बनती जा रही है? स्थापना दिवस केवल उसकी उपलब्धियां गिनाने का अवसर नहीं, उसकी सीमाओं और उन्हें बनाए रखने वाली राजनीति पर विचार करने का भी समय है।

उम्मीदों से हुई थी शुरुआत

दो विश्वयुद्धों की तबाही ने दुनिया को समझाया था कि राष्ट्रों के अहंकार की सबसे बड़ी कीमत आम नागरिक चुकाते हैं। राष्ट्रसंघ की विफलता और द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका के बाद 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र अस्तित्व में आया। अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखना, विवादों का शांतिपूर्ण समाधान करना, मानवाधिकारों की रक्षा और राष्ट्रों के बीच सहयोग बढ़ाना इसके प्रमुख उद्देश्य थे।

स्थापना के 81 वर्ष पूरे होने पर यह प्रश्न और गंभीर हो जाता है कि इन उद्देश्यों को व्यवहार में उतारने में विश्व समुदाय कितना सफल हुआ है। संयुक्त राष्ट्र ने संवाद, राहत और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए मंच अवश्य दिया, लेकिन युद्ध, विस्थापन और मानवीय त्रासदियों की पुनरावृत्ति उसकी प्रभावशीलता को लगातार चुनौती देती रही है।

वीटो के सामने बहुमत बेबस

संयुक्त राष्ट्र की संरचना में सबसे प्रभावशाली अंग सुरक्षा परिषद है। इसके पांच स्थायी सदस्य—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस—वीटो का अधिकार रखते हैं। दस अन्य सदस्य दो वर्ष के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं। सुरक्षा परिषद में प्रक्रियात्मक मामलों से अलग महत्वपूर्ण प्रस्तावों को पारित करने के लिए कम से कम नौ सदस्यों का समर्थन और किसी स्थायी सदस्य का वीटो न होना आवश्यक है। किसी स्थायी सदस्य का मतदान से अलग रहना अपने आप में वीटो नहीं होता। यह अधिकार महासभा में लागू नहीं होता।

यही व्यवस्था कई बार अंतरराष्ट्रीय बहुमत को महाशक्तियों के हितों के सामने असहाय बना देती है। जिस देश या उसके सहयोगी के आचरण पर सवाल उठता है, वही अपने विशेषाधिकार के सहारे कार्रवाई का रास्ता रोक सकता है। ऐसे में वैश्विक न्याय और शक्ति-संतुलन के बीच टकराव पैदा होता है।

वर्ष 1945 की शक्ति-संरचना आज की दुनिया का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करती। भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील जैसे देशों की स्थायी सदस्यता की आकांक्षा तथा अफ्रीका के समुचित प्रतिनिधित्व का प्रश्न इसी असंतुलन की ओर संकेत करते हैं। सुरक्षा परिषद में सुधार केवल कुछ देशों की प्रतिष्ठा का विषय नहीं, संस्था की विश्वसनीयता से जुड़ी आवश्यकता है।

युद्धों ने उजागर की सीमाएं

पश्चिम एशिया के संघर्षों, गाजा की तबाही और इजराइल-फिलिस्तीन विवाद ने यह सवाल बार-बार उठाया है कि नागरिकों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कितनी प्रभावी है। जब प्रभावशाली देश अपने सहयोगियों के प्रति अलग और विरोधियों के प्रति अलग मानदंड अपनाते हैं, तब निष्पक्षता पर विश्वास कमजोर पड़ता है।

यूक्रेन का उदाहरण भी इसी संकट को सामने लाता है। रूस ने 24 फरवरी 2022 को यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने का आक्रमण शुरू किया था। अक्टूबर 2026 में इस आक्रमण को चार वर्ष आठ महीने हो रहे हैं। इस युद्ध ने सुरक्षा परिषद की उस संरचनात्मक कठिनाई को उजागर किया है, जिसमें संघर्ष का एक प्रमुख पक्ष स्वयं स्थायी सदस्य और वीटो शक्ति संपन्न देश है।

हालांकि, हर अनसुलझे अंतरराष्ट्रीय विवाद को केवल वीटो का परिणाम मानना भी सही नहीं होगा। संबंधित देशों की सहमति, संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का अधिकार-क्षेत्र और राजनीतिक इच्छाशक्ति भी महत्वपूर्ण होते हैं। फिर भी महाशक्तियों के हित जब सामूहिक सुरक्षा पर हावी हो जाते हैं, तब संयुक्त राष्ट्र की सीमाएं अधिक स्पष्ट दिखाई देती हैं।

राहत जरूरी, समाधान भी

संयुक्त राष्ट्र और उसकी एजेंसियों के मानवीय कार्यों को उसकी राजनीतिक असफलताओं के कारण खारिज नहीं किया जा सकता। संकटग्रस्त लोगों तक भोजन, स्वास्थ्य सहायता और आश्रय पहुंचाना, शरणार्थियों की मदद करना तथा नागरिकों की पीड़ा दुनिया के सामने लाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन प्रयासों से बची प्रत्येक जिंदगी संस्था की उपयोगिता का प्रमाण है।

लेकिन राहत पहुंचाना और संकट समाप्त कराना दो अलग चुनौतियां हैं। सहायता की आवश्यकता और उसे जरूरतमंदों तक पहुंचाने की क्षमता के बीच खाई बनी रहे, तो मानवीय प्रयास भी अपर्याप्त साबित होते हैं। संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी कठिनाई यही है कि संकट की पहचान और समाधान लागू कराने की शक्ति अक्सर अलग-अलग हाथों में होती है।

इजराइली नागरिकों पर हमले और उन्हें बंधक बनाना अस्वीकार्य है। इसी तरह फिलिस्तीनी नागरिकों को सामूहिक दंड देना, अंधाधुंध हमलों का शिकार बनाना या जबरन विस्थापित करना भी स्वीकार्य नहीं हो सकता। नागरिकों की सुरक्षा का सिद्धांत उनकी राष्ट्रीयता या उनके शासकों की नीतियों के अनुसार नहीं बदलना चाहिए।

स्थायी शांति के लिए फिलिस्तीनियों के आत्मनिर्णय के अधिकार और इजराइल की सुरक्षा, दोनों को महत्व देना होगा। दो-राष्ट्र समाधान की दिशा में ठोस राजनीतिक प्रयास, मानवीय सहायता की निर्बाध पहुंच और उल्लंघनों की निष्पक्ष जांच इस प्रक्रिया के आवश्यक आधार होने चाहिए।

सुधार से ही बढ़ेगा भरोसा

संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी बनाने के लिए सुरक्षा परिषद में प्रतिनिधित्व बढ़ाना, वीटो के इस्तेमाल पर जवाबदेही मजबूत करना और निर्णयों के पालन की निगरानी सुधारना आवश्यक है। नरसंहार और बड़े पैमाने पर नागरिक अत्याचारों जैसी परिस्थितियों में वीटो के उपयोग पर संयम की प्रभावी व्यवस्था बननी चाहिए।

जब सुरक्षा परिषद राजनीतिक गतिरोध में फंस जाए, तब महासभा और सदस्य देशों को सामूहिक कूटनीतिक दबाव बढ़ाना चाहिए। हालांकि, महासभा की सिफारिशों को सुरक्षा परिषद के बाध्यकारी निर्णयों के बराबर मान लेना समाधान नहीं है। आवश्यकता ऐसे व्यापक राजनीतिक समर्थन की है, जो युद्धरत पक्षों के लिए शांति की अनदेखी कठिन बना सके।

भारत जैसे देशों की भूमिका भी सुधार की मांग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। शांति प्रयासों, मानवीय सहायता और संवाद के माध्यम से अधिक न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के निर्माण में योगदान देना उतना ही आवश्यक है।

जिम्मेदारी सदस्य देशों की भी

संयुक्त राष्ट्र कोई विश्व सरकार नहीं है। उसकी क्षमता सदस्य देशों के सहयोग, संसाधनों और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है। इसलिए उसके कमजोर प्रदर्शन की जिम्मेदारी केवल संस्था या महासचिव पर डालना अधूरा आकलन होगा। वे राष्ट्र भी जवाबदेह हैं, जो अपने राष्ट्रीय हितों को वैश्विक शांति से ऊपर रखते हैं।

इस संस्था की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि शांति की जिम्मेदारी उसे उन्हीं राष्ट्रों ने सौंपी है, जो अपने हितों के लिए शांति को दांव पर लगाने से नहीं हिचकते। उससे निर्णायक हस्तक्षेप की अपेक्षा की जाती है, लेकिन आवश्यक समर्थन देने के समय वही शक्तियां पीछे हट जाती हैं।

स्थापना दिवस पर आवश्यकता संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रतिनिधिक, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने का संकल्प लेने की है। उसकी सफलता का पैमाना पारित प्रस्तावों की संख्या नहीं, बल्कि बचाई गई जिंदगियां, रोके गए युद्ध और सुरक्षित बचपन होना चाहिए। अन्यथा वह शांति का प्रहरी कम और दुनिया की त्रासदियों का मूक अभिलेखागार अधिक बनकर रह जाएगा।

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Author: Bharat Sarathi

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