दावे कितने भी सनसनीखेज हों, प्रमाण का विकल्प नहीं बन सकते
डॉ. मत्स्येन्द्र प्रभाकर

लोकतंत्र में सवाल उठाना जितना जरूरी है, उन सवालों और आरोपों को तथ्यों की कसौटी पर परखना भी उतना ही आवश्यक है। सोशल मीडिया पर प्रसारित ‘ऑपरेशन 37’ की कहानी इसी कसौटी पर जाँची जानी चाहिए। इसमें अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सीआईए, तथाकथित ‘डीप स्टेट’ और भारतीय राजनीतिक शक्तियों के बीच ऐसी कथित साजिश का दावा किया जाता है, जिसका उद्देश्य प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सत्ता से हटाना बताया गया है। लेकिन उपलब्ध स्रोतों की जाँच में इस कथित समन्वित अभियान की स्वतंत्र पुष्टि करने वाला ठोस सार्वजनिक प्रमाण नहीं मिला।
इसका अर्थ किसी सम्भावित विदेशी हस्तक्षेप को असम्भव मान लेना नहीं है। इसका सीधा अर्थ है कि आरोप लगाने वाले से प्रमाण माँगा जाए। राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गम्भीर विषय पर अनुमान, आशंका और प्रमाण के बीच का अन्तर मिटाना सार्वजनिक विमर्श को भ्रमित करता है।
दावे की कहानी
‘ऑपरेशन 37’ से जुड़े विवरणों में बारह महीने की समयसीमा, भाजपा के 37 सांसदों को अलग करने और सामाजिक तनाव का इस्तेमाल करने जैसे आरोप मिलते हैं। इस चर्चा से भाजपा से जुड़े नेता तथा ‘गोवा क्रॉनिकल’ के संस्थापक सेवियो रॉड्रिग्स का नाम प्रमुखता से जुड़ा है। सितम्बर 2025 की रिपोर्टिंग में भी उनके इन दावों का उल्लेख मिलता है। इसलिए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह कथा पहले से प्रसारित होती रही है। किसी पुराने दावे का दोबारा वायरल होना उसकी नई पुष्टि नहीं है।
स्वयं रॉड्रिग्स ने जनवरी 2026 के एक विचार लेख में ‘ऑपरेशन 37’ का उल्लेख कथित आन्तरिक राजनीतिक गतिविधियों और सम्भावित विदेशी हितों के सन्दर्भ में किया था। लेकिन किसी टिप्पणीकार का लेख उस दावे के अस्तित्व का प्रमाण हो सकता है; उसमें वर्णित साजिश के सच होने का स्वतंत्र प्रमाण नहीं।
किसी वायरल सन्देश में हिंसक साजिश जैसी बात जोड़ दी जाए तो उसकी गम्भीरता और बढ़ जाती है। ऐसे आरोपों के लिए सत्यापन का स्तर भी उतना ही ऊँचा होना चाहिए। सनसनी उनके समर्थन में साक्ष्य की कमी पूरी नहीं कर सकती।
‘37’ का अधूरा गणित
किसी संख्या को राजनीतिक कहानी का केन्द्र बना देने से वह संसदीय गणित का निर्णायक सूत्र नहीं बन जाती। सरकार का बहुमत सहयोगी दलों के समर्थन, सदन की स्थिति और मतदान में सदस्यों के व्यवहार से जुड़ा होता है। सांसदों के इस्तीफे, अनुपस्थिति और सरकार के विरुद्ध मतदान के परिणाम भी एक जैसे नहीं होते।
संविधान के अनुसार मन्त्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। बहुमत की परीक्षा संसदीय प्रक्रिया में होती है और दल-बदल पर संवैधानिक प्रावधान भी लागू होते हैं। इसलिए ‘37 सांसद अलग हुए और सरकार गिर गई’ जैसा निष्कर्ष आवश्यक परिस्थितियाँ स्पष्ट किये बिना भ्रामक सरलीकरण है।
फिर भी मूल प्रश्न गणित से पहले प्रमाण का है। किन सांसदों से सम्पर्क हुआ? किसने किया? क्या सत्यापित दस्तावेज, लेन-देन या अन्य जाँच योग्य सामग्री उपलब्ध है? इन प्रश्नों का उत्तर दिये बिना संख्या का बार-बार उल्लेख केवल आशंका को मजबूत करता है।
चुनाव आयोग का विवाद अलग है
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग से जुड़े विवादों को भी उनकी अपनी तथ्यात्मक तथा कानूनी पृष्ठभूमि में देखना चाहिए। विशेष गहन पुनरीक्षण, मतदाता सूची, संशोधित फॉर्म-6 और आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया पर उठे प्रश्न अपने आप में जाँच और जवाबदेही के विषय हैं।
प्रकाशित न्यायालयी रिपोर्टों के अनुसार, पाँच अक्टूबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सम्बन्धित याचिका पर केन्द्र और चुनाव आयोग से जवाब माँगा तथा मुख्य चुनाव आयुक्त के निलम्बन का अन्तरिम आदेश देने से इनकार किया। यह कार्यवाही आरोप सिद्ध हो जाने का निर्णय नहीं थी।
इसके बाद 12 अक्टूबर की सुनवाई में अदालत ने स्पष्ट किया कि संशोधित फॉर्म-6 को उसने न स्वीकृति दी है, न अस्वीकृत किया है; उसकी वैधता पर निर्णय होना बाकी है। इसलिए अदालत की टिप्पणियों को किसी पक्ष की सम्पूर्ण विजय या पराजय बताना भी उचित नहीं होगा।
इन विवादों का अस्तित्व किसी विदेशी अभियान का प्रमाण नहीं है। ऐसा सम्बन्ध स्थापित करने के लिए अलग, ठोस और जाँच योग्य साक्ष्य चाहिए।
प्रक्रिया और जवाबदेही
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया संविधान में निर्धारित है। अनुच्छेद 324(5) उन्हें हटाने के तरीके और आधार को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान संरक्षण देता है। इसलिए पद से हटाने की माँग, आयोग के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा और किसी आरोप की जाँच—इन अलग प्रश्नों को एक नहीं माना जाना चाहिए।
संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने का अर्थ उन्हें आलोचना से मुक्त कर देना नहीं है। उसी प्रकार उनकी आलोचना करने का अर्थ बिना प्रमाण उनके पदाधिकारियों को दोषी घोषित कर देना भी नहीं है। विश्वसनीयता तर्कपूर्ण प्रश्नों, अभिलेखों और स्पष्ट उत्तरों से बनती है।
‘डीप स्टेट’ की अस्पष्टता
‘डीप स्टेट’ शब्द का इस्तेमाल करते समय यह बताना जरूरी है कि उससे आशय किन व्यक्तियों, संस्थाओं या गतिविधियों से है। जब इसका अर्थ स्पष्ट नहीं किया जाता, तब यह ऐसा व्यापक आरोप बन जाता है जिसमें लगभग हर असहमति को समेटा जा सकता है।
किसान आन्दोलन, भाषा सम्बन्धी असन्तोष, आरक्षण की बहस या सरकार की आलोचना के अपने सामाजिक और राजनीतिक कारण हो सकते हैं। इनके पीछे विदेशी हस्तक्षेप का आरोप लगाया जाए तो उसके लिए विशिष्ट प्रमाण देना होगा। केवल असन्तोष का मौजूद होना बाहरी साजिश का सबूत नहीं है।
इसी प्रकार किसी पूरे धार्मिक समुदाय या वैचारिक समूह को सन्देह के घेरे में खड़ा करना अनुचित है। जवाबदेही किसी व्यक्ति या संगठन के प्रमाणित आचरण के आधार पर तय होनी चाहिए।
मीडिया की कसौटी
मीडिया की जिम्मेदारी केवल यह बताना नहीं है कि किसने क्या कहा। उसे यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि कथन का आधार क्या है और उसकी स्वतंत्र पुष्टि हुई है या नहीं। सार्वजनिक प्रसारक हों या निजी समाचार मंच, सभी पर यह जिम्मेदारी लागू होती है।
किसी दावे को सुर्खियों में जगह मिलना उसके सत्यापित होने के बराबर नहीं है। जहाँ प्रमाण अधूरे हों, वहाँ भाषा में यह सीमा साफ दिखनी चाहिए। ‘दावा’, ‘आरोप’ और ‘पुष्ट तथ्य’ के बीच का अन्तर दर्शक तथा पाठक से छिपाया नहीं जाना चाहिए।
लोकतंत्र को विश्वास चाहिए
भारत को वास्तविक विदेशी हस्तक्षेप के प्रति सतर्क रहना चाहिए। ऐसी सतर्कता का आधार सक्षम जाँच, पारदर्शी संस्थाएँ और विश्वसनीय सूचना होनी चाहिए। लगातार फैलाया गया अप्रमाणित सन्देह नागरिकों को अधिक सूचित करने के बजाय वास्तविक खतरों की पहचान कठिन बना सकता है।
सरकार की आलोचना अपने आप में राष्ट्र-विरोध नहीं है। उसी तरह किसी अपुष्ट राजनीतिक कहानी को राष्ट्रहित का नाम दे देने से वह सत्य नहीं बन जाती।
भारत की लोकतांत्रिक शक्ति उसके संविधान, जवाबदेह संस्थानों, स्वतंत्र पत्रकारिता और जागरूक नागरिकों में है। ‘ऑपरेशन 37’ जैसी किसी भी कहानी पर सबसे जरूरी सवाल यही होना चाहिए—दावा किसका है, प्रमाण क्या है और उसकी स्वतंत्र जाँच कहाँ हुई है?







