पूजा तभी सार्थक होगी, जब बेटियों को समान अवसर, सुरक्षा और निर्णय की स्वतंत्रता मिले
डॉ. घनश्याम बादल

शारदीय नवरात्र के आगमन के साथ ही वातावरण में भक्ति, उल्लास और उत्सव के रंग घुलने लगते हैं। मंदिरों में घंटियां गूंजती हैं, घरों में कलश स्थापित होते हैं, दुर्गा सप्तशती के पाठ शुरू होते हैं और देवी के जयकारों से दिशाएं मुखर हो उठती हैं। कहीं गरबा और डांडिया की थाप सुनाई देती है, तो कहीं दुर्गा पूजा के भव्य पंडाल सजते हैं। नौ रातों तक चलने वाला यह उत्सव भारतीय संस्कृति की ऐसी परंपरा है, जिसमें धर्म, लोकजीवन, कला और सामूहिक चेतना एकाकार हो जाते हैं।
लेकिन नवरात्र का अर्थ केवल व्रत, उपवास, पूजा-पाठ और उत्सव की चहल-पहल तक सीमित नहीं है। देवी के नौ रूपों की आराधना का संदेश हमारे समय, समाज और जीवन के प्रश्नों से भी जुड़ता है। इस दृष्टि से नवरात्र नारी-शक्ति की प्रतिष्ठा, अन्याय के प्रतिरोध और मनुष्य के भीतर सोई हुई ऊर्जा को जगाने का पर्व है।
नवरात्र की पौराणिक पृष्ठभूमि में महिषासुर के वध की कथा विशेष स्थान रखती है। इसका प्रतीकात्मक अर्थ अत्यंत व्यापक है। जब स्थापित शक्तियां किसी संकट के सामने विवश हो जाती हैं, तब परिवर्तन की नई शक्ति जन्म लेती है। महिषासुर का अहंकार और अत्याचार जितना प्रबल था, देवी का संकल्प उससे कहीं अधिक दृढ़ था। यह आख्यान उस धारणा को चुनौती देता है कि शक्ति, पराक्रम और नेतृत्व केवल पुरुष के अधिकार क्षेत्र हैं। भारतीय धार्मिक परंपरा ने स्त्री को उस सर्वोच्च शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया है, जो संकट के समय अन्याय का अंत करने के लिए आगे आती है।
देवी का प्राकट्य देवताओं के सम्मिलित तेज से होता है। सामाजिक संदर्भ में यह संदेश देता है कि अन्याय से लड़ने के लिए सामूहिक चेतना, सहयोग और एकजुटता आवश्यक हैं। स्त्री की शक्ति और गरिमा का सम्मान पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
नौ रूप, नव आयाम
नवरात्र में पूजी जाने वाली नवदुर्गा के नौ रूप स्त्री-शक्ति के विविध आयामों को समझने का अवसर देते हैं। इन रूपों को धार्मिक प्रतीकों के साथ जीवनमूल्यों के रूप में भी समझा जा सकता है। स्त्री में ममता है तो प्रतिरोध की क्षमता भी; सृजन है तो नेतृत्व भी; करुणा है तो अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस भी। उसे किसी एक भूमिका में बांध देना उसकी संपूर्णता को नकारना है।
स्त्री का सम्मान केवल मां, बहन, पत्नी या बेटी के रूप में उसकी भूमिका के कारण नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में भी होना चाहिए। उसकी अपनी इच्छाएं, आकांक्षाएं, क्षमताएं और निर्णय हैं। नारी-शक्ति की आराधना हमें इस स्वतंत्र पहचान को स्वीकार करने की प्रेरणा भी देती है।
कन्या-पूजन का प्रश्न
नवरात्र की अष्टमी और नवमी को कन्या-पूजन की परंपरा इस पर्व को विशेष अर्थ देती है। छोटी बच्चियों को देवी का स्वरूप मानकर उनके पैर धोए जाते हैं, उन्हें भोजन कराया जाता है और उपहार दिए जाते हैं। यह परंपरा बालिका के प्रति आदर की भावना का प्रतीक है।
लेकिन यहीं एक असहज प्रश्न भी खड़ा होता है। जिस समाज में कन्या को देवी मानकर पूजने की परंपरा है, उसी समाज में बेटियों को जन्म से पहले समाप्त करने, उनकी शिक्षा रोकने, उनके साथ भेदभाव करने और उन्हें असुरक्षित रखने जैसी प्रवृत्तियां क्यों मौजूद हैं? जिस बच्ची के पैर नवरात्र में श्रद्धापूर्वक धोए जाते हैं, क्या वर्ष के बाकी दिनों में भी उसकी इच्छाओं, अधिकारों और आत्मसम्मान का उतना ही ध्यान रखा जाता है?
कन्या-पूजन तभी सार्थक है, जब कन्या को समान अधिकारों की दृष्टि से देखा जाए। उसे अच्छी शिक्षा मिले, अपनी पसंद का जीवन चुनने की स्वतंत्रता मिले, आर्थिक संसाधनों और अवसरों में बराबरी मिले तथा परिवार के निर्णयों में उसकी आवाज सुनी जाए। पूजा के कुछ घंटे और भेदभाव के शेष दिन—यह विरोधाभास नवरात्र की आत्मा के अनुकूल नहीं हो सकता।
आज के महिषासुर
आज स्त्री जीवन के लगभग हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा और क्षमता का परिचय दे रही है। विज्ञान, शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, उद्यमिता, खेल और सेना में उसकी भागीदारी दिखाई देती है। परिवारों को आर्थिक और भावनात्मक आधार देने से लेकर कठिन परिस्थितियों में नेतृत्व करने तक उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण है। फिर भी सुरक्षा, समान अवसर, वेतन, घरेलू श्रम के बंटवारे और सामाजिक रूढ़ियों से जुड़े प्रश्न बने हुए हैं। ऐसे समय में नवरात्र का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।
महिषासुर की कथा को आज के संदर्भ में समझें तो अहंकार, स्त्री-विरोध, हिंसा, शोषण, अज्ञान और भेदभाव जैसी प्रवृत्तियां भी हमारे सामने चुनौती बनकर खड़ी हैं। इनसे संघर्ष के लिए व्यक्तिगत साहस के साथ परिवार, समाज और संस्थाओं की जिम्मेदारी भी जरूरी है।
बेटियों के आगे बढ़ने पर गर्व करने के साथ उनके रास्ते की बाधाओं को हटाना होगा। घर के काम और देखभाल की जिम्मेदारी साझा करना, उनकी बात गंभीरता से सुनना तथा उनकी उपलब्धियों और निर्णयों का सम्मान करना इस बदलाव की शुरुआत हो सकती है।
उत्सव से सामाजिक पहल तक
नवरात्र को आधुनिक संदर्भों से जोड़ने का अर्थ परंपराओं के भीतर निहित मूल्यों को अधिक व्यापक बनाना है। पूजा-पाठ, व्रत, भजन और सांस्कृतिक आयोजन अपनी जगह महत्त्वपूर्ण हैं। इनके साथ ठोस सामाजिक पहल जुड़ें तो पर्व की गरिमा और बढ़ सकती है।
मोहल्लों और पूजा समितियों की ओर से बेटियों की शिक्षा, महिला स्वास्थ्य, पोषण, डिजिटल साक्षरता और अधिकारों पर संवाद आयोजित किए जा सकते हैं। जरूरतमंद छात्राओं की पढ़ाई के लिए सहयोग जुटाया जा सकता है। स्थानीय महिला उद्यमियों, शिल्पकारों और स्वयं सहायता समूहों को मेलों तथा उत्सवों में स्थान देकर उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया जा सकता है।
गरबा, डांडिया, रामलीला और दुर्गा पूजा जैसे आयोजनों में महिलाओं की भागीदारी मंच पर प्रस्तुति देने के साथ आयोजन की योजना, वित्तीय प्रबंधन और नेतृत्व में भी होनी चाहिए। निर्णय लेने वाली समितियों में उनकी सार्थक भागीदारी उत्सव को अधिक समावेशी बना सकती है।
सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षा, पर्याप्त प्रकाश, स्वच्छ शौचालय और आपात सहायता की व्यवस्था हो। आयोजन ऐसा हो, जिसमें हर आयु की महिला निर्भय होकर शामिल हो सके। महिलाओं की सुविधा और गरिमा आयोजन की बुनियादी जिम्मेदारी मानी जानी चाहिए।
आस्था के साथ स्वतंत्रता
उपवास करने या न करने का निर्णय व्यक्तिगत आस्था और स्वास्थ्य के अनुरूप होना चाहिए। धार्मिक अनुष्ठानों में किसी की भागीदारी उसकी इच्छा से हो। दूसरों की आस्था और स्वतंत्रता का सम्मान करना भी सामाजिक विवेक का हिस्सा है।
परिवारों में पर्व की तैयारियों का पूरा बोझ महिलाओं पर डाल देना भी विचारणीय है। पूजा, भोजन, अतिथियों की देखभाल और अन्य व्यवस्थाओं में सभी सदस्य जिम्मेदारी साझा करें, ताकि उत्सव महिलाओं के लिए भी आनंद और साधना का अवसर बने।
संकल्प से बदले आचरण
नवरात्र की प्रतिष्ठा तब और बढ़ेगी, जब आराधना का प्रभाव हमारे आचरण में दिखाई देगा। भव्य पंडाल, महंगे शृंगार और आकर्षक रोशनी के साथ धार्मिक आयोजनों को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ना होगा।
प्रत्येक पूजा समिति हर वर्ष कोई एक ठोस संकल्प अपना सकती है—किसी बालिका की शिक्षा में सहयोग, सार्वजनिक स्थल पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए आवश्यक सुविधाओं की पहल अथवा जरूरतमंद युवतियों के कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था। ऐसे संकल्पों पर वर्ष भर काम हो और अगली नवरात्र में उनकी प्रगति सामने रखी जाए तो उत्सव की सकारात्मक ऊर्जा स्थायी बदलाव का आधार बन सकती है।
नवरात्र का मूल भाव शक्ति का जागरण है। यह जागरण मंदिरों में भी हो और मन में भी; आरती की लौ में भी दिखे और सामाजिक चेतना में भी। देवी की प्रतिमा के सामने सिर झुकाना आस्था है, लेकिन किसी स्त्री के आत्मसम्मान को ठेस न पहुंचाना उस आस्था की परीक्षा है।
नौ रातों तक आदिशक्ति की आराधना करने वाला समाज यदि पर्व के बाद फिर उसी भेदभाव, असुरक्षा और असमानता में लौट जाए तो उत्सव का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। नवरात्र की सार्थकता इसी में है कि देवी के प्रति श्रद्धा हर स्त्री के प्रति सम्मान बनकर हमारे दैनिक व्यवहार में उतरे।








