पितरों को श्रद्धा से तृप्त करो, श्राद्ध से नहीं

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

जीवित माता-पिता की सेवा, सम्मान और उनके लिए निकाला गया समय ही सच्ची श्रद्धा की कसौटी है

चन्द्र प्रभा सूद

संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कल्याण की कामना करता है। वह चाहता है कि परिवार और समाज में उसकी पहचान एक अच्छी संतान के रूप में हो। लेकिन यह पहचान केवल इच्छा करने से नहीं बनती। इसके लिए आवश्यक है कि हम वृद्ध होते माता-पिता को अपने आचार-व्यवहार, स्नेह और सेवाभाव से प्रसन्न रखें। उनके प्रति हमारी श्रद्धा शब्दों तक सीमित न रहे, बल्कि दैनिक जीवन में दिखाई भी दे।

सेवा का अवसर आज है

जहाँ तक संभव हो, माता-पिता के जीवनकाल में ही उनकी सेवा कर लेनी चाहिए। उनके खान-पान का समुचित ध्यान रखा जाए, स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही न बरती जाए और उनके वस्त्रों तथा अन्य आवश्यकताओं का खयाल रखा जाए। सबसे बढ़कर, उनके साथ समय बिताया जाए, ताकि वे अकेलेपन से घबराएँ नहीं और स्वयं को परिवार पर बोझ न समझें।

बुजुर्गों को केवल दवा, भोजन और सुविधाएँ ही नहीं चाहिए होतीं। उन्हें कोई ऐसा भी चाहिए, जो उनकी बात धैर्य से सुने, उनके अनुभवों का सम्मान करे और उन्हें यह विश्वास दिलाए कि परिवार में उनका स्थान आज भी महत्वपूर्ण है।

जो संतान अपने माता-पिता की ऐसी सेवा करती है, उसके लिए घर ही मंदिर बन जाता है। माता-पिता के रूप में उसके सामने स्नेह, त्याग और आशीर्वाद की जीवंत प्रतिमाएँ होती हैं।

एक प्रचलित प्रसंग का संदेश

गुरु नानक देव जी से जुड़ा हरिद्वार का एक प्रचलित प्रसंग मैंने कहीं पढ़ा था। उसके विभिन्न वर्णन मिलते हैं, लेकिन उसमें निहित प्रश्न विचार करने योग्य है।

कथा के अनुसार, गुरु नानक देव जी ने हरिद्वार में लोगों को गंगा में खड़े होकर पूर्व दिशा की ओर अपने पितरों के निमित्त जल अर्पित करते देखा। वे स्वयं दूसरी दिशा में जल उछालने लगे। यह देखकर लोगों को आश्चर्य हुआ। उन्होंने इसका कारण पूछा तो गुरु नानक देव जी ने अपने खेतों को पानी देने की बात कही।

लोगों ने प्रश्न किया कि इतनी दूर स्थित खेतों तक इस प्रकार पानी कैसे पहुँच सकता है? इस पर उन्होंने पलटकर प्रश्न उठाया कि यदि जल धरती पर स्थित खेतों तक नहीं पहुँच सकता, तो उसके पितरों तक पहुँचने की धारणा पर भी विचार क्यों नहीं किया जाना चाहिए?

इस प्रसंग को पढ़कर मुझे यही लगता है कि महापुरुष कई बार किसी सरल क्रिया के माध्यम से मनुष्य को अपनी मान्यताओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं। वे ऐसे प्रश्न सामने रखते हैं, जिनका उत्तर हमें अपने विवेक और आचरण में खोजना पड़ता है।

श्रद्धा व्यवहार में दिखाई दे

मेरे लिए इस प्रसंग का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि जीवित माता-पिता और गुरुजनों के प्रति श्रद्धा हमारे व्यवहार में दिखाई दे। उनकी आवश्यकताओं की उपेक्षा करके, उन्हें कटु वचन सुनाकर अथवा अकेलेपन में छोड़कर हम अपने कर्तव्य की पूर्ति नहीं कर सकते।

जिस माता ने हमारी छोटी-सी पीड़ा पर रातें जागकर बिताईं और जिस पिता ने हमारी आवश्यकताओं के लिए अपनी इच्छाएँ पीछे रखीं, वृद्धावस्था में उनके प्रति हमारी संवेदनशीलता और भी बढ़नी चाहिए। उनकी धीमी चाल, बार-बार दोहराई गई बात या किसी काम में दूसरों पर निर्भरता हमारे अधैर्य का कारण नहीं बननी चाहिए।

पूर्वजों का स्मरण अपनी जड़ों और उनके योगदान के प्रति कृतज्ञ होने का अवसर है। लेकिन उस कृतज्ञता की सार्थकता तभी है, जब हम अपने परिवार के जीवित बुजुर्गों को भी आदर और अपनापन दें। श्रद्धा की परीक्षा हमारे दैनिक आचरण में होती है।

बाद के पछतावे से बेहतर आज का अपनापन

हम अपने माता-पिता का ऋण जीवन भर उनकी सेवा करके भी पूरी तरह नहीं चुका सकते। फिर भी इतना तो कर ही सकते हैं कि उनके रहते उन्हें उपेक्षा, अपमान और अकेलेपन का दुःख न सहना पड़े।

उनके पास बैठिए, उनका हाल पूछिए, उनकी पसंद का ध्यान रखिए और परिवार के निर्णयों में उन्हें भी शामिल कीजिए। उन्हें यह अनुभव होने दीजिए कि जिन बच्चों को उन्होंने प्रेम से पाला, उनके जीवन में आज भी उनके लिए समय और स्थान है।

माता-पिता के संसार से विदा हो जाने के बाद किए गए आयोजन उनके जीवनकाल में छूट गए स्नेह और सेवा के अवसर वापस नहीं ला सकते। इसलिए जो प्रेम देना है, आज दीजिए; जो सेवा करनी है, आज कीजिए। श्रद्धा का सबसे सच्चा रूप यही है कि जिनके कारण हमारा अस्तित्व है, उनके रहते हम उनके जीवन में सुख, सम्मान और संतोष भर सकें।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें

error: Content is protected !!