शहीदी दिवस पर हरियाणा के हर शहीद को मिले सम्मान

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राव तुलाराम को नमन करते हुए 1857 से कारगिल तक बलिदान देने वालों की गाथा भी नई पीढ़ी तक पहुंचाई जाए

ऋषिप्रकाश कौशिक

हरियाणा वीर एवं शहीदी दिवस पर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने राव तुलाराम को श्रद्धांजलि दी। यह उचित है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उनका साहस और नेतृत्व हरियाणा के इतिहास का गौरवपूर्ण अध्याय है। लेकिन इस अवसर पर एक सवाल भी उठता है: जिस दिन के नाम में वीर एवं शहीदी दोनों हैं, उसकी सार्वजनिक स्मृति में प्रदेश के अन्य शहीदों को कितना स्थान मिलता है?

यह सवाल राव तुलाराम के सम्मान को कम नहीं करता। उनके संघर्ष को याद करते हुए उन लोगों की कहानियां भी सामने लाई जा सकती हैं जिन्होंने 1857 में वर्तमान हरियाणा के अन्य क्षेत्रों से अंग्रेजी शासन का विरोध किया। भारत सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों का जो शब्दकोश प्रकाशित किया है, उसमें दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के हजारों नाम दर्ज हैं। यह इतिहास विद्यार्थियों तक पहुंचाने का आधार बन सकता है।

आजादी के बाद भी हरियाणा के सैनिकों ने देश की रक्षा में बलिदान दिया है। 1962, 1965 और 1971 के युद्धों तथा कारगिल संघर्ष में प्रदेश के जवानों के योगदान का उल्लेख हरियाणा के आधिकारिक संबोधनों में मिलता है। ऐसे में शहीदी दिवस को स्वतंत्रता संग्राम से लेकर देश की सीमाओं की रक्षा तक, बलिदान की पूरी परंपरा से जोड़कर मनाने पर विचार होना चाहिए।

इसके लिए केवल बड़े समारोह आवश्यक नहीं हैं। हर जिले में वहां के शहीदों के प्रमाणित नाम और जीवन परिचय जुटाए जाएं। विद्यालयों में बच्चों को अपने क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों और सैनिकों की कहानियां पढ़ाई जाएं। शहीद परिवारों को आमंत्रित करके उनकी बात सुनी जाए और स्थानीय स्मारकों की स्थिति पर ध्यान दिया जाए। यह श्रद्धांजलि को एक दिन के कार्यक्रम से आगे ले जाने का सार्थक तरीका होगा।

मुख्यमंत्री ने युवाओं से राव तुलाराम के आदर्शों से प्रेरणा लेने को कहा है। उसी संदेश को विस्तार देते हुए हरियाणा अपने सभी ज्ञात और अनाम शहीदों को याद कर सकता है। राव तुलाराम इस स्मरण के प्रमुख प्रतीक बने रहें और उनके साथ उन असंख्य लोगों का योगदान भी सामने आए जिनके बलिदान से प्रदेश और देश का इतिहास बना है। यही वीर एवं शहीदी दिवस की भावना को नई पीढ़ी तक पहुंचाएगा।

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Author: Bharat Sarathi

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